लोग चकित हैं कि चुनाव आयोग जैसी संस्था ने इस तरह आम जनों का भरोसा कैसे खो दिया है। उसने सुप्रीम कोर्ट के दबाव में नेताओं के खिलाफ कार्रवाई तो शुरू की, लेकिन यह साबित करने में विफल हो गया कि निष्पक्ष है। यह साफ दिखाई दे गया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ तो कार्रवाई नहीं ही कर सकता, साधारण उम्मीदवारों के खिलाफ भी ज्यादा कुछ नहीं कर सकता है। टीवी चैनल बेरोकटोक सांप्रदायिक जहर फैला रहे हैं और विज्ञापन वाली खबरें और इंटरव्यू प्रसारित कर  रहे हैं। लेकिन आयोग कुछ नहीं कर सकता है। बिना लाइसेंस वाला प्रचार चैनल नमो टीवी ढिठाई के साथ अपने प्रोग्राम चलाता रहा। चुनाव खर्च, पेड न्यूज और आचार संहिता के दौरान सरकारी फैसले जैसे मुद्दे आयोग की चिंता से पूरी तरह बाहर हो गए हैं।
आयोग को लकवा मार देने का असर यह हुआ है कि हर संस्था चुनाव के दौरान सत्ताधारी पार्टी से अलग  खड़े होने के संवैधानिक बंधन तोड़ चुकी हैं। विपक्ष के नेताओं के यहां छापे पड़ रहे हैं और अधिकारी सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचाने वाले बयान दे रहे हैं। अखबारों में खबरें लीक करा रहे हैं। देश में पहली बार बड़े ओहदे पर बैठे अधिकारी  इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं। नीति आयोग का प्रमुख सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ता की भूमिका में खड़ा हो जाता है तो जिला के अधिकारी प्रधानमंत्री के चुनावी भाषण के लिए जानकारी इकट्ठा करने लगते हैं। पहले आचार संहिता के लागू होते ही चुनाव आयोग का डर उन्हें घेर लेता था। अब किसी को कोई डर नहीं रहा।
चुनाव आयोग अब लोकतंत्र के रक्षक का नहीं रहा। वह एक ऐसी प्रबंधन संस्था में तब्दील हो चुका है जिसका काम सिर्फ ईवीएम मशीन पहुंचाना, बूथों पर सुरक्षा या पुलिस बल तैनात करना और लोगों को लाइन में लगा कर मतदान कराना रह गया है। उसने सोशल मीडिया पर नजर रखने की बात कही थी। वहां फेक न्यूज से लेकर गाली-गलौच का काम बदस्तूर जारी है और चुनाव पर असर डालने वाले सारे तरीकेे अपनाए जा रहे हैं। मुख्यधारा के नियंत्रित मीडिया पर जब नकेल कसना उसके वश में नहीं है तो सोशल मीडिया के अराजक मीडिया पर वह क्या नजर रख पाएंगा ? सरकारी चैनल पर सभी को बराबर का मौका देने की जो परंपरा बनी थी, वह भी गायब हो चुकी है। सत्ताधारी पार्टी का नियंत्रण साफ दिखाई देता है।
 क्या आयोग का यह हश्र इसलिए हुआ है कि भाजपा सरकार ने अपनी पसंद के अधिकारी हर जगह तैनात कर दिया है जो हर हाल में सत्ताधारी पार्टी का साथ देंगे ? यह सच है कि मोदी ने पूरे पांच साल 2019 के चुनावों की तैयारी में बिताई है और उन्होंने अपने समर्थकों को जरूरी जगह तैनात किए हैं।  पहले भी सरकार अपनी पसंद के अधिकारी चुनती थी। लेकिन अब तक का इतिहास यही रहा है कि चुनाव आयोग जैसी संस्था में पहुंचने के बाद हर अधिकारी ने कोशिश की कि वह इसकी कसौटी पर खरा उतरे। यह एक संस्था के रूप में आयोग की प्रतिबद्धता थी। चुनाव के तरीके में क्रांतिकारी बदल लाने वाले टीएन शेषण की गिनती भी यहां आने के पहले एक वफादार अधिकारी के रूप में होती थी। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभालते ही उन्होंने चुनाव आयोग का कायाकल्प कर दिया और आयोग के असीममित अधिकारों से लोगों को परिचित कराया और लोगों को ज्ञान कराया कि चुनाव लोकतंत्र के प्राण हैं।
आखिर चुनाव आयोग और बाकी संस्थाएं देखते-देखते पतन की ओर कैसे आगे बढ गईं? ज्यादातर लोग इसे अधिकारियों की व्यक्तिगत अवसरवाद के रूप में देखते हैं या सत्ताधारी पार्टी की तानाशाही को इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि ये दोनों चीजें पहले भी दिखाई दे चुकी हैं।  इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा कर तानाशाही लाई थी और नौकरशाही उनकी मुट्ठी में थी। लेकिन यह व्यक्तिगत तानाशाही थी। नौकरशाही को सिर्फ इस काम मेें मदद करनी थी कि श्रीमती गांधी सत्ता में बनी रहें। एक प्रधानमंत्री के रूप में वह किसी अंबानी या अडानी के लिए काम नहीं कर रही थीं। वह एक जनता के प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में रहना चाहती थीं। इसलिए नौकरशाही में बैठे लोगों को भी किसी व्यापारिक घराने के वफादार के रूप में काम नहीं करना था। आपातकाल में सरकारी दफ्तरो के भ्रष्टाचार पर भी चोट करने की कोशिश की गई थी। लोग कहने लगे थे कि कार्यालयों में काम होने लगा है और रेल समय पर चलने लगी है।
उस समय एक और महत्वपूर्ण बात यह थी कि अधिकरियों की ट्रेनिंग कुछ इस तरह होती थी कि उन्हें लगता था वे कि उन्हें संविधान के लिए काम करना है। संविधान, संसद और लोकतांत्रिक परंपराओं में उनकी गहरी आस्था थी। उदारीकरण ने उनके नजरिए में परिवर्तन ला दिया। मंत्री और नेता बोलने लगे कि सरकार का काम व्यापार नहीं है और उन्हें आर्थिक क्षेत्र में कम हस्तक्षेप करना चाहिए।
नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस नीति को और भी बढा-चढा कर आगे किया। प्रधानममंत्री मोदी कहने लगे कि कम से कम सरकार और ज्यादा से ज्यादा सुशासन। इसका मतलब है कि हर जगह सरकार दिखाई नहीं देगी। उनकी सरकार सरकार प्रत्यक्ष तौर पर कारपोरेट घरानों के लिए काम करने लगी। मनमोहन सिंह सरकार भी प्राइवेट सेक्टर के हित में काम कर रही थी। लेकिन कुछेक मंत्रियों को छोड़ कर पूरी सरकार किसी व्यापारिक घराने के लिए काम नहीं कर रही थी। कम से कम, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में  तो यह सोचा भी नहीं जा सकता है। वे किसी एक कंपनी के बोलबाला के इतने खिलाफ थे कि उन्होंने लार्सन एंड टूब्रो को हथियाने की अंबानी की कोशिशों को विफल करने के लिए खुद हस्तक्षेप किया। इस कंपनी का बड़ा हिस्सा सरकारी कंपनियों के हाथ में किया।
यह जगजाहिर है कि मोदी गुजराती व्यापारिक घरानों, खासकर अडानी और अंबानी के लिए पूरी ताकत लगाते हैं। इससे सारी परिस्थिति ही बदल जाती है। अफसरों का चयन भी इन घरानों की पसंद से होता है। इस तरह कारपोरेट ही यह तय करने लगता है कि सरकार किस तरह चले। कारपोरेट दलाली में अग्रणी भूमिका निभा रही नीरा राडिया के टेपों को सुनने के बाद पता चलता है कि उसने मंत्रियों, पत्रकारों और अफसरों को एक गिरोह तैयार किया था। मंत्रियों में अधिकांश डीएमके जैसी पार्टियों के लोग थे जो सरकार को समर्थन देने के लिए ब्लैकमेलिंग कर सकते थे। राडिया के टेप बाहर मनमोहन सिंह की सरकार में बाहर आए। इसके अलावा टूजी तथा कोयला से लेकर अन्य घोटाले भी बाहर आए और उनपर कार्रवाई हुई। मीडिया और संस्थओं के ताकतवर वजूद का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है?
लेकिन  मोदी सरकार में हर संस्था विकलांग नजर आती है। सरकार के घोटालों के बाहर आने की बात तो दूर, सरकार आरटीआई के जरिए भी कोई जानकारी नहीं देती है। यह सब इसलिए संभव है कि नौकरशाह कारपोरेट के नुमाइंदे के रूप में काम कर रहे हैं। कारपोरेट की दलाली में लगी नीरा राडिया के सहयोगियों पर नजर डालें तो साफ हो जाएगा कि मोदी सरकार ने उन्हें किनारे करने के बदले ऊंचे-ऊंचे पदों से नवाजा है। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा भी उन्हीं मंे से एक हैं। राडिया टेप में शामिल टाइम्स नाउ की नाविका कुमार प्रधानमंत्री के यशोगान में सबसे आगे हैं। वे सरकार के प्रचारक की तरह काम कर रही हैं।
अफसरों का दूसरा प्रभावशाली समूह हिंदुत्वादियों का है जिसकी सूची आरएसएस से आती है। वह मोदी सरकार को वापस सत्ता में  लाने की कसम खाए बैठा है। कारपोरेट के नुमाइंदों और आरएसएस के काडर की तरह काम करने वाली नौकरशाही से आप संविधान की रक्षा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। दोनों के रास्ते में संविधान ही खड़ा होता है। दोनों की दुश्मनी संविधान से है। एक गरीबों को उनका हक देना नहीं चाहता और दूसरा सैंकड़ों साल से मानव होने के अधिकारों से वंचित लोगों को उनका वाजिब देना नहीं चाहता। इसने लोकतंत्र को एक बंद सुरंग में धकेल दिया है। देखना है कि 2019 में यह किस तरह इससे बाहर आता है,समाप्त

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