आतंकवाद ने कश्मीर को फिर लहूलुहान कर दिया है। देश अजीब मोड़ पर खड़ा है। किसी देश की जिन्दगी में ऐसे अवसर भी आते हैं, जब उसका लिया कोई निर्णय या चूक उसे आबाद या बर्बाद कर सकती है। नरेन्द्र मोदी युद्ध करते हैं, तो कहा जाएगा कि चुनाव के लिए और नहीं करते हैं तो देश का दिल दुखता है। उनके और उनके पार्टी नेताओं के बीते कल में दिए गए बयान ही आज उनके गले की हड्डी बन गए हैं। पुलवामा में हमारी सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर हुई त्रासदी और उसके बाद के घटनाक्रम से पूरा देश स्तब्ध है। दुख और गुस्से से भरा हुआ है। सैनिकों की शहादत पर मीडिया-सोशल मीडिया से तरह-तरह की आवाजें आ रही हैं। कहीं दुख है, कहीं शर्म है, कहीं नफरत है, कहीं प्रेम है। सबके मूल में सैनिकों की कुर्बानी है। हमारी सरकार सेना कुछ कर गुजरे इसकी तमन्नाएं हैं। यह उचित भी है। र्इंट का जवाब पत्थर ही होता है। लेकिन यह पत्थर आतंकवादी पर, गद्दार पर, असल हत्यारों पर उनके खैरख्वाहों पर चले, तभी शहीदों की मौत के असल मायने आते हैं।

‘ए मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी’, यह गीत जब लता मंगेशकर ने लालकिले पर 15 अगस्त को गाया तो उस वक्त के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे। तब १1962 में हम चीन से हारे थे। पिछले दो हजार वर्षों से विदेशियों से लगातार हमारा देश हारता और कुर्बानी देता रहा था। आंसू के साथ आत्मविश्वास से सिर ऊंचा करने का मौका हमें सन् 1971 में इंदिरा गांधी ने दिया, जब उन्होंने पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों को गिरफ्तार कर और बांग्लादेश को जीतकर दुनिया के सामने एक नया इतिहास रचा था।

क्या आज सब कुछ इतना आसान है। चीन से हम 1962 में उसके द्वारा छीनी गई जमीन को वापस लाना तो ठीक, उसकी बात भी नहीं कर सकते हैं। हमें चीन ताकतवर और पाकिस्तान कमजोर लगता है। 1965 और 1971 इसकी गवाही देते हैं। 1965 में सैनिकों और देश की कुर्बानी देकर क्या हासिल हुआ था? हमने ताशवंâद में जीती जमीन भी वापस कर दी थी। आज चीन पाकिस्तान के साथ खड़ा है। अमेरिका व्यापारी है। वो सबके साथ है और किसी के साथ नहीं है। लेकिन खुद के मामले में वो ईमानदार है। बराक ओबामा ने जिस तरह से पाकिस्तान में लादेन को खत्म किया, वह अमेरिका का सीना 56 इंच का नहीं 156 इंच का करता है। क्या हम उतनी शिद्दत, उतनी तकनीक, उतनी एकजुटता से ऐसी कोई कार्रवाई कर सकते हैं?

जवानों की सीमा पर युद्ध में शहादत हुई होती तो देश को फख होता, लेकिन कायरतापूर्वक धोखे से जवानों को मार दिया गया। केन्द्र सरकार और खुफिया तंत्र पूरी तरह से असफल रहे हैं। जब परिवार में मौत होने पर अस्पताल और डॉक्टर से प्रश्न पूछे जाते हैं, तो यह शहादत तो देश के लिए हुई है। ऐसे में सरकार पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। वे हो भी रहे हैं, लेकिन उत्तर देने के बजाय उलटे उन्हें हमेशा की तरह प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों में बदला जा रहा है। इसमें चुनाव और उसमें जीतने-हारने के दुस्वप्न देखने वालों की एक बड़ी तादाद शामिल है।

मीडिया-सोशल मीडिया पर नफरत परोसी जा रही है। कालांतर में यह नफरतें धीमे-धीमे दिलो-दिमाग पर कुछ इस कदर कब्जा कर लेती हैं कि प्रेम खत्म हो जाता है। सिर्पâ नफरत रह जाती है। हमारा देश खण्ड-खण्ड है, तो अखण्ड भी है। कई बार खण्ड-खण्ड हुआ है, तो कभी अखण्ड भी रहा है। सन 1947 में भारत-पाक बंटवारे में करीब 10 लाख लोग मार दिए गए थे। 1984 में एक ही रात में दिल्ली में 2000 से अधिक सिखों का कत्लेआम किया गया था। सन 1989 में आरक्षण के नाम पर हुए जातीय दंगे और सन 2002 में गोधरा भी इन्हीं नफरत करने वालों की दरिंदगी था। आज भी वे शक्तियां अपना काम कर रही हैं।

जब शहीदों के लिए चंदा होता है और जेब में हाथ डालते हैं, तब 100, 1000 या 10,000 दें, इसके लिए सोचते हैं। अंबानी ने शहीदों के बच्चे को पढ़ाने की जिम्मेदारी ली है। कोई 1000 करोड़ नहीं दिए हैं। हम यहां पर दिमाग लगाते हैं, तो देश के लिए जज्बात के साथ दिमाग क्यों नहीं लगाते हैं। इंदौर के एक स्वनामधन्य उद्योगपति सेना द्वारा कराची पर बम पेंâकने का मैसेज सोशल मीडिया पर भेज रहे हैं, यह उनका वही अधिकार है, जो देश के 135 करोड़ लोगों का है लेकिन ऐसी बातें करने वालों में बहुत से लोगों के देश प्रेम से परिपूर्ण आग्रह होते हैं, तो कुछ के साम्प्रदायिकता से भरे दुराग्रह भी होते हैं। ऐसी बात शहीद का परिवार करे, सेना का जवान करे, तो उसका दर्द दिखता है। समझना चाहिए कि दिमाग को शांत और दिल को आग करने पर ही कोई बड़ा परिणाम आता है। होता इसका उलटा है। उत्पाती और आतंकवादियों में अंतर करना भूल जाते हैं।

हम जिन जवानों के लिए आसमां सिर पर उठाए हुए हैं, उनकी असल तकलीफ से नावाकिफ रहते हैं। जिन गांव, किसानों की आत्महत्या की अनदेखी करते हैं और कर्जमाफी पर सवाल करते हैं, ये शहीद जवान उन्हीं के बेटे रहते हैं। एक जवान ने कुछ समय पूर्व अपने पेट की भूख का वीडियो वायरल किया था। सेना में रहकर यह करना आत्महत्या का काम था। टीवी पर सवाल उठे थे, उनके उत्तर आज तक नहीं मालूम। हमारे देश में भूख कभी पहली खबर नहीं रही। सब न जाने कहाँ खो गया?

शहीद हुए ये जवान सीमा सुरक्षा बल के थे, लेकिन हमारे देश की सैन्य व्यवस्था उन्हें शहीद का दर्जा नहीं देती है। जो शहीद हुए हैं, वे देश के दिलो-दिमाग में बस गए हैं। उन्हें किसी सरकार की तलबगीरी नहीं चाहिए। लेकिन यह सब गलत हो रहा है। इसे ठीक करना चाहिए। सरकार और सेना देश के उन्हीं लोगों से बनी है, जो उन्हें शहीद मानते हैं। ये सीमा पर, नक्सलवादी, डाकुओं, आतंकवादियों को पकड़ने में उनसे लड़ने में आये दिन शहीद होते रहते हैं। सीमा सुरक्षा बल के साथ अद्र्ध सैनिक बल, पुलिस के जवानों को भी शहीद का दर्जा मिलना चाहिए।

आजादी के समय धारा 370 कश्मीर को शोषण से बचाने के लिए, उसकी सभ्यता, संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए लगाई गई थी। ऐसी ही व्यवस्था धारा 370ए और 371 द्वारा आदिवासी वनांचल आदि क्षेत्रों को महपूâज रखने के लिए भी लगाई गई थी। आज देखते हैं तो पाते हैं कि वहां पर उद्योग-व्यापार, रहवास कुछ भी पनप न सका। देश के दिमाग में यह बैठा दिया कि कश्मीर में अलग कानून है, जिससे उन्हें नमालूम क्या-क्या हासिल हो रहा है। कश्मीर का कानून अलग और भारत का कानून अलग है। जबकि हकीकत में 370 ने कश्मीर को नुकसान पहुंचाकर मारने का काम किया है। 370 कश्मीर को बचाने की धारा थी, वह उसके लिए मरने की धारा 302 बन गई है।

चार वर्ष पूर्व कश्मीर ने आतंकवाद और पाकिस्तान के दबाव को दरकिनार कर भारत के संविधान में यकीन करते हुए 64 फीसद वोट देकर सरकार बनाई थी। भाजपा ने जिन्दगी भर 370 हटाने का नारा लगाया, वह प्रदेश और केन्द्र दोनों में सरकार बनाकर उसे घोलकर पी गई। इन सब ने भी कश्मीर को बेवजह नुकसान पहुंचाया। सियासत ने हमेशा कश्मीर की जनता को बेवजह हथियार बनाया है। आज भी वही खेल चल रहा है। देखते हैं यह सियासत आगे क्या-क्या रंग दिखाती है, खुशबू के या खून के। यह भविष्य के गर्भ में है।

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