यातायात नियमों को लेकर केंद्र सरकार का नया कानून आया है। इसमें नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने के कहरबरपा प्रावधान हैं। ये डरावने प्रावधान आमजन को आतंकित करते हैं। बेशक हमारे देश में सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या भी भयावह है। देश के सबसे साफ-सुथरे शहर इंदौर में ही अखबारों में रोज ऐसी मौतों की कई खबरें होती हैं। इसके बावजूद ये शहर हेलमेट पहनने को तैयार नहीं। पहनने से ज्यादा नहीं पहनने के तर्क हैं इस शहर के पास। आप इस शहर को सुधारोगे? वो भी डंडे के जोर पर? जुर्माने के कहर के जोर पर? बात सिर्फ इंदौर की ही नहीं, बल्कि हिंदी पट्टी के सभी छोटे-बडे शहरों की यही कमोबेश यही कहानी है।

भले ही मध्य प्रदेश सरकार ने इस कानून को अपने यहां लागू नहीं किया है, लेकिन केंद्र सरकार की मंशा तो साफ यही है। बोले तो सबको एक लकड़ी से हांकना। इसका विरोध होना चाहिए। इसके विरोध में सबसे पहला तर्क ये है कि नागरिकों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। बेशक सरकार के बनाये नियमों का पालन नागरिकों की जिम्मेदारी है। तो क्या इसका मतलब ये कि नियम या कानून बनाने के बहाने आपको लोगों की जेब काटने का अधिकार मिल गया ? वो भी पूरे देश में और सबकी? आप कहेंगे, नियम से चलो तो कोई दिक्कत नहीं। बिलकुल, नियम से चलने में कोई दिक्कत नहीं, लेकिन सरकार साहब, व्यवस्था ऐसी भी होना चाहिए कि नियमों का पालन आसान या कष्ट रहित हो। इसे यूँ समझें कि व्यवस्था ऐसी हो कि नागरिकों को नियम के उल्लंघन की नौबत ही न आये या आये तो कम से कम आये। जाहिर है ऐसी व्यवस्था करना सरकार की जिम्मेदारी है।

नमूने के लिए इंदौर को ही लेते हैं। कोई 35 लाख की आबादी वाला ये शहर बहुत तेजी से बढ़ा है और वैसे ही बढ़ रहा है। इस शहर की मेगा या सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है यहां सस्ती और सुलभ लोक परिवहन सेवा का बड़ा और सुव्यवस्थित नेटवर्क। अलबत्ता इस शहर का जो भी बहुआयामी फैलाव, विस्तार या विकास हुआ है उसमें ऐंड-बेंड विकास ज्यादा है। ऐंड-बेंड से आशय है मनमाना, अंधाधुंध और अनियोजित विकास। सो यहां वैसी कारगर, सस्ती-सुलभ लोक परिवहन सेवा टेढ़ी खीर। इसीलिए यहां पर निजी क्षेत्र की सिटी बसों से लेकर कार-टैक्सी आदि के बावजूद उससे कई गुना और हजारों की तादाद में लोक परिवहन के अन्य वाहन भी चल रहे हैं। जमा इस पूरे नेटवर्क के होते शहर में निजी वाहनों की संख्या अचंभे में डालने वाली है। यहीं इंदौर की लोक परिवहन व्यस्वस्था पर सवाल उठता है कि वो अपने मकसद में कामयाब क्यों नहीं? लोक परिवहन सेवा का मकसद ही ये होता है कि एक बड़े शहर में सस्ते और सुविधाजनक मूवमेंट का लाभ लोगों को मिले। ऐसा कि शहर में उन्हें अपने निजी वाहन को चलाने की जरूरत न पड़े या कम से कम पड़े। इससे शहर की सड़कों से निजी वाहनों का दबाव कम होता है। इसका मतलब ये कि लोग उस सेवा-सुविधा का उपयोग करते हैं और नतीजे में लोगों से नियमों के पालन या उल्लंघन की संभावना भी कम होती है। अब लोग निजी वाहन कम चलाएंगे और लोक परिवहन वाहनों में चलेंगे तो नियमों के उल्लंघन के मामले भी कम होंगे न। सो ये सरकार की जिम्मेदारी है कि वो ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करे। इसके बजाय उसका जोर जनता को जबरन मानसिक और आर्थिक त्रास देकर ऐसे निदान के उपाय पर है जिसमें हींग लगे न फिटकरी, रंग आए चोखा।

उधर, इंदौर में मेट्रो लाने की बात हो रही है। भगवान का शुक्र है कि बीआरटीएस टूटने से बचा हुआ है। मालूम हो कि बड़े शहरों में यातायात सुधार का सबसे सस्ता उपाय बीआरटीएस है। मेट्रो और बाकी सब इससे खूब महंगे। ये सारे लोक परिवहन के आजमाए हुए टूल हैं। मुंबई में लोकल ट्रेन की महिमा और महत्ता सब जानते हैं। बसें और अन्य वाहन वहां भी चलते हैं। दिल्ली में मेट्रो की माया है। सो इंदौर में अभी जो लोक परिवहन की व्यवस्था है, उसमें या खोट है या वो नाकाफी है। या फिर निजी वाहन चलाना इस शहर में मजबूरी है। यदि कोई किफायती, सुविधाजनक और सुव्यवस्थित विकल्प सुलभ हो तो लोग निजी वाहन के बजाय उसे तरजीह भी दें। भूले नहीं कि इंदौर में बहुत बड़ी तादाद में लोग लोक परिवहन के साधनों का उपयोग करते भी हैं। बस इसे मुक्कमल और व्यवस्थित करने की जरूरत है। हालांकि यह भी सच है कि यहां के लोगों का वाहन चालन का स्तर आदतन बदतर है। इस मामले में वो पढ़े-लिखे निरक्षर हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि जुर्माना या उसके डर से सब साक्षर हो जाएंगे। उलटा डर ये है कि इससे दूसरी गड़बड़ियां पैदा होंगी। अभी ही हम अखबारों में पढ़ते हैं कि हमारी पुलिस देशी-विदेशी शराब दुकानों के बाहर मोर्चा जमाती है और वहां से शराब पीकर लौटते लोगों के चालान काटती है। कितनी सयानी है न हमारी पुलिस। सोचो नए कानून में उनको मिलने वाला टारगेट और उनका निजी लालच क्या गुल खिलाएगा। हालांकि वो साल में कई बार लोगों को नियम से चलने की समझाइश के फूल भी देती है और अपनी कथित गांधीगीरी का पूरा मजा भी लेती है। लोग फिर भी नहीं सुधरे। यानी आपके जुगाड़ के फूलों की गांधीगीरी भी नकली और फिजूल साबित। कोई दो मत नहीं कि यातायात सुधार के कई बहुत खर्चीले उपाय भी पुलिस और नगर निगम ने आजमाए हैं, लेकिन बात बनी नहीं है। असल में एक निरुपायता और असहायता की स्थिति है। ऐसे में केंद्र सरकार का ये उपाय ऐसा है गोया भीड़ नहीं संभल रही है तो लाठी चार्ज कर दो।

यों केंद्र सरकार ने यह किया है कि कानून बनाकर अपनी बला राज्यों पर डाल दी है। हैरत की बात ये है कि इसमें उन सौ शहरों को भी शुमार किया है, जो केंद्र के ही स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में चयनित हैं और स्मार्टाधीन हैं। क्या इसका मतलब ये माना जाए कि केंद्र ने इन सौ शहरों से भी अपने हाथ ऊंचे कर दिए हैं ? कायदे से तो उसे इन सौ शहरों में यातायात की और अन्य सारी आवश्यक व्यवस्थाएं पहले जुटानी चाहिए। इंदौर की बात करें तो हकीकत यही है कि यहां लोक परिवहन को सस्ता, सुलभ और सुव्यवस्थित करने में अभी बहुत गुंजाइश है। दरअसल इसके लिए योग्य और विशेषज्ञ दिमाग दरकार हैं। अभी तो ये हालत है कि किसी जुलूस, यात्रा या वीआईपी मूवमेंट से आये दिन शहर के यातायात का कचूमर निकलता है, जिसमें शहर की कानून-व्यवस्था संभालने वालों का दम भी शामिल होता है। खैर।

उम्मीद है जुर्माने वाले कानून को परे कर राजनीतिक और व्यवहारिक तौर पर सही निर्णय लेने वाली राज्य सरकार इस दिशा में भी अपने विवेक का इस्तेमाल करेगी। अभी इस कानून को लागू करना वैसे भी उचित नहीं है कि देश का बड़ा भूभाग अभी तोड़फोड़ से लेकर बाढ़ आदि विपदा से दो-चार है। फिर मंदी अलग मातम कर रही है। ऐसे में साफ दिख रहा है इस कानून को लागू करने से पहले या इस पर ठीक से विचार नहीं हुआ या फिर कानून के जरिए निजाम का संदेश है कि वो आपको इस तरह भी ठीक करने के लिए कृत संकल्पित और तत्पर है और पीछे नहीं हटेगा। यदि ऐसा है तो ये व्यवस्था निर्माण का नहीं, अपितु सनक का लक्षण है।

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