लोकसभा चुनावों के 59-59 सीटों के  दो चरण बचे हुए हैं।  देश के  बाकी हिस्सों में  जनता ने राजनीतिक पार्टियों के भविष्य को ईवीएम में सुरक्षित कर दिया है। जो स्थिति  उभर कर  आ रही है , वह हंग पार्लियामेंट  की है।  इसके लिए हिन्दी मे एक शब्द है ‘त्रिशंकु सदन’, जो राजनीतिक विश्लेषकों का प्रिय शब्द रहा है।  त्रिशंकु का अर्थ है ‘निराधार यानी ‘लटका हुआ’। .कुछ ऐसी ही लोकसभा हमे 2019 में देखने को मिल सकती है।
काँगेस 2014 में इतिहास की सबसे बुरी स्थिति देख चुकी है।  उसके पास सिर्फ 44 सीटे ही आ पायी। लेकिन अब सभी मान रहे हैं कि यह सीट बढ़ने वाली है।  सीधा गणित तो यही बताता है कि अगर उसकी सीटे बढ़ती है तो भाजपा की ही सीटे कम होगी।  इसका नुकसान भाजपा को झेलना होगा।
अति उत्साह में लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस 2004 वाली स्थिति दोहरा सकती है। लेकिन जब 2004 में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा तो उसके पास 28% वोट थे और अब कांग्रेस का वोट 19.6% ही रह गया है। 2009 के चुनाव में भी कांग्रेस ने ने कुल 206 अर्थात् 38 जीती थीं और उनका वोट शेयर 29 प्रतिशत रहा था।  इसका अर्थ है कि अगर 200 के लगभग सीट लानी है तो काँगेस को 10 प्रतिशत का स्विंग चाहिए जो अभी मुमकिन नही है।  इस बार सभी क्षेत्रीय गैर–एनडीए राजनीतिक दल मजबूत होकर उभरते दिख रहे हैं। इसका नुकसान भाजपा के साथ कांग्रेस को भी उठाना पड़ सकता है।
जो दल मजबूत होकर उभर रहे हैं, वे हैं उत्तर प्रदेश से सपा-बसपा, तेलंगाना से टीआरएस, ओडिशा से बीजद, आंध्र प्रदेश से वाईएसआर कांग्रेस और पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस।
जिन पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में इनका आधार है,. वहां लोकसभा की कुल 185 सीटें हैं।  इन छह दलों को पिछले चुनाव में महज 78 सीटें मिली थीं लेकिन इस बार यह संख्या 125 से 135 के रहने के करीब दिख रही हैं।
सबसे बड़ा फर्क इस चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन डालने वाला है।  2014 में बसपा 19.77 प्रतिशत वोट लेकर एक भी सीट नहीं जीत पायी थी। समाजवादी पार्टी भी 22.35 प्रतिशत वोट लेकर सिर्फ 5 सीटें जीत सकी थी।  लेकिन अब यह मिलकर लड़ रही है तो भाजपा के वोट शेयर 42.63 के आसपास पुहंच जाती है।  2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों  में सपा-बसपा का कुल वोट प्रतिशत और भाजपा का वोट प्रतिशत लगभग बराबर है।  यदि इसी आधार पर दोनों के वोट प्रतिशत को जोड़ें तो तो सीटो की संख्या में बड़ा परिवर्तन  है।  इस हिसाब से यूपी में एनडीए की सीटें 73 से 37 ही रह जाएँगी।  लेकिन यदि एंटीएनकबन्सी को ओर जोड़ दे तो यह आकंड़ा 30 तक सिमट सकता है।
यानी साफ है कि दिल्ली की गद्दी पर कौन बैठेगा यह एक बार फिर उत्तर प्रदेश ही डिसाइड करने जा रहा है।
दो राज्य ऐसे हैं  जहाँ भाजपा को इस बार बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। ये दो राज्य पश्चिम बंगाल और ओडिशा हैं। यहां 2014 में भाजपा को 63 में से सिर्फ तीन सीटें ही मिली थीं। ओडिशा में बीजद है और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांगेस शामिल है। यहां पर अन्य विपक्षी दलों में पश्चिम बंगाल में वामपंथी और ओडिशा में कांग्रेस है
इसमे सबसे बड़ी भूमिका वामपंथी पार्टियों की हैं।  यदि 2014 में पश्चिम बंगाल में भाजपा को वामपंथी पार्टी को मिले वोटों का पूर्ण हस्तांतरण होता तो बंगाल में भाजपा बड़ी विजय हासिल कर सकती थी।  इस बार भी उसकी नजर इन्हीं वामपंथी वोटो पर ही है।  ऊपर ही ऊपर तृणमूल का हव्वा दिखाया जा रहा है , लेकिन मूल रूप से वामपंथी वोटो में ही सेंध मारी जा रही हैं। फिर भी यदि भाजपा 2 सीट से 10 सीट भी यहाँ कर ले तो वह उत्तर प्रदेश के नुकसान की भरपाई नही कर पाएगी।  उड़ीसा में भी बीजद अपना किला करीब-करीब बचाती दिख रही है।
यानी वही तस्वीर उभर रही है जिसे हंग पार्लियामेंट कहा जा रहा है और क्षेत्रीय दल अपनी बढ़ती हुई सीटों के बदौलत यूपीए के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं।

Comments