इंदौर की लोकसभा सीट भाजपा से छीनने के लिए कांग्रेस करीब तीन दशक से छटपटा रही है। कांग्रेस की एक पूरी पीढ़ी ‘ताई’ को सांसद की कुर्सी पर बैठे देखते हुए बुढाने लगी! वे अकेली ऐसी महिला सांसद हैं, जो एक ही लोकसभा सीट और एक ही पार्टी से लगातार 8 लोकसभा चुनाव जीती हैं। लेकिन, इस बार माहौल कुछ अलग है! इंदौर जैसे भाजपा के गढ़ में विधानसभा चुनाव में पार्टी की दुर्गति के बाद भाजपा को खतरा नजर आने लगा है। विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे में ‘ताई’ और ‘भाई’ यानी कैलाश विजयवर्गीय में हुई खींचतान का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा है! इंदौर संसदीय क्षेत्र की 8 में से कांग्रेस ने चार सीटें जीतकर पार्टी का सारा गणित बिगाड़ दिया। पार्टी ने इस हार से ये सबक सीखा कि अब ‘ताई’ का जादू ख़त्म हो गया!
यदि ‘ताई’ को टिकट दिया जाता है और उन्होंने 9वीं बार जीत हांसिल की, तो वे नया संसदीय इतिहास रच देंगी! वे देश की पहली महिला सांसद होंगी, जो लगातार 9 बार एक ही पार्टी से लोकसभा चुनाव जीतेंगी! लेकिन, ‘ताई’ को ये इतिहास रचने के लिए इंदौर के सभी गुटों साधना होगा! ख़ासकर कैलाश विजयवर्गीय को साथ लेना होगा, जिनका आज भी शहर में डंका बजता है।
लगातार आठ लोकसभा चुनावों से अजेय बनी सुमित्रा महाजन के लिए इस बार परेशानी कांग्रेस से ज्यादा अपने घरवालों से है। कवि और भाजपा नेता सत्यनारायण सत्तन ने तो ख़म ठोंककर चुनौती दे डाली कि यदि पार्टी ने इस बार भी ‘ताई’ को ही उम्मीदवार बनाया तो वे भी चुनाव लड़ेंगे! जबकि, वे खुद टिकट न मांगकर चार नाम हवा में उछाल रहे हैं। इसमें एक कैलाश विजयवर्गीय का भी है! ये पहली बार नहीं है कि ‘ताई’ खिलाफ माहौल बना हो! 2009 में भी भाजपा के एक गुट ने उन्हें टिकट दिए जाने का विरोध किया था! इस चुनाव में जमकर सेबोटेज भी हुआ था। स्थिति ये आ गई थी कि ‘ताई’ कांग्रेस उम्मीदवार सत्यनारायण पटेल से बमुश्किल साढ़े 11 हज़ार वोट से चुनाव जीत सकी थीं।
 इस बार फिर भाजपा में ‘ताई’ के खिलाफ आवाज उठी है। भाजपा में भी बदलाव का नारा बुलंद होता दिखाई देने लगा है। कभी प्रकाशचंद्र सेठी से इंदौर की चाभी छीनने वाली ‘ताई’ के हाथ से अब चाभी छीनने वालों की लाइन लग गई है! कांग्रेस ही नहीं भाजपा में भी चाभी छीनने वाले बाँह चढ़कर खड़े हैं। ‘ताई’ ने योग्य व्यक्ति को चाभी सौंपने की बात क्या कह दी, उनके विरोधी सक्रिय हो गए! उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राकेश सिंह की मौजूदगी में भी इसी बात को दोहराया तो कैलाश विजयवर्गीय के समर्थन में जमकर नारेबाजी हुई। ये इस बात का संकेत है कि भाजपा में सतह के नीचे काफी खदबदाहट है।
 भाजपा इस बार इंदौर में कोई रिस्क लेगी, ऐसा नहीं लगता! कारण कि विधानसभा चुनाव के टिकट बंटवारे में इन दोनों की तनातनी का नतीजा अच्छा नहीं निकला! ‘ताई’ ने अपने जिन भी समर्थकों को टिकट दिलाया, कैलाश विजयवर्गीय ने उसका विरोध किया! मामला इतना गंभीर हो गया था कि ‘ताई’ को मनाने के लिए नरेद्रसिंह तोमर और विनय सहस्त्रबुद्धे को इंदौर आना पड़ा! ‘ताई’ की बात मान ली गई, पर उनकी पसंद के 5 में से 4 उम्मीदवार चुनाव हार गए। यही कारण है कि पार्टी अब रिस्क लेना नहीं चाहती!
पिछला लोकसभा चुनाव सुमित्रा महाजन करीब साढ़े चार लाख वोट से जीतीं थी। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को संसदीय क्षेत्र की 8 में से 4 सीटें जीती है, इसलिए कांग्रेस मुकाबले को बराबरी का मान रही है। कांग्रेस का मानना है कि उसे प्रदेश में चुनावी वादे पूरे करने का भी फायदा लोकसभा चुनाव में मिलेगा। कांग्रेस के उत्साह की वजह ये भी है कि 2014 में साढ़े 4 लाख का जीत का आंकड़ा विधानसभा चुनाव में घटकर करीब 95 हज़ार रह गया! साथ ही इस बार लोकसभा चुनाव में करीब 25 लाख 70 हजार मतदाता वोट डालेंगे! जबकि, विधानसभा चुनाव में करीब 24 लाख 80 हजार मतदाता थी। करीब एक लाख नए मतदाताओं के नाम जुड़े हैं। इनमें भी ऐसे युवा मतदाता ज्यादा हैं, जो पहली बार वोटिंग करेंगे। दरअसल, ये नए मतदाता ही फैसला करेंगे कि लोकसभा में उनका अगला प्रतिनिधि किस पार्टी का और कौन होगा!
 इंदौर लोकसभा की सीट देश की हाईप्रोफाइल सीटों में से एक है। इंदौर सीट का पहला चुनाव 1957 में हुआ था। इस चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार खादीवाला जीते थे। इसके बाद 1984 तक इस सीट से कांग्रेस ही जीतती रही! लेकिन, 1989 में जब भाजपा ने सुमित्रा महाजन को इस सीट पर उतारा तो इसके बाद से यह सीट उन्हीं के नाम हो गई! उन्होंने इस चुनाव में कांग्रेस के भारी भरकम नेता प्रकाशचंद्र सेठी को हराया। जबकि, सुमित्रा महाजन इससे पहले महेश जोशी से विधानसभा चुनाव हार चुकी थीं। वे 1982-85 में इंदौर महापालिका में पार्षद भी रही हैं। सुमित्रा महाजन का राजनीतिक जीवन 1980 के दशक में शुरू हुआ, जब वे इंदौर की उप-महापौर चुनी गईं थी। पर, लोकसभा उनको इतनी रास आई कि वे तीन दशक में 8 चुनाव जीत चुकी हैं। इन 8 चुनाव में कांग्रेस ने हर बार उन्हें हराने के लिए सारी कोशिशें की, पर अभी तक सफलता नहीं मिली। देखना है इस बार पार्टी उन्हें उम्मीदवार भी बनाती है या किसी और को मौका देती है।

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