कोई माने या न माने मगर हकीकत यही है कि पिछले पांच साल के दौरान विपक्ष का सडक से यानी आम जनता से नाता पूरी तरह टूट गया था, इसलिए लोकसभा चुनाव में उसका जिस तरह सफाया हुआ, उसे एक फिल्मी गीत की तर्ज पर कहें तो ‘यह तो होना ही था।’

यह ठीक है कि चुनाव में जिन मुद्दों को उठाया जाना चाहिए था वे सारे मुद्दे विपक्ष ने पूरी शिद्दत से उठाए। नोटबंदी की विभीषिका, जीएसटी का दिशाहीन अमल, विकराल रूप लेती बेरोजगारी की समस्या, खेती-किसानी की दुर्दशा, रॉफेल विमान सौदे की गडबडी, संवैधानिक संस्थाओं का अवमूल्यन, गोरक्षा के नाम दलितों और मुसलमानों का देशव्यापी उत्पीडन आदि मुद्दे तमाम विपक्षी नेता पूरे चुनाव अभियान के दौरान उठाते रहे। लेकिन जनता ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। कहा जा सकता है कि इन सारे मुद्दों पर फर्जी राष्ट्रवाद, धार्मिक ध्रुवीकरण और सत्तारूढ दल का चमक-दमक भरा प्रचार-कुप्रचार भारी पड गया। लेकिन सवाल विपक्ष से ही है कि वह जिन मुद्दों को चुनाव के दौरान उठा रहा था, क्या वे सारे मुद्दे पिछले पांच छह महीने के दौरान ही पैदा हुए थे?

दिमाग पर बहुत जोर डालने पर भी याद नहीं आता कि पिछले पांच साल के दौरान विपक्ष ने जनता से जुडे किसी भी मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए सडकों पर उतर कर कोई आंदोलन किया हो, पुलिस की लाठियां खाई हो या जेलें भरी हो। विपक्षी नेता इन मुद्दों पर सिर्फ मीडिया में बयान देने की रस्म अदायगी करते रहे। टीवी चैनलों पर रोजाना होने वाली कुत्ताघसीट बहसों में भी विपक्षी दलों के ज्यादातर प्रवक्ता सत्तारूढ दल के प्रवक्ताओं और अपढ-कुपढ एंकरों की बकवास में फंसकर उनके सामने उलजुलूल दलीलों के साथ घिघियाते-रिरियाते ही दिखे।

ईवीएम की कथित गडबडियों को लेकर भी विपक्षी नेता सिर्फ गाल बजाते रहे। अगर ईवीएम की गडबडियों की शिकायतें वाकई उन्हें गंभीर लग रही थीं तो उसको लेकर वे अपने कार्यकर्ताओं के साथ सडकों पर क्यों नहीं उतरे? मणिपुर और गोवा में जिस तरह सत्तारूढ दल ने विधायकों की खरीद-फरोख्त और राज्यपाल की मदद से जनादेश का अपहरण किया, उसको लेकर भी विपक्ष ने कोई आंदोलनात्मक तेवर नहीं दिखाए।

पांच महीने पहले छोटे से सूबे छत्तीसगढ में बडी तथा राजस्थान और मध्य प्रदेश मिली साधारण सी जीत भी विपक्ष और खासकर कांग्रेस के लिए अभिशाप ही साबित हुई, क्योंकि इस जीत ने कांग्रेसी नेताओं को बेहद अहंकारी और आत्ममुग्ध बना दिया और उन्हें यह मुगालता हो गया था कि देश की जनता उसकी तरफ उम्मीदभरी टकटकी लगाए हुए है, लिहाजा उसके लिए अब दिल्ली दूर नहीं है। उनका यह मुगालता जनता ने आम चुनाव में निर्ममता से दूर कर दिया।

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