प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शपथ-ग्रहण समारोह उनके बाकी कार्यक्रमों की तरह ही चकाचैंध भरा था। मीडिया ने उसे उसी तरीके से दिखाया भी। लेकिन वह उन चीजों को पकड़़ने में नाकामयाब रहा जो कैमरे के सामने तो थीं, लेकिन जिसे देखने के लिए एक खुली नजर चाहिए थी। देशी-विदेशी मेहमानों पर नजर दौड़ाता कैमरा एक ऐसी शख्सियत पर आ गया जिसके बारे में मीडिया बता चुका था कि वह इस समारोह में शिरकत नहीं करेंगी। खबर आ चुकी थी कि शपथ लेने के पहले प्रधानमंत्री के साथ चाय पीने वालों में पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज शामिल नहीं हुई हैं और शपथ-ग्रहण के समारोह में भी वह भाग नहीं लेंगी। समारोह में उनकी एंट्री ने भले ही भाजपा के गणितज्ञों को चैंका दिया हो, वह शालीनता और गौरव से भरपूर थी। खिले चेहरे के साथ हाथ जोड़े वह जब आगे बढी तो फीका सा माहौल सच में खुशनुमा हो गया। उन्होंने अपने परिचित मिलनसारिता का परिचय दिया और सोनिया गांधी तथा राहुल से भी पूरी आत्मीयता से मिलीं। दशकों से देश की राजनीति में एक जाने-पहचाने चेहरे के रूप में मौजूद सुषमा जी ने सक्रिय राजनीति से बिना शोर-शराबे के अपने को अलग कर लिया। उनके चेहरे पर संतोष का भाव साफ दिखाई दे रहा था। उन्होंने पूर्व वित्त मंत्री अरूण जेटली की तरह प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर पार्टी की ओर से मिले दायित्वों के लिए कोई आभार नहीं जताया, लेकिन उनकी उपस्थिति में अपनी पार्टी ही नहीं, राजनीतिक बिरादरी के उन सभी लोगों के प्रति आभार था जिनके साथ वह उठती-बैठती और झगड़ती रही हैं। वह पद के लिए विलाप करने वाले राजनेताओें के समूह से अलग होकर एक संतोष से भरे नेता के रूप में दिखाई दे रही थीं। पांच सालों तक पद पर रहते हुए वह उसकी ताकत से वंचित रहीं, लेकिन उन्होंने इसे सहजता से सह लिया।  उन्होंने विदेश मंत्रालय में अपने लिए विदेश में रहने वालों की समस्या हल करने वाली ऐसी भूमिका तलाश ली जिसने उन्हें प्रधानमंत्री से टकराव से बचा लिया। वक्त  आने पर वह खामोशी से हट गईं। लोक सभा चुनाव नहीं लड़ना उनका इस ओर पहला कदम था। स्वास्थ्य की परेशानी ने इसमें जरूर अपनी भूमिका निभाई।
लेकिन सुषमा स्वराज की विदाई की घोषणा के साथ चल रहे यह मोदी सरकार-दो के उस तेवर के शंखनाद को मीडिया पकड़़ नहीं पाया जो वह अपने पहले कार्यकाल में नहीं दिखा सकी है। वैसे ये तेवर सीमित रूप में पहले भी दिखाई दे रहे थे। लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ जो सलूक सबके सामने किया जा रहा था, वह एक नई राजनीतिक संस्कृति का संकेत था। इस संस्कृति की कठोरता मंचों और समारोहों में हाथ जोड़े खड़े आडवाणी की ओर नजर नहीं फेरते प्रधानमंत्री मोदी के दृश्यों में साफ झलकती थी, भले ही मीडिया उसे खबर बनाने को तैयार नहीं था।
इस कठोरता का प्रतिकार करना भाजपा की संस्कृति नहीं है। शायद सुषमा भी इस संस्कृति   से परिचित थीं, इसलिए उन्होंने खामोशी से अपने को अलग कर लिया। जेटली इस कठोर संस्कृति के साथ मजबूती से खड़े थे और उन्होंने चुनाव-अभियान के दौरान भी मोदी का बचाव करने में ंकोई कसर नहीं छोड़ा। लेकिन उनके पत्र से जाहिर होता है कि उनकी वफादारी असरदार साबित नहीं हुई। उन्हें मंत्रिमंडल में रहना कोई आसान नहीं लगा। उनके पत्र से तो यही भाव जाहिर होता है। उन्होंने बता दिया है कि डाक्टरों ने उनके स्वास्थ्य की अधिकतर समस्याएं सुलझा दी हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि अनौपचारिक जिम्मेदारी के लिए उनके पास पर्याप्त समय होगा। यह दर्शाता है कि उनका स्वास्थ्य काम करने की इजाजत देता है और उनके पास समय भी है। सुषमा ने ऐसी इच्छा  जाहिर नहीं की है।
मोदी-शाह की सत्ता का स्वरूप शपथ-ग्रहण और विभाग के बंटवारे से सामने आ गया। मोदी अपने दम पर हासिल सत्ता में भाजपा के किसी पुराने नेता को हिस्सेदार नहीं बनाना चाहते हैं। वह नहीं चाहते कि 2014 की तरह उन्हें सत्ता में पुराने नेताओं को साझीदार बनाना पड़े। यह मजबूरी इसलिए आई कि उस समय उन्होंने भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था और पार्टी की पूरी मशीनरी पर उनका कब्जा नहीं था। इस बार उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी केे रूप मंें चुनाव लड़ा है। इस बार पार्टी काफी पीछे छूट चुकी है और उसके नेता भी। पिछली बार उन्हें मंत्रिमंडल के सदस्य चुनने में वैसी आजादी नहीं थी जैसी इस बार थी। तीनों महत्वपूर्ण विभाग उन्होंने वैसे लोगों के हाथ में दी है जिनका संबंध पार्टी की पुराने ढांचे से नहीं है। प्रधानमंत्री के बाद सबसे महत्वपूर्ण गृह मंत्री का पद अमित शाह ने अपने हाथ में रख लिया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर पार्टी से बाहर के हैं और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन भी मोदी-काल में ही तेजी से सीढियां चढी हैं। राजनाथ सिंह को भले ही नंबर दो बनाया गया है, उनसे गृह मंत्रालय छीन कर उनका कद छोटा कर दिया गया। सहज भाव से मोदी और शाह की जोड़ी को स्वीकार करने वाले इस वरिष्ठ नेता को इसकी उम्मीद नहीं रही होगी। उन्होंने गृह मंत्रालय में प्रधानमंत्री और अमित शाह के हस्तक्षेप बर्दाश्त किए हैं, लेकिन पद छीने जाने का अंदाजा उन्हें नहीं रहा होगा।  पता नहीं, उन्हें रिटायर होने की सलाह दी गई थी या नहीं। मोदी का कार्यकाल पूरा होने के पहले ही उन्हें मार्गदर्शक मंडल में भेजने की कोशिश होगी। मीडिया उनके चेहरे पर बर-बार उभरती चिंता को पकड़ नहीं पाया।
नीतीन गडकरी को जिस तरह  परिवहन मंत्रालय में रोक रखा गया है और प्रकाश जावडेकर को मानव संसाधन विकास मंत्रालय के बदले उनके पहले के सूचना-प्रसारण मंत्रालय और पर्यावरण तथा वन मंत्रालय में भेज दिया गया है, उससे यही अंदाजा होता है कि महाराष्ट्र में मोदी-शाह कोई नया समीकरण बनाने की कोशिश में हैं। गडकरी के उपप्रधानमंत्री बनने की खबर मराठी मीडिया में शोर के साथ चल रही थी। उन्हें उनकी हैसियत बता दी गई।
जावडेकर की जगह मानव संसाधन विकास मंत्री रमेशचंद्र पोखरियाल निःशंक प्रधानमंत्री के विश्वासों को दिल से सही मानते हैं। उन्हें भरासा है कि ज्योतिष तूफान और सुनामी की भविष्यवाणी कर सकता है और हमने लाखों साल एटम बम का विस्फोट किया था। वैसे स्मृति ईरानी की तरह उनकी डिग्री को लेकर भी विवाद है।
मीडिया शपथ-ग्रहण समारोह के पीछे बन रही इन खबरों पर अपनी नजर डालने के बदले एक झूठ को स्थापित करने में लगा था कि ओडिसा से चुन कर आए और राज्यमंत्री पद पाने वाले प्रतापचंद्र षाडंगी को गांधी साबित करने के काम में लगा था। बजरंग दल से जुड़े रहे इस सांसद पर सात आपराधिक मुकदमे हैं जो सांप्रदायिक मामलों से जुड़े हैं। वह 1999 में ईसाई पादरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बच्चों को जिंदा जलाने के समय बजरंग दल के प्रदेश अध्यक्ष थे। उन्हें शुरूआती पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया था और जांच के लिए गठित आयोग ने भी उनके और बजरंग दल की भूमिका की जांच नहीं की क्योंकि राज्य में भाजपा-बीजेडी की सरकार थी।
कन्हैया कुमार को हरा कर आए गिरिराज सिंह को तरक्की देकर कैबिनेट मंत्री और षाड़ंगी को राज्य मंत्री बना कर मोदी ने हिंदुत्व के आक्रामक झंडाधारियों को अपने समर्थन का ऐलान कर दिया हैै । दोनों पशुपालन मंत्रालय संभालेंगे। जाहिर है कि गोरक्षा के एजेंडे  को आगे बढाएंगे।
इन सबके बीच अपनी पार्टी के मंत्रियों की संख्या बढाने की मांग पर अड़े नीतीश कुमार ने मंत्रिमंडल से बाहर रहने का फैसला किया। उनकी घोषणा को मीडिया ने कम करके ही दिखाया। इसका असली अर्थ तो कुमार ने बाद में खुद बता दिया कि वह नहीं मानते कि बिहार में किसी व्यक्ति के नाम पर वोट मिला है। यह मोदी-मोदी के कोरस को बेसुरा करने वाला बयान है। मीडिया खुद इस कोरस में शामिल रहना चाहता है। वह नीतीश की बात को कैसे महत्व दे सकता है?
मीडिया मोदी सरकार-दो के आगमन को दिखा कर भी दिखा नहीं पाया क्योंकि वह इस घटना के कारण भारतीय राजनीति के बदलते चित्र पर नजर डालने में नाकामयाब रहा। लेकिन इसके शुरूआती संदेश आने वाली राजनीति की दिशा बताते हैं। मोदी-शाह की जोड़ी ने मंत्रियों के चयन से बता दिया है कि भाजपा की नहीं उनकी सरकार है और इसमें उदारता के लिए जगह नहीं होगी।

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