जाने-माने पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता कुलदीप नैय्यर को गुजरे आज एक साल बीत गया। मैं जब 2007 में दिल्ली आ गया तो बहुत कम सप्ताह ऐसे रहे होंगे जब उनसे मुलाकात नहीं हुई। जब लंबा अंतराल होता था तो उनकी बुलंद आवाज फोन पर सुनाई देती थी, ‘‘कहां हो? काफी समय से आए नहीं? हमारी मुलकात का वक्त शाम का रहता था और मैं अक्सर लेट हो जाया करता था। फिर उनकी डांट पड़ती थी। इससे बचने के लिए मैं आने का पक्का समय बताने के बदले पांच-छह बजे आने की बात करता तो वह बोलते पक्का समय बताओ। हमारी कई मुलाकातों में एनडी पंचोली या प्रो अजीत झा होते थे तो डांट का सहभागी उन्हें होना पड़ता था। इधर कुछ समय से उन्होंने डांटना छोड़ दिया था। उन्हें जिंदगी की शाम गहरी हो जाने का अहसास हो गया था!
वह वक्त का पाबंद थे। कभी किसी कार्यक्रम में लेट नहीं होते थे। एक बार सिटीजंस फार डेमोक्रेसी का कार्यक्रम सुबह दस बजे शुरू होना था। मैं तथा पंचोली जी दोनों समय पर नहीं पहुंच पाए। पंचोली जी को कोर्ट केस के लिए जाना पड़ा। मैं निश्चिंत था कि वह पहुंच गए होंगे। नैय्यर साहब समय पर हाजिर हो गए और उन्होंने फोन लगाया कि कार्यक्रम आज ही है न! उस समय तक न तो कोई आयोजक आया था और न ही कोई भाग लेने वाला। भागते-भागते हम पहुंचे तो जबर्दस्त डांट पड़ी।
शाम को वह नियमित टहलते थे। मुझे उसी वक्त बुलाते थे। शाम को आना, सैर को जाएंगे, उनका आदेश होता था। वह जिस अंदाज में सैर की बात करते थे जैसे किसी यात्रा पर जाने वाले हैं। मैं मुस्कुराता था। शायद टहलना उन्हें एक नई ऊर्जा देता था। यह सैर वसंत विहार में उनके घर के सामने बने पार्क में होती थी जो वाकई एक अच्छा पार्क है।
भारत-पाकिस्तान बंटवारे का दर्द उनके दिल से कभी नहीं गया। वह भारत-पाक संबंधों और कश्मीर समस्या के बारे में बराबर अपनी चिंता जाहिर करते रहते थे। जिंदगी के आखिरी सालों में वह एक बात जरूर दोहराते थे कि यह देश हिंदूवाद के असर में आ गया है। वह कहा करते थे, ‘‘कुछ भी कहो, यह देश हिंदुत्व के असर में आ गया है, मुसलमानों की हैसियत दूसरे दर्जे की हो गई है। देखो न, उनकी बात कौन सुन रहा है ? इस पीढी में कितने लोग हैं जिनके ताल्लुकात मुसलमानों से हैं? लेकिन यह खतरनाक है।’’
उन्हें कश्मीर जैसे इलाके के युवाओं में बढते कट्टरपंथ की चिंता थी। वह बताते थे कि किस तरह उन्होंने श्रीनगर के नौजवानों को संबोधित करते हुए कहा कि वे उम्माह की बात न करें। कश्मीर के मामले में नैय्यर साहब की राय एक बिना पाबंदी वाली सीमा और पूरी स्वायत्तता की थी। वह उम्र भर भारत-पाक के बीच बेहतर संबंधों के हिमायती रहे और उम्र के साथ आई शारीरिक कठिनाइयों के बाद भी बीच-बीच में पाकिस्तान हो आते थे। लाहौर और स्यालकोट के किस्से अक्सर सुनाया करते थे। वह फख्र से बताया करते थे कि अल्लामा इकबाल उनके शहर के थे।
अपने जन्मस्थान को वह कभी भुला नहीं पाए। देश का बंटवारा दिल के कोने में बसे इस शहर को कभी उनसे अलग नहीं कर पाया। सांप्रदायिक नफरत और दंगों ने उनके दिल में कोई दीवार बनाने में सफलता नहीं पाई।  खाली हाथ और अनिश्चित भविष्य लेकर सरहद के इस पारआए नैय्यर साहब पूरी उम्र बंटवारे का जहर निकालने में लगे रहे। वक्त ने उन्हें वकील की जगह पत्रकार बना दिया था और उनके लेखन का बड़ा हिस्सा इसी काम को समर्पित रहा। लोकतंत्र और सेकुलरिज्म में उनका विश्वास कभी डिगा नहीं। गांधी-नेहरू-जेपी का ऐसा असर था कि भारत के भविष्य में उनकी गहरी आस्था बनी रही। उन्हें लगता था कि यह देश हर कठिन दौर को पार कर लेगा। बदलाव के हर छोटे-मोटे अंदोलन को उनका बिना शर्त समर्थन था। दिक्कतों के बावजूद वह देश के दूर-दराज इलाकों में जाते रहते थे और मानवाधिकार के सवाल पर किसी भी सरकार के खिलाफ खड़े हो जाते थे।
अपने निधन के 15 दिन पहले उनके हाथों से हमने द्रोहकाल.काम शुरू कराया। यह शायद उनका आखिरी सार्वजनिक कार्यक्रम था। मीडिया के पतन के इस दौर में वह हमारे हाथों में एक छोटा सा हथियार थमा कर गए। उन्हें हमारा नमन!

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