कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र  के जरिए यह जाहिर कर दिया है कि वह 2019 के चुनाव वैचारिक आधार पर लड़ना चाहती है। पार्टी ने बताया है कि उसके पास एक साफ दृष्टि है और यूपीए-2 में जिन दुविधाओं में वह फंसी थी, उससे बाहर आ गई है। मौजूदा कांगे्रस-अध्यक्ष ने पार्टी को फिर से जीवित होने की संजीवनी  दी है।
भाजपा की यही कोशिश रहेगी कि इसे इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ के नारे का दोहराना बताए और पूछे कि गरीबी कहां हटी। क्या वाकई यह गरीबी हटाओ का फिर से दोहराना है? गौर से देखें तो यह आरोप सतही है। ‘कांग्रेस का ‘हम निभाएंगे’ आजादी के आंदोलन से विकसित विचारों पर आधारित  इक्कीसवीं सदी का कार्यक्रम है जिसे मनमोहन सिंह सरकार ने कूडेदान में फेंक दिया था। उसने प्रणब मुखर्जी, चिदंबरम और आनंद शर्मा के हाथोें में देश की अर्थव्यवस्था को छोड़ दिया था। उन्होंने इसे पूरी तरह बड़े उद्योगपतियों के फायदे में खोल दिया। देश का अमीर पर भी संतुष्ट नहीं था और चाहता था कि खदान, जमीन, नदियां और सारे साधन जल्द से जल्द देशी-विदेशी कंपनियों को सौंप  दिए जाएं। इसमें हो रही देरी को ‘पालिसी पैरालिसिस’ यानि फैसले लेने में लकवा की स्थिति का नाम दिया गया था। कांग्रेस का उस समय का नेतृत्व इसकी सफाई देता फिरता था और वायदा करता था कि वह इसे दूर करेगा।
मोदी कारपोरेट से पालिसी पैरालिसिस दूर कर सत्ता में आए थे और उन्होंने यह वायदा निभाया। उन्होंने वे क्षेत्र भी देशी-विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिए जो अब तक इससे अलग रखे जाते थे क्योंकि इससे देश की सुरक्षा और आजादी को खतरा हो सकता था। लोगों की गाढी कमाई से की गई बचत को बीमा कंपनियों के  हवाले करने में उन्हें देर नहीं लगी। इसके  साथ-साथ इसने रक्षा और संचार के वे क्षेत्र में  देशी-विदेशी निवेश की छूट दे दी। इस नीति में किसानों के कर्ज माफ नहीं हो सकते थे और न ही सरकारी क्षेत्र में रोजगार दिए जा सकते थे। इसके तहत सरकारी  स्कूल और सरकारी अस्पतालों में पैसा भी नहीं  लगाया जा सकता था। इसके तहत लोगों को रोजगार पर खर्च नहीं किया जा सकता था क्योंकि पैसे उद्योगों को देने थे। उद्योग नौकरी नहीं दे सकते हैं, यह कांग्रेस के समय में ही साफ हो गया था, लेकिन मोदी इसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि वह शोमैनशिप और हिंदू-मुसलिम तथा ‘पाकिस्तान को घुस कर मारेंगे’ जैसे जुूमलों से फिर से सत्ता में आ जाएंगे।
राहुल पार्टी की उस वैचारिक दुविधा से बाहर ले आए हैं जिसमें वह 2014 के पहले वह फंसी थी। इसकी दिशा आजादी के आंदोलन की विचारधारा  ने तय की है। पार्टी उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष की उस विचारधारा की ओर लौटी है जिसे चंपारण-सत्याग्रह के बाद पार्टी ने अपनाई थी और जो 1930 के पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव से आगे निकल कर 1942 के भारत छोड़ो प्रस्ताव में मुकम्मल हुई थी। यही वजह है कि उसने किसानों के कर्ज को आपराधिक मामला मानने के बदले सिविल मानने का तय किया है। देश के सबसे गरीब पांच करोड़ परिवारों को गरीबी से बाहर लाने के लिए साल में 72 हजार रूपए देने की बात भी इसी का हिस्सा है।
यह देखना काफी सुखद है कि मीडिया और पाकिस्तान से लड़ने की के नाम पर बने नकली राष्ट्रवाद के कथानक से पैदा हुए राजनीतिक दबाव के आगे पार्टी ने झुकने से इंकार कर दिया है। उसने कश्मीर को लेकर अपनी नीति साफ कर दी है कि वह धारा 370 को खत्म नहीं करेगी क्योंकि यही धारा राज्य  के भारत में विलय का आधार है। उसने आम्र्ड फोर्सेंस स्पेशल पावर एक्ट की समीक्षा का वायदा किया है। उसने देश की उस परंपरागत नीति को अपनाने की बात कही है जिसके तहत कश्मीर में सामान्य स्थिति लाने के लिए सभी पक्षों से बात की जाएगी। भाजपा ने सख्ती का तरीका और बातचीत का रास्ता अपना कर राज्य में शांति के रास्ते बंद कर रखे हैं। उग्र राष्ट्रवाद  की अपनी छवि बनाने के लिए पार्टी राज्य की जनता को दूर करने का काम किया है। यह भले ही उसके हिंदुत्व के कथानक के अनुकूल है, देश की एकता के खिलाफ है।  कांग्रेस ने इस नीति को त्यागने का फैसला किया है, इसके बवाजूद कि भाजपा  चुनावों में उसके खिलाफ इसका इस्तेमाल करेगी।
पार्टी ने राज-द्रोह के कानून को भी रद्द करने का वायदा किया है। मोदी सरकार लोकतांत्रिक आवाजोें को दबाने के लिए इसका इस्तेमाल करती रही है। यह निश्चित तौर पर एक बोल्ड कदम है।
जाहिर है आजादी के आंदोलन की विचारधारा और उसके बाद नए राष्ट्र के निर्माण की विचारधारा की ओर पार्टी के लौटने का ही नतीजा है कि स्वास्थ्य और शिक्षा को सार्वजनिक क्षेत्र में आगे बढाने का तय किया किया गया है। घोषणा-पत्र में बीमा आधारित स्वास्थ्य-सेवा और शिक्षा के निजीकरण की जगह सरकारी स्वास्थ्य-सेवा और सरकारी शिक्षण संस्थानों को मजबूत बनाने फैसला किया गया है। शिक्षा पर जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च करने का वायदा भी इसी का हिस्सा है। मोदी सरकार ने सुनियोजित ढंग से शिक्षा के बाजारीकरण को बढावा दिया है और सरकारी संस्थानों को विकलांग बनाया है।
 उदारीकरण ने किसानों को जिस बदहाली में डाल दिया है, उससे निबटने के लिए उठाए कांग्रेस ने नए कदम उठाने का निश्चय किया है। यह वाम की ओर झुकी दृष्टि से निकले हैं। नई आर्थिक नीति के आने के पहले तक सरकारी क्षेत्र रोजगार का  बड़ा क्षेत्र था। सरकार के 22 लाख और पंचायतों के दस लाख खाली पड़े पदों को भरने का फैसला भी इसी दिशा में बढा कदम है। नई अर्थनीति में सरकारी नौकरियों को कम ही नहीं, बल्कि उसके निजीकरण को तेज किया गया है।
घोषणा-पत्र में सेकुलरिज्म के प्रति अपनी आस्था तो जताई ही गई है, इसमें  महिलाओें के अधिक सशक्तिकरण का वायदा भी किया गया है जो एक प्रकार से  कांग्रेस के दायरे से बाहर के आंदोलनो की  स्वीकृति है। ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण के मुद्दे भी ऐसे ही हैं।
सबसे बड़ा सवाल है कि क्या चुनाव की बहस उस ओर लौट पाएगी जिस ओर कांग्रेस लौटी है। घोषणा-पत्र जाहिर होने के बाद वित्त मंत्री अरूण जेटली के बयान से साफ हो जाता है कि भाजपा हिंदुत्व और नकली राष्ट्रवाद  के मुद्दे  पर लड़ेगी  जिसमे  पाकिस्तान, मुसलमान और सेना प्रमुख हैं। ये तीनों राम मंदिर के मुद्दे के लोक मानस में खारिज होने के बाद प्रमुखता में आए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह चुनाव मजाक और छिछोरेपन से भरे संवादों के सहारे लड़ना चाहते हैं, लेकिन राहुल गांधी उन्हें खींच कर विचार के अखाड़े में लाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। ‘हम निभाएंगे’ घोषणा-पत्र उनकी इसी कोशिश को दिखाता है।
 कांग्रेस तो विचारधारा की अपनी पुरानी छतरी में ऐसे दौर में लौटी है जिसे कारपोरेट ने बेकार साबित कर रखा है। वह लोगों को यह समझाने मंे लगा है कि  सरकारें खुशहाली नहीं ला सकती हैं। उपभोग और मनोरंजन का जो बड़ा बाजार खड़ा हुआ है, वह भी गांधी-नेहरू या वामपंथ को वैचारिक रूप से असफल बताता है। क्या लोगों को फिर से दूसरी ओर लौटा ले जाना आसान होगा? भाजपा क्या विपक्ष की कई पार्टियां भी इस ओर जाना नहीं चाहती हैं। यह घोषणा-पत्र इस चुनाव से आगे तक जाता है। इसे महीनों पहले आना चाहिए था।

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