2019 के लोकसभा के तीन चरण पूरे हो चुके हैं।  कुल 543 सीटों में से 301 सीटों पर पर वोट डाले जा चुके हैं और अब आखिरी चार चरणों में 240 सीटों पर वोट डाले जाएंगे।   बीजेपी ने इन 240 सीटों में से 161 और कांग्रेस ने मात्र 9 सीटों पर जीत दर्ज की थी।  इसलिए ये चार चरण दोनों दलों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
यही  समय है कि मुड़कर यह देखा जाए कि सेफालोजी की दृष्टि 2014 के  परिणाम क्या थे और आज के संदर्भ में ऊँट किस करवट बैठ रहा है।
सेफालोजी वोट शेयर की बात करती है।  किस तरह से वोट स्विंग होकर आश्चर्य जनक परिणाम देता है, इस बात पर रोशनी डालती हैं।  बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की  बुरी हार का अंदाजा नही लगा पाए थे।  यदि उन्होंने सेफालोजी के बेसिक पर ध्यान दिया होता तो वह आसानी से इसका अंदाजा लगा सकते थे। .2013 के छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी के वोट पर्सेंट का अंतर एक फीसदी से भी कम था। बीजेपी को जहां 41.04 पर्सेंट वोट मिले थे, वहीं कांग्रेस को 40.29 पर्सेंट वोट मिले थे। यही मामूली अंतर पलट गया और परिणाम बीजेपी के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए।
अब देखते हैं कि 2014 के चुनाव के आंकड़े क्या रहे हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार बड़ी पार्टियों में भाजपा ने चुनाव में 282 सीटें जीती हैं,  जबकि इसे लगभग 17.16 करोड़ वोट [31 प्रतिशत] मिले। कांग्रेस को केवल 44 सीटें मिलीं। जबकि उसे 10.7 करोड़ वोट [19.3 प्रतिशत] मिले हैं। वोट मिलने के मामले में बसपा तीसरे नंबर पर रही है। उसे 2.3 करोड़ वोट [4.1 प्रतिशत] मिले हैं। लेकिन उसे एक भी सीट नहीं मिल सकी। 34 सीटों पर इसके उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे। 3.4 प्रतिशत वोटों के साथ मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सपा ने भी पांच सीटें जीतीं थी, लेकिन 3.8 प्रतिशत वोट प्राप्त कर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने 34 सीटें जीतीं। जयललिता के नेतृत्व वाले अन्नाद्रमुक ने 37 सीटें जीती हैं। जबकि उसे 3.3 प्रतिशत ही वोट मिले। दूसरी ओर 3.3 प्रतिशत वोट प्राप्त कर माकपा केवल नौ सीटें जीत पाई।
यहां पर एक बहुत महत्वपूर्ण बात  भी राजनीतिक पंडित मिस कर गए।  जब मोदी की लहर मानी जा रही थी, तब भी बहुमत के लिए जरूरी 272 में से 282 सीटे ही मिल पायी थी यानि सिर्फ 10 सीट ज्यादा।
वैसे भारी बहुमत से आयी सरकारों के लिए भी 50% से अधिक वोट शेयर पाना लगभग नामुमकिन सा ही है।  1951 से अब तक हुए चुनाव में किसी पार्टी को 50% से अधिक वोट शेयर नहीं मिला।  1984 तक 8 आम चुनावों में सरकार बनानेवाली पार्टी का वोट शेयर 40 प्रतिशत से ज्यादा ही रहा।
एक ओर बात समझिए। लोकसभा चुनाव 2014 में बीजेपी को पिछले आम चुनाव के मुकाबले 2014 में 12 प्रतिशत ज्यादा मतदाताओं का समर्थन हासिल हुआ था।  ऐसा पहली बार हुआ था कि बीजेपी ने 30% से ज्यादा वोटों पर कब्जा किया।
ये यूपीए के दस साल की एंटीएनकबन्सी से उपजा हुआ वोट था जिसे अन्ना आंदोलन घोटालों, भ्रष्टाचार आदि ने भाजपा की तरफ शिफ्ट कर दिया।
इस बार राजनीतिक पंडित एंटीएनकबन्सी को पूरी तरह से इग्नोर कर रहे हैं।  जहाँ तक मैं समझ रहा हूँ 31 प्रतिशत से इनका वोट शेयर अब डाउन होगा क्योंकि यह अपने पीक पर पुहंच चुका है क्योकि इस बार मोदी विरोधी वोट भी एकजुट हो रहा है।
चुनाव आयोग के मुताबिक 2009 में 114 सीटों पर जीत-हार का अंतर तीन प्रतिशत से कम था। खास बात यह है कि ऐसी सीटों की सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश में थी।  यूपी में इतने कम अंतर से सबसे ज्यादा सीटें बसपा और सपा को गंवानी पड़ीं।  भाजपा ने इन्हीं सीटो पर अपना पूरा ध्यान लगाया और उसे अपेक्षित सफलता मिली थी।  उत्तर प्रदेश में बीजेपी का वोट प्रतिशत 2009 के लोकसभा चुनावों के लगभग 18% के मुकाबले 2014 में 42.3% तक पहुंच गया।  इस तरह पार्टी ने इस प्रदेश में 24% का पॉजिटिव वोट स्विंग हासिल करने में सफलता प्राप्त की. बिहार में भी पार्टी को 2014 के लोकसभा चुनावों में पिछले आम चुनावों के मुकाबल 15% ज्यादा वोट मिले थे।
 कांग्रेस को लोग किसानों आदिवासीयो या पिछड़े हुए गरीब की पार्टी मानते  रहे हैं जबकि  बीजेपी उच्च सम्पन्न या मध्यवर्ग ओर व्यापारी वर्ग की पार्टी मानी जाती रही है। 2014 में यह मिथक टूट गया। 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने देश के ग्रामीण इलाकों की 52 प्रतिशत सीटों पर कब्जा किया था।   सीएसडीएस के डाटा के मुताबिक, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बीजेपी को शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा वोट मिले थे।
राज्यों में बीजेपी को यह सफलता अपने बढ़े हुए सामाजिक आधार के कारण मिली थी।  पार्टी को अपने परंपरागत व्यापारी और ऊंची जातियों के वोटों के अलावा दलितों और पिछड़ी जातियों से भी पर्याप्त समर्थन मिला था।  लेकिन क्या यही बात आपको इस चुनाव में दिखाई दे रही है?
यदि हम 2014 के बाद हुए चुनावों को देखे तो यह वर्ग लगातार उससे छिटक रहा है।  2014 के लोकसभा चुनाव के बाद ज्यादातर विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट परसेंटेज कम हुआ।  2015 के बिहार चुनावों में बीजेपी के वोट शेयर में लगभग 5% की कमी आई और यह 25% से भी नीचे रह गया।  गोवा में, भाजपा का वोट शेयर लोकसभा चुनाव से गोवा विधानसभा चुनाव 2017 तक 22 प्रतिशत अंक नीचे आ गया है।  दिल्ली में 2015 के चुनाव में भाजपा के वोट शेयर में 14 प्रतिशत की गिरावट आई। गुजरात के चुनाव में, भाजपा का वोट शेयर 11 प्रतिशत अंक नीचे लुढ़क गया है।   हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की हार में भी यही पैटर्न देखा गया है।
सेफालोजी का नियम है कि किसी राज्य में यदि किसी पार्टी का प्रदर्शन अच्छा होता है तो उसकी सीटों की संख्या भी बढ़ती है।  यदि कांग्रेस समेत दूसरे दल इन विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं तो यह माना जाना चाहिए कि उनकी सीटों की संख्या इस लोकसभा चुनाव में बढ़ रही है जिसका सीधा नुकसान भाजपा को हो रहा है।
मोदी अब भी सबसे बड़े नेता हैं, लेकिन 2014 जैसे नहीं।  उस वक्त वो सपने बेच रहे थे। इस बार हकीकत की पथरीली ज़मीन पर खड़े हैं। लोग उनसे पूछ रहे हैं कि उन्होंने 5 सालो में क्या किया और दिखाने के लिए उनके बहीखाते में कुछ खास नहीं है, जबकि राहुल अब 2014 जैसे नेता नहीं हैं।  अब वह पप्पू की छवि से बहुत आगे निकल आए हैं।  राहुल अब मोदी को टक्कर देने वाले नेताओं की कतार में सबसे आगे हैं।
लोगों ने बिला शक 2014 में मोदी का समर्थन किया था और वे भाजपा के सभी शानदार वादों जिसमें-नौकरियों, किसानों को उच्च मूल्य, बेहतर शिक्षा, प्रभावी स्वास्थ्य सेवा, भ्रष्टाचार से मुक्ति, शांतिपूर्ण समाज प्रदान करना आदि वादों से बहुत प्रभावित थे ओर आज हम सभी जानते है कि उन सभी वादों को निभाने में वह बुरी तरह से विफ़ल रहे हैं।  2019 का लोकसभा चुनाव इन्हीं तथ्यों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

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