महात्मा गांधी और सरदार पटेल के गुजरात से उत्तरप्रदेश और बिहार के कामगारों और उनके परिजनों को मारकर भगाया जाना कौनसे भारत की तस्वीर पेश करता है या किस ‘गुजरात मॉडल’ का दिग्दर्शन कराता है? दरअसल, यह सब उस सोच की फसल है, जिसे लंबे समय से नफरत के नारों से सींचा जा रहा है- कभी राष्ट्रवाद के नाम पर, कभी गोरक्षा के नाम पर तो कभी किसी धार्मिक मसले को लेकर। अतीत में आरक्षण विरोध के नाम पर हुए दलित-सवर्ण दंगे और फिर भीषण हिन्दू-मुस्लिम दंगे का गुनाहगार भी गुजरात ही है। 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की राजधानी दिल्ली सहित देश के कई शहरों में हुआ हजारों निर्दोष सिक्खों का कत्लेआम भी इसी तरह की नफरत भरी सोच के चलते हुआ था।

वैसे यह सोच एक प्रदेश या एक महानगर की सीमा तक ही सीमित नहीं है। यह देश के हर हिस्से में अलग-अलग शक्ल और छोटे-बडे रूप में मौजूद है। महाराष्ट्र में भी आए दिन बिहार और उत्तर प्रदेश के कामगारों के साथ वही सब होता है जो अभी गुजरात में हो रहा है। हैरानी और क्षोभ की बात है कि यह सब उन राजनीतिक जमातों के लोग करते हैं जो खुद को सबसे बडा देशभक्त मानते हैं। हैरानी इस बात पर भी होती है कि आए दिन रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुस्लिम शरणार्थियों को लेकर गलाफाड रुदन करने वाले इस पर खामोशी क्यों अख्तियार किए हुए हैं।

गुजरात से लेकर दिल्ली तक कथित तौर पर विकासवादी और देशभक्त सरकार है। वह अपने उन नागरिकों को रोजगार नहीं दे पा रही है, जो विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी आदि की तरह देश की बैंकों को चुना लगाकर विदेशों में नहीं जा बसे हैं, बल्कि अपनी धरती, अपना गांव, अपने माता-पिता और पत्नी-बच्चों को छोड़कर उनके भरण-पोषण की जुगाड में देश के महानगरों या दूसरे राज्यों में जाते हैं। वहां धरती उनका बिछौना होती है और आकाश उनकी छत।

वहां वे अपने रोजगारदाताओं की गालियां तथा तरह-तरह की झिडकियां और उलाहने सुनते-सहते हुए हाडतोड मेहनत कर रोजी-रोटी कमाते हैं। ऐसे जब उन्हें पिटाई और निर्वासन की पीडा से दो-चार होना पड जाए तो किसे दोष दिया जाए? वे किस विकसित होते भारत पर गर्व करे और किस भारतमाता की जय बोले? दरअसल, इसके लिए वे लोग तो इसके लिए दोषी हैं ही, जो उनके साथ मारपीट करके उन्हें पलायन के लिए मजबूर करते हैं, लेकिन उनसे ज्यादा और असली गुनाहगार तो सरकार में बैठे वे लोग होते हैं जो अपनी अकर्मण्यता और नाकामी छुपाने के लिए मारपीट करने वाले तत्वों के दिमाग रुपी खेतों में नफरत की फसल बोते हैं।

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