कश्मीर के अवन्तिपोर, पुलवामा में 14 फरवरी 2019 को सीआरपीएफ के काफिले में घुस कर विस्फोटकों से भरी स्कॉर्पियो से टक्कर मार कर हमारे 44 बहादुर जवानों को शहीद करने वाले खूंखार आतंकवादी संगठन ‘जैश ए मोहम्मद’ का सरगना और मास्टर माइंड वही मौलाना मसूद अज़हर है जिसे एनडीए-1 की अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने दिसम्बर 1999 के अंत में गांधार (अफगानिस्तान) ले जाकर छोड़ा था।

आतंकवादी हाईजैकर्स ने नेपाल से दिल्ली आ रहा विमान हाईजैक कर लिया था और उसे गांधार ले गए थे। यात्रियों और क्रु स्टाफ को सही सलामत छोड़ने के एवज में उन्होंने जम्मू-कश्मीर की जेल में बन्द आतंकवादी मौलाना मसूद अज़हर तथा तीन अन्य आतंकवादियों को छोड़ने तथा उन्हें यात्रियों के बदले में गांधार सही सलामत लाने की शर्त रखी थी। हमारी सॉफ्ट सरकार से यात्रियों के परिजनों का विलाप और आक्रोश देखा नहीं गया और हमारे विदेश मंत्री जसवंतसिंह स्वयं मसूद अज़हर को लेकर गांधार गये और आतंकवादियों की एवज में यात्रियों और क्रु स्टाफ को वापस लेकर आये।

उसी मौलाना अज़हर मसूद ने रिहा होने के बाद पाकिस्तान का सबसे खतरनाक आतंकवादी और फिदायीन (आत्मघाती) संगठन ‘जैश ए मोहम्मद’ सन 2000 में खड़ा किया। वही संगठन पिछले 18-20 साल से भारत के कश्मीर में खतरनाक आतंकवादी फिदायीन हमलों के लिये जिम्मेदार है। इसी आतंकवादी संगठन ने 18 सितम्बर 2016 को उड़ी (URI) में सेना के कैम्प पर हमला कर 18 जवानों को शहीद कर दिया था। इनके बाद मोदी सरकार ने सेना को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) में घुस कर ‘सर्जिकल स्ट्राईक’ करने का आदेश दिया था, जिसे सेना के कमांडोज़ ने बखूबी कर दिखाया।

मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राईक का खूब राजनीतिक श्रेय लिया जबकि वह विशुद्ध रूप से सेना की कार्रवाई थी। प्रधानमन्त्री मोदी ने उसके बाद उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश तथा गुजरात की चुनावी सभाओं में बार-बार यह दावा किया कि ‘सर्जिकल स्ट्राईक’ ने पाकिस्तानी आतन्कवाद की कमर तोड़ दी है। ‘सर्जिकल स्ट्राईक’ के बाद सेना ने कश्मीर में ‘ऑपरेशन आलआउट’ चलाया। जिसके परिणामस्वरूप सैकड़ों आतंकवादी और उनके प्रमुख कमांडर मारे गए। ‘ऑपरेशन आलआउट’ की सफलता से यह लगने लगा था कि कश्मीर में आतंकवादी संगठनों की कमर टूट गयी है, लेकिन पुलवामा की इस दर्दनाक घटना ने उसे गलत सिद्ध कर दिया है।

सेना के काफिले पर आत्मघाती फिदायीन हमले में ‘जैश ए मोहम्मद’ ने पहली बार स्थानीय युवा आतंकवादी को आत्मघाती बम की तरह इस्तेमाल किया है। इस हमले को अंजाम देने वाला फिदायीन 21 साल का आदिल अहमद डार उर्फ वकास कमांडो पिछले साल अप्रैल में ही ‘जैश ए मोहम्मद’ में शामिल हुआ था और दक्षिण कश्मीर के गुंडीबाग, काकपोरा, पुलवामा का ही रहने वाला था। 10 वीं पास आदिल जैश के ‘अफ़ज़ल गुरु स्क्वॉड’ का सक्रिय सदस्य था और उस पर तीन लाख का इनाम था।

इस फिदायीन हमले से पहले ही गुप्तचर एजेंसियों द्वारा बार-बार अलर्ट जारी किया जा रहा था कि 8 से 15 फरवरी के बीच कोई बड़ा फिदायीन हमला होगा, क्योंकि 9 फरवरी को संसद पर हमले का अपराधी आतंकी अफजल गुरु और 11 फरवरी को आतंकी मकबूल बट की बरसी थी। इसके बावजूद सुरक्षा व्यवस्था में कहां और क्या चूक हुई इसकी जांच एनआईए और एनएसजी द्वारा की जाएगी।

कश्मीर में पिछले 20 साल में कई बड़े आतंकवादी हमले हुए हैं, जिनमें बड़ी संख्या में हमारे जवान शहीद हुए हैं तथा इसके अलावा सैकड़ों निर्दोष नागरिक भी मारे गए हैं। कुछ बड़े आतंकवादी हमले इस प्रकार हैं –

  1. 2001 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर हमला जिसमें 41 लोग मारे गए,
  2. 2002 में जम्मू के कालूचक में 36 जवान शहीद हुए,
  3. 2003 में काजीगुंड में आईडीए विस्फोट में बीएसएफ के 19 जवान शहीद हुए तथा उनके परिवार के 11 सदस्य मारे गए,
  4. जून 2016 में पम्पोर में सीआरपीएफ के 8 जवान शहीद हुए और 22 घायल हुए,
  5. 18 सितम्बर 2016 को उड़ी में सेना के बेस कैम्प पर फिदायीन हमला जिसमें 18 जवान शहीद हुए। इसी हमले के बाद ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ को अंजाम दिया गया था।

पुलवामा के इस फिदायीन हमले से एक बात साफ हो गयी है कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और ‘ऑपरेशन आलआउट’ से आतंकवादी संगठनों की कमर टूटने के जो दावे किये जा रहे थे उनमें पूरी सच्चाई नहीं है। जितने आतंकवादी मरते हैं उतने ही उनकी जगह लेने के लिये तैयार रहते हैं। पुलवामा की इस दर्दनाक घटना से एक तथ्य और सामने आया है कि अब जैश जैसे आतंकवादी संगठनों ने फिदायीन या आत्मघाती हमलों के लिये स्थानीय युवाओं की भर्ती और ट्रेनिंग शुरू कर दी है। इससे न सिर्फ सुरक्षा बलों का सिरदर्द बढ़ेगा बल्कि यह कश्मीर को ‘तालिबानीकरण’ की ओर भी धकेल सकता है। कश्मीर का पढ़ा-लिखा लेकिन बेरोजगार युवा आतंकवाद के रास्ते पर न जाये इसका कोई ठोस उपाय  हमारी सरकार और राजनीतिक दलों को खोजना ही होगा।

हर बड़ी आतंकवादी घटना के बाद धुर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों द्वारा पाकिस्तान को सबक सिखाने की तथा ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करने की मांग शुरू हो जाती है, लेकिन इस तरह की कार्रवाइयों से कश्मीर की समस्या हल होने वाली नहीं है, क्योंकि कश्मीर की समस्या सैन्य या कानून-व्यवस्था की समस्या है ही नहीं। यह मूलतः एक राजनीतिक समस्या है और इस समस्या का राजनीतिक हल ही निकल सकता है। पुलवामा की इस घटना के बाद दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों ने सर्जिकल स्ट्राईक जैसी ‘कड़ी कार्रवाई’ करने की मांग शुरू भी कर दी है। स्वयं प्रधानमन्त्री ने यह कह कर कि ‘शहीद जवानों की शहादत को बेकार नहीं जाने दिया जाएगा’ इस ओर संकेत कर ही दिया है। टीवी के सुरमा एंकर तो पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने तक की बातें कर देश में युद्ध का उन्माद पैदा कर आम जनता में देशभक्ति का जज़्बा भरने में जुट ही गये हैं। अब थोड़े दिनों के भीतर एक ओर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की जाएगी और फिर उसे आगामी आमचुनाव में जोर-शोर से भुनाया जाएगा।

इसके बावजूद कश्मीर की समस्या जहां की तहां बनी रहेगी। क्योंकि पाकिस्तान के साथ युद्ध या बार-बार की जाने वाली ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी कार्रवाइयां कश्मीर समस्या का स्थायी हल नहीं हो सकती हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि पाकिस्तान भी एक परमाणु सम्पन्न राष्ट्र है और उसकी पीठ पर चीन का हाथ भी है। पाकिस्तान के साथ युद्ध कश्मीर समस्या का स्थायी हल पहले भी नहीं था और अभी भी नहीं है। यदि युद्ध से ही कश्मीर समस्या को हल होना होता तो वह 1947-48, 1965, 1971 और 1999 में ही हो गयी होती। हमें और पाकिस्तान को आजाद हुए 71 साल हो चुके हैं। इन 71 सालों में दोनों देशों में चार युद्ध हो चुके हैं, इसके बावजूद न तो हम पाकिस्तान से पीओके छीन पाये और न वह हमसे हमारा कश्मीर छीन सका है। सैन्य शक्ति के बल पर दोनों में से कोई भी देश पूरे कश्मीर पर अपना आधिपत्य नहीं जमा सकता। यही वास्तविक स्थिति है जिसे दोनों देशों के नीति नीतिनिर्माताओं को समझना होगा। इसलिये युद्ध इस समस्या का कोई स्थायी हल नहीं है।

पाकिस्तान के साथ कश्मीर समस्या के स्थायी हल का गम्भीर प्रयास प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ ने किया था। उस समय अटलजी की सरकार के ही दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों ने अटल-मुशर्रफ वार्ता को उसके अंजाम तक नहीं पहुँचने दिया। कश्मीर समस्या का स्थायी हल तभी सम्भव है जब दोनों देश वर्तमान नियंत्रण रेखा (LOC) को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) मान लें। इसका अर्थ यह है कि कश्मीर का जो हिस्सा भारत के पास है वह हमारे पास ही रहेगा और पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर   (POK) उन्हीं के पास रहेगा। कश्मीरी अधिक स्वायत्तता चाहते हैं। अतः सुरक्षा, मुद्रा, संचार तथा विदेशनीति को छोड़कर शेष सभी मामलों में दोनों तरफ के कश्मीरियों को पूरी आजादी रहेगी। कश्मीर में राष्ट्रपति या राज्यपाल के शासन के नाम पर केंद्र की शक्तियां थोपी नहीं जाएंगी। कश्मीर के दोनों हिस्सों में आवागमन तथा व्यापार-व्यवसाय करने की पूरी छूट रहेगी। यही कश्मीर समस्या का स्थायी और यथार्थवादी हल है।

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