निसंदेह तीन तलाक़ (फ़ौरन तलाक़)  हानिकारक है,  परन्तु उसे  रोकने के लिए लाया गया कानून भी जल्दबाजी में बनाया गया नज़र आता है।  यह ऊपर से भाता है, लेकिन गौर से देखने पर अधूरा नज़र आता है। मुस्लिम महिला (विवाह में अधिकारों की सुरक्षा) अध्यादेश, 2018 धारा 2 ), (बी3, 4 और 7 (सी)  सुनिश्चित करता है कि तलाक़-ए-बिद्दत  देने जैसा काम अगर कोई मुस्लिम पति करता है तो इसे स्वयं एक स्वतंत्र अपराध के रूप मे माना जायेगा और इसके साथ ही यह सुनिश्चित करता है कि इन मामलों में पति तुरंत गिरफ्तार किया जा सकेगा।   ट्रिपल तलाक़ की सूचना से  संबंद्धित शिकायत पीड़ित पत्नी या उसके परिवार का कोई भी सदस्य कर सकता है ।

परंतु हिन्दू मैरिज एक्ट से संबंधित पारिवारिक मामलों मे ऐसा कोई विशिष्ट प्रावधान नही नज़र आता जो यह सुनिश्चित करे कि  एक हिंदू अगर अपनी पत्नी को अचानक छोड़ देता है और तुरंत सारे संबंध खत्म कर दिए जाते हैं  तो पति के इस कृत्य /व्यवहार को स्वयं एक स्वतंत्र अपराध के रूप मे  माना जाये  और  यहाँ  कोई प्रावधान यह भी सुनिश्चित नही करता है कि ऐसा करने पर पति को तुरंत गिरफ्तार किया  जा सकेगा।

 सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा शायरा बानो बनाम भारत सरकार में 22 अगस्त 2018 को दिए गए फैसले में कहा गया है कि “ट्रिपल तलाक की यह प्रथा असंवैधानिक है और इसी वजह से मुस्लिम समुदाय के बीच प्रचलित इस  प्रथा का चलन पूर्ण रूप से रद्द किया जाता है” ।

साथ ही, सुप्रीम कोर्ट  की संवैधानिक पीठ ने पैरा 6 में  सुप्रीम कोर्ट के शमीन आरा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2002)  के मामले मे दिए गए आदेश का उल्लेख भी किया है जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक़ के बारे में कहा गया था कि पति-पत्नी के बीच तलाक के पहले समझौता/मध्यस्थता का प्रयास किया जाए और इसमें दोनो परिवार से एक -एक सदस्य मौजूद हों।  अगर उसके बाद समझौता  विफल रहे तो फिर तलाक़ का फैसला किया जाए। 
इस  फैसले के अंत में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि ट्रिपल तलाक़ इसलिये भी गलत है कि इस तरह के  तलाक़ पति के द्वारा लिया गया वैसा  फैसला है जिसे  अचानक और बिना सोचे- समझे तरीके से अंजाम दिया जाता है  और इसके साथ ही  ऐसी कोई परिस्थिति नही रह जाती जिसमे  उनके बीच आपसी  समझौते की संभावना हो ।
माननीय सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के  फैसले के परिपालन मैं 19 सिंतबर 2018 को अध्यादेश मौजूदा सरकार द्वारा लाया गया।  सवाल उठता है कि क्या यह  कानून मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को तलाक सम्बंधित मामलो मे पूर्ण रूप से सुरक्षा और शक्ति देता है ?

  विडम्बना ये है कि कोर्ट के सामने आने वाले हिन्दू मैरिज एक्ट से संबंधित पारिवारिक मामलों में माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर मामले की  संवेदनशीलता, दोनो पक्षो के बीच आपसी समझौते की संभावना को लेकर सकारात्मक सोच और संबंधित कानूनों के उपयोग-दुरुपयोग, इन सभी चीजों का ध्यान रखा जाता है।  एक प्रकार से इस  विचार को आधार बनाया जाता है कि शादीशुदा लोग कई बार गुस्से/आपसी क्षणिक मन मुटाव में  एक दूसरे के खिलाफ बड़ा कदम उठा  लेते हैं।  इसलिए पारिवारिक मामलों से संबंधित अपराधों के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट के अमेश कुमार बनाम बिहार राज्य में  पारित आदेश(2 जुलाई 2014)  और राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मे दो जजों द्वारा पारित आदेश ( 27 जुलाई 2017)  और हाल ही मे तीन जजों की पूर्ण पीठ के आदेश (14 सितंबर 2018) में यह कहा गया है कि पारिवारिक मामलों मे केवल अपराध दर्ज होने पर तुरंत गिरफ्तारी नही की जाये।

लेकिन सरकार की ओर से लाये गए ट्रिपल तलाक़ के कानून में समझौते से संबंधित किसी प्रणाली का प्रावधान नही रखा गया है और मुस्लिम महिला (विवाह में अधिकारों की सुरक्षा) अध्यादेश, 2018  में संबंधित अपराध दर्ज होने पर पति की तुरंत गिरफ्तारी का प्रावधान दिया गया है ।

ट्रिपल तलाक़ के इस कानून में धारा  7(बी)  समझौते  की बात करती है , पर यह समझौता अपराध दर्ज होने के बाद की स्थिति के बारे में है।  परंतु इसमें पति-पत्नी के बीच अपराध के दर्ज होने के पूर्व किसी भी प्रकार की बात-चीत / मध्यस्थता का कोई प्रावधान नही है । इसलिये ऐसी स्थिति मे अगर अपराध दर्ज हो जाता है और पति को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता है तो  केवल अपराध से संबधित समझौता  हो सकता है।  लेकिन क्या यह समझौता पति-पत्नी को एक बार फिर से साथ रहने को प्रेरित करेगा या कानूनी तलाक की ओर  प्रेरित करेगा ?

माननीय सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के द्वार अपने आदेश में ट्रिपल तलाक़ को असंवैधानिक बताया गया है और मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार कानूनी रूप से सही तलाक़ का उल्लेख किया गया है।  इसके अलावा मुस्लिम समुदाय से  संबंधित पारिवारिक मामलों मैं किसी और तरीके से तलाक लेने का कोई नया तरीका/कानून नही बताया गया है।   सरकार ने भी केवल ट्रिपल तलाक़ को अपराध घोषित कर उससे संबंधित सज़ा की बात की है।  मुस्लिम समुदाय के बीच तलाक़ कैसे हो और किस तरह  हो, ऐसा कोई नया तरीका/कानून यहां भी नही बताया गया है ।

 तीन तलाक़  हानिकारक है, परन्तु  उसे  रोकने के लिए लाया गया कानून भी झट से दिया गया समाधान ही नज़र आता है।  यह एक पल तो भाता है पर  गौर से देखने पर अधूरा नज़र आता है ।

Comments