ये कहाँ ले आये चुनाव आयोग को ?

श्री सुनील अरोडा जी,

‘मुचुआ’
निर्वाचन सदन,
पटेल चौक, अशोक  रोड,
नयी दिल्ली- 110052

चाहता तो यह था कि आदरणीय संबोधन के साथ ही यह पत्र शुरू  करूं और इस औपचारिकता में कोई नुकसान भी नहीं था, लेकिन तभी टी.एन. शेषन   की याद आ गयी। वही टी.एन. शेषन, जो देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त थे, 1991 से 1996 तक, लेकिन जिन्होंने पहली बार देश को चुनाव आयोग के वजूद का, उसकी ताकत का अहसास दिलाया और जिन्हे बहुत सारे लोग अब भी प्रथम चुनाव आयुक्त ही मानते है। शेषन केवल कहते नहीं थे कि वह राजनीतिक नेताओं को लोकतंत्र पर डाका डालने की इजाजत कतई नहीं देंगे, बल्कि आप जानते हैं कि आपके उलट, उन्होंने कैसे बिना किसी भेदभाव, किस सख्ती से आदर्श आचार संहिता लागू की। वह पहला मौका था, जब आचार संहिता दीवार पर फ्रेम में टंगी इबारत भर नहीं रह गयी थी, बल्कि वह हर गलत-सही तरीके अपनाकर मतदाताओं को लुभाने और चुनाव जीत लेने की मुहिम में जुटे राजनीतिक नेताओं के लिये गले की फांस बन गयी थी। आप शेषन नहीं हैं और आपको आदरणीय कहकर संबोधित करता, तो उन्हें क्या कहता? आप तो एस.वाई. कुरैशी भी नहीं हैं, जिनकी अगुवाई में आयोग ने अभी केवल छह-सात साल बीते होंगे, उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में माइनारिटी सब-कोटा का वादा करने पर तब के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद को ‘सेंसर’ कर दिया था और आदर्श आचार संहिता को सांविधिक दर्जा देकर इनके उल्लंघन पर कार्रवाई का अधिकार आयोग से छीन लेने की मंत्री समूह की पहल की भी तीखी आलोचना की थी।

आचार संहिता को सांविधिक दर्जा मिलते ही इनके उल्लंघन के तमाम मामलों पर प्रासंगिक कानूनों के तहत निर्णय का अधिकार अदालतों के पास चला जाता। मामले वहां साल दर साल खिंचते रहते और आचार संहिता के उल्लंघन के अपराधी राजनेता सत्ता के मजे लूटते रहते। यही कारण था कि तब, भाजपा समेत लगभग पूरे विपक्ष ने इसे चुनाव आयोग को ‘टूथलेस’ बनाने, उसे कमजोर करने की साजिश कहा था। यह आरोप ठीक भी था। कांग्रेस चुनाव आयोग को लुंज-पुंज करने के कानूनी आयामों का संधान कर रही थी। शायद यद यह उसकी आपराधिकता की सीमा थी। वह आयोग को निःशक्त  करना चाहती थी, पर इसके लिये उसे एक कानूनी आड की दरकार थी। यह नया समय है और सब कुछ खुल्ला खेल फर्रूखाबादी है। सी.बी.आई. पर आधी रात के छापे, सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस आदि के ब्यौरे नहीं दूंगा। यह नयी प्रतीति है कि बिना किसी आड के भी, तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग में से केवल दो को साध कर उसे अपने हित में इस्तेमाल किया जा सकता है। अशोक लवासा ने उनका एतराज दर्ज नहीं किये जाने के विरोध में आयोग की बैठकों में भाग लेना छोड दिया। ऐसा करके उन्होंने तीन सदस्यों वाले आयोग में बहुमत से फैसले लेने के प्रावधान को अप्रासंगिक कर दिया था। पिछले वक्तों में यह सवाल अहम होता कि अगर बैठकों में दो सदस्य ही शिरकत कर रहे हैं तो आम सहमति नहीं होने पर फैसला कैसे होगा। पर यह नया समय है, मूल्यों, नैतिकताओं और कानूनों को लेकर एक बेशर्म बेपरवाही का वक्त। बैठकें होती रहीं, फैसले लिये जाते रहे। बल्कि आयोग ने फैसला यह भी कर लिया कि लवासा की आपत्तियां दर्ज तो होंगी, पर सार्वजनिक नहीं की जायेगी। आपत्तियां गोपनीय रखने की इस जिद का सबब समझना मुश्किल  नहीं है।
अरोडा सा’ब, लवासा आखिर आप ही में से एक थे। उनकी यह कोई गैर-वाजिब मांग नहीं थी कि सबसे पहले तो पी.एम. को एक औपचारिक पत्र लिखकर आदर्श आचार संहिता लागू करने में उनसे सहयोग मांगा जाये। वह जानते होंगे कि पी.एम. अपनी ओर से तो कोई उत्कृष्ट  उदाहरण, दूसरों के लिये कोई नजीर पेश  करने से रहे। वह यह भी जानते होंगे कि प्रधान जी से औपचारिक अनुनय करने के अलावा कोई भी कदम उठाने के लिये आयोग के सदस्यों में बहुत चारीत्रिक शुचिता, बहुत आत्मबल, बहुत साहस की दरकार होगी, वरना वह तो जिला चुनाव अधिकारी के इस मंतव्य से सहमत थे कि लातूर में पी.एम. ने अपने चुनावी भाषण में पुलवामा कांड और बालाकोट हमले का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं करने के आयोग के मशविरे की अनदेखी की। पर लवासा की इस मांग पर कान देना तो दूर, आपने और चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने जाने क्यों पी.एम. और उनकी पार्टी के मुखिया के खिलाफ भी षिकायतें खारिज कर दी, तुरंत नहीं, बल्कि तब, जब आपके निर्णय के लिये लंबे इंतजार के बाद अंततः सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायी गयी और उसने आपको समयबद्ध तरीके से निर्णय करने का निर्देश दिया। आपने तो वर्धा की एक चुनाव सभा में पी.एम. द्वारा वायनाड को हिन्दु माइनारिटी कान्सटीचुएंसी बताने को भी संहिता का उल्लंघन नहीं माना, जबकि नब्बे के दशक में महाराष्ट्र असेम्बली के एक उपचुनाव में धार्मिक आधारों के इस्तेमाल के ऐसे ही एक मामले में शिवसेना के विजयी उम्मीदवार रमेश प्रभु का निर्वाचन तो रद्द कर ही दिया गया था, उनपर और पार्टी के शीर्ष नेता बाल ठाकरे के चुनाव लडने और मताधिकार के इस्तेमाल तक पर 6 साल की रोक लगा दी गयी थी।

यह रोक जरूर बंबई उच्च न्यायालय ने जन-प्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों के तहत लगायी थी, पर किसी भी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव आयुक्त के लिये इसे एक अनुकरणीय नजीर हो जाना चाहिये था। आपके लिये ऐसा नहीं हुआ। पर यह सब तो चुनाव प्रक्रिया के अधबीच की बात है। इससे पहले आपकी अगुवाई वाली यह संवैधानिक संस्था चुनाव कार्यक्रम जारी करने के लिये भी, कहते हैं कि पी.एम. के तूफानी दौरों और ताबडतोड वोट-खींचू घोषणाएं सम्पन्न होने का इंतजार करती रही। 2014 की तरह ही अगर आयोग ने 5 मार्च को चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी होती तो तुरंत आचार संहिता का ब्रेक लग जाता। गो आयोग के एक अधिकारी ने इन आरोपों को खारिज करते हुये कहा, और ठीक ही कहा होगा, कि 2014 की तरह चुनाव नतीजे इस बार 31 मई तक नहीं, बल्कि 3 जून तक घोषित किये जा सकते हैं, इसलिये यह इत्मीनान है। समय का टोटा तो आयोग को तब हुआ, जब ई.वी.एम. मैनीपुलेशन के व्यापक और गंभीर संदेहों के बीच लगभग पूरे विपक्ष ने सभी लोकसभा क्षेत्रों में 50 प्रतशत  ई.वी.एम. की मतगणना का वी.वी.पैट की पर्चियों से मिलान करने का निर्देश देने की सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगायी। आयोग सात चरणों में मतदान कराने में 40 दिन लगा रहा था, सभी ई.वी.एम. के लिये वी.वी.पैट मुहैया कराने पर जनता की कमाई का 9,000 करोड रुपया खर्च कर दिया गया था, लेकिन वह वी.वी.पैट पर्चियों से मिलान कर ई.वी.एम. की मतगणना की शुचिता की जांच और चुनाव प्रक्रिया में अवाम का भरोसा जगाने के लिये छह दिन लगाने को तैयार नहीं था। यद्यपि आयोग की ही मानें तो 50 परसेंट पर्चियों का मिलान करके भी 3 जून से चार दिन पहले ही चुनाव नतीजे घोषित किये जा सकते थे।

महोदय! अब फिर-फिर यह क्या बताना कि क्यों यू.पी.,-बिहार-पश्चिम बंगाल में मतदान सातो चरणों में कराये जाते रहे, क्यों बंगाल, उडीसा ही नहीं, 14 सीटोंवाले झारखंड, 11 सीटों वाले छत्तीसगढ और केवल 2 सीटों वाले त्रिपुरा में भी मतदान एकाधिक चरणों में जरूरी था और गुजरात जैसे जिन राज्यों में सत्तारूढ पार्टी अपने प्रदर्शन  को लेकर आश्वश्त  हो सकती थी या आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल जैसे जिन राज्यों में उसका कोई स्टेक नहीं था, वहां दांव पर क्रमशः 26,25,17,39 और 20 सीटें होने के बावजूद मतदान एक ही चरण में करा लिये गये। मुश्किल  दरअसल 6 दिन की थी नहीं, सत्यापन की थी। संभव है, ऐसे सत्यापन से सात चरणों में मतदान कराने की प्रकटतः अतार्किक स्कीम का मूल मकसद ही बेकार चला जाता। अकारण नहीं था कि आयोग ने मार्व में ही विपक्ष की अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर भारतीय सांख्यिकी संस्थान की एक विस्तृत रिपोर्ट के हवाले से कहा था कि चुनाव में प्रयुक्त 10.35 लाख ई.वी.एम. में संे 479 की मतगणना का वी.वी.पैट पर्चियों से मिलान एवं सत्यापन इस पूरी प्रक्रिया की लगभग शत-प्रतिशत विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिये पर्याप्त होगी। सुप्रीम कोर्ट ने 21 पार्टियों की अपील खारिज करते हुये 8 अप्रैल के अपने फैसले में इसका हवाला भी दिया लेकिन वी.वी.पैट. के सेम्पल साइज के बारे में आई.एस.आई. की रिपोर्ट की बात उतनी ही सच थी, जितनी महाभारत के ‘द्रोण पर्व’ में ‘अश्वत्थामा हतः’ की युधिष्ठिर की घोषणा। अश्वत्थामा मारा तो गया था, लेकिन गुरू द्रोण का पुत्र अश्वत्थामा नहीं, बल्कि इसी नाम का एक हाथी।

वह ‘विस्तृत रिपोर्ट’ शेष करने के मौके पर 22 मार्च को जारी आपके चुनाव आयोग की प्रेस रिलीज मुझे याद है — रिपोर्ट भारतीय सांख्यिकी संस्थान, बेंगलुरू की नहीं थी, उसके दिल्ली केन्द्र की भी नहीं, मामला केवल यह था कि संस्थान के दिल्ली केन्द्र के प्रमुख अभय जी. भट्ट, चेन्नई मैथमेटिकल इंस्टीच्यूट के निदेशक और भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के एक उप निदेशक की एक समिति बनवाकर यह रिपोर्ट हासिल की गयी थी। आपकी प्रेस विज्ञप्ति का दूसरा पैरा यह जरूर कहता है कि ‘आई.एस.आई. देश में सांख्यिकी और सैम्पलिंग मेथोडालाजी के अनुसंधान, अध्यापन और अनुप्रयोग का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित संस्थान है’ लेकिन इसकी भूमिका वही थी, जो ‘अश्वत्थामा हतः’ की घोषणा के तुरंत बाद कृष्ण के शंखनाद की। अकारण नहीं कि इस भूमिका के बाद चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में इसे आई.एस.आई. की रिपोर्ट बता दिया और कोर्ट ने इसे मान भी लिया, वैसे ही जैसे रफाल मामले मे केन्द्र सरकार द्वारा सीलबंद लिफाफे में दी गयी इस जानकारी पर उसने भरोसा किया था कि सी.ए.जी. इन लडाकू विमानों की कीमतों सहित सौदे के तमाम मामलों की जांच कर अपनी रिपोर्ट संसद की लोकलेखा समिति को दे चुका है और समिति के निरीक्षण एवं जांच के बाद इसका प्रासंगिक हिस्सा संसद में पेश किया जा चुका है।

बहरहाल, चुनाव इन अत्यंत संदेहास्पद कृत्यों और परिस्थितियों के बीच ही हुये। पहले भी कई बार ऐसे मामले सामने आये, वोट किसी अन्य पार्टी को डाले गये और वी.वी.पैट. ने उसे भाजपा के नाम पर दर्ज किया। इसे ई.वी.एम. का मालफंक्शन कहा गया, जबकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि वोट तो भाजपा को डाला गया और वह दर्ज किया गया किसी अन्य दल के खाते में। ऐसा कंट्रोल्ड मालफंकशन ही तो मैनीपुलेशन होता है। विधानसभा चुनावों के पिछले दौरों में ही नहीं, अभी लोकसभा चुनावों के बीच भी ई.वी.एम. असम्बद्ध व्यक्तियों के साथ, अधिकारियों के साथ, होटलों में, कई बार भाजपा नेताओं के होटलों में, घरों में पाये जाते रहे, मतदान के कई-कई दिन बाद भी स्ट्रांग रूमों के आसपास ई.वी.एम. लदे बसों-ट्रकों का मूवमेंट चलता रहा, स्ट्रांग रूमों में वाटिंग मशीनों का लाना-ले जाना जारी रहा। आयोग ने इसे रिजर्व ईं.वी.एम्स का मूवमेंट’ बता दिया, जबकि यह रहस्य ही रहा कि यह संदेहास्पद मूवमेंट हिन्दी पट्टी और उन्हीं राज्यों में क्यों महदूद रहा, जहां सत्तारूढ पार्टी चुनौती झेल रही थी, रिजर्व ई.वी.एम्स. की ये आवाजाहियां खासकर दक्षिण के उन राज्यों में क्यों नहीं थीं, जहां भाजपा लगभग गैर-मौजूद है। हद तो यह हुई कि पहले न्यूज वेबसाइट ‘न्यूजक्लिक’ ने बिहार, उत्तर प्रदेशा, दिल्ली और मध्यप्रदेश की कई लोकसभा सीटों, और फिर एक अन्य न्यूज वेबसाइट ‘द क्विंट’ ने पहले चार चरणों में 373 सीटों पर हुये कुल मतदान और मतगणना के चुनाव आयोग के ही आंकडों में भारी अंतर की खबर दी। गोदी मीडिया से इस खबर की उम्मीद की भी नहीं जा सकती। लेकिन क्विंट की विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि 373 में से 220 सीटों के लिये गिने गये मतों की संख्या ‘फाइनल वोटर टर्नआउट आफ फेज 1,2,3,ऐंड 4’ शीर्षक से आयोग के ही वेब पेज में दर्ज क्षेत्र में पडे कुल वोटों से हजारो अधिक थी और शेष 153 सीटों में कुल मतदान से बहुत कम। आपके कम से कम चार पूर्ववर्तियों — एन. गोपालास्वामी, एस.वाई. कुरेशी, एच.एस. ब्रह्मा और ओ.पी. रावत को इसमें कुछ तो असामान्य दिखा, तभी उन्होंने कहा भी कि आयोग को इसपर स्पष्टीकरण देना चाहिये। अजीब तो आपके अधिकारियों को भी लगा होगा वरना ‘द क्विंट’ के सवालों के उत्तर देने के आश्वासन के चंद घंटों के भीतर कुल मतदान के आंकडे आयोग की वेबसाइट से गायब नहीं कर दिये जाते।

मुख्य चुनाव आयुक्त साहब! क्या आपको यह अजीब नहीं लगता कि कर्नाटक के नगर पंचायत, टाउन म्युनिसिपल काउंसिल, और सिटी म्युनिसिपल कारपोरेशन  सहित तमाम स्थानीय निकायों के करीब 1300 वार्डों के अभी पिछले हफ्ते हुये चुनावों में उन्हीं मतदाताओं ने जनता दल से अलग, अकेले लडने के बावजूद कांग्रेस को सबसे ज्यादा 510 वार्डों में विजय दिला दी है, जिन्होने पिछले महीने लोकसभा के लिये हुये मतदान में राज्य की 28 में से केवल 1 सीट दी थी। क्या आपको यह भी अनोखा नहीं लगता कि महीने भर पहले जो मतदाता भाजपा को लोकसभा की 25 सीटें थमा देते हैं, वे ही स्थानीय निकायें में उसे केवल करीब 400 वार्ड देते हैं।

मुझे यह ‘एक व्यक्ति एक वोट’ के मेरे और तमाम व्यस्क भारतीयों के महान अधिकार की विदाई का मामला लगता है। मुझे गंभीर संदेह है कि हमारा मत गिना नहीं जा रहा और 20 लाख ई.वी.एम. के लापता होने को लेकर अर्से से मुंबई और ग्वालियर हाई कोर्ट में चल रहे मुकदमों के बावजूद चुनाव इन्हीं मशीनों से कराने और वी.वी.पैट की 50 प्रतिषत पर्चियों से भी ई.वी.एम. की मतगणना का मिलान नहीं करने के आपके आयोग के इसरार ने इन संदेहों को गहरा ही किया है।

माननीय मुचुआ महोदय, आपमें और टी.एन. शेषण साहब में एक समानता भी है। विलोमों में भी एक समानता तो होती ही है। शेषन ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संचालन का जो आदर्श स्थापित किया था, उससे बडा मयार बना पाना तमाम परवर्ती मुख्य चुनाव आयुक्तों के लिये एक चुनौती बनी रही। वे हद से हद उन आदर्शों पर खरे उतर सकते थे, अधिकतर ने यह कोशिश भी की पर आपने अब एक नयी चुनौती पेश कर दी है, जिसके पार केवल वह जा सकेगा जो चुनाव के नाटक का भी उपक्रम न करे। ‘हाउ डेमोके्रसीज डाई’ की भूमिका में यों ही नहीं कहा गया है कि ‘लगभग पूरी दुनिया में फासीवाद, कम्युनिज्म और सैनिक षासन जैसी खुल्लम खुल्ला तानाशाहियों के दिन अब लद चले हैं’ और ‘लोकतंत्रों का पराभव आज मतपेटियों से षुरू होता है।’ कहीं ‘स्टीवन लेवित्स्की और डेनियल जिब्लैट’ की यह बात हमारे देश के लिये कोई भविष्यवाणी तो नहीं।

विदा, इस सदिच्छा के साथ कि यह अनिष्ट न हो।

राजेश कुमार

लेखक जनसरोकारों वाले वरिष्ठ   पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।
इस बार के लोकसभा चुनाव में  चुनाव आयोग की भूमिका पूरी तरह संदेह के घेरे में रही।  मतदान की तिथियों की घोषणा से लेकर आचार संहिता लागू करने को लेकर उसने जो फैसले लिए, वे सभी विवादों में रहे।वरिष्ठ पत्रकार  राजेश कुमार ने टी एन शेषण से लेकर आयोग के नेतृत्व की समीक्षा  खुले पत्र के माध्यम से की है।-सम्पादक मंडल

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