प्रियंका के पहले भाषण को लेकर सोशल मीडिया और मुख्य धारा के मीडिया में चर्चा गरम है कि उनकी आगे की राजनीति कैसी होगी। इसमें भी कोई बुराई नहीं है कि उनके खानदान की चर्चा की जाए और कहा जाए कि राजनीति में जो भूमिका उन्हें मिली है, वह उनके खानदान की वजह से मिली है। लेकिन उनके पहले भाषण में गांधीवाद की उस राजनीति की चर्चा है जो फिलहाल चलन से बाहर है और इसके लिए वह प्रशंसा की हकदार हैं। उन्हें इससे इस वजह से वंचित नहीं किया जाना चाहिए कि उनके माथे पर किसी खास परिवार का नाम लिखा है।  देश के जहरीले राजनीतिक माहौल में प्रेम और करूणा की बात करना हिम्मत का काम है। गांधीनगर की रैली में इस तरह की बातें उन्होंने की, वह स्वागत योग्य है क्योंकि गाँधी  जी का गुजरात पिछले कई वर्षों से नफरत गढने के उत्पादन-केंद्र में बदल गया है।
कई लोगों ने उनके भाषण में खामियां ढूंढने की कोशिश की है। कुछ लोगों को लगा कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेकर निशाना सांधना चाहिए था। सोशल मीडिया में तो कई निचले स्तर की टिप्पणियां भी की गई हैं।  लेकिन मीडिया में बहुत कम लोगों को यह हिम्मत हुई कि उनके भाषण की तुलना की जाए। इसमें कांग्रेस के समर्थकों को भी शामिल करना चाहिए। शायद उन लोगों ने इसलिए ऐसा नहीं किया कि उन्हें भय है कि इससे राहुल गांधी का कद छोटा हो जाएगा। उन्हें मोदी के खिलाफ हर हाल में राहुल को ही खड़ा करना है। लेकिन यह गलत है। अगर कोई मामूली राजनेता भी राहुल या मोदी से बेहतर बोले तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए।
वैसे, मीडिया या राजनीति में उन्हें खारिज करने की कितनी भी कोशिश हो, प्रियंका के बारे में कांग्रेस के कार्यकर्ता और उस पार्टी को चाहने वाले आम लोग उन्हें कांग्रेस का नेतृत्व करने की क्षमता रखने वाले एक वैकल्पिक नेता के रूप में देखते आए हैं। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भले ही नई परिस्थिति स्वीकार कर ली है कि राहुल गांधी उनके नेता होेंगे और प्रियंका उनका पूरक होगी,  लेकिन उनके मन में प्रियंका को लेकर राहुल से कम उम्मीद नहीं है।  भाजपा समर्थकों को इससे धक्का पहुंचेगा, लेकिन उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि आम लोग प्रियंका की तुलना मोदी से करेंगे। कामकाज और राजनीति के मामले में अभी यह तुलना तो हो नहीं पाएगी, लेकिन भाषण आदि के मामले मेे होगी। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि लोगोें के दिमाग में वह देश के नेता के विकल्प के रूप में मौजूद रही हैं। एक और बात यह है कि भाजपा में मोदी अकेले नेता हैं। वही नेता भी हैं और अनुयायी भी। इसलिए हर किसी की तुलना उन्हीं से होगी।
अभी हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने अहमदाबाद में वह भाषण दिया था जिसमें उन्होंने ‘‘चुन-चुन कर मारूंगा’’ और ‘‘घुस कर मारूंगा’’ के फिल्मी डायलाॅग बोले थे। गांधी जी के उस साबरमती आश्रम से कुछ ही दूरी पर उन्होंने यह डायलाॅग दोहराया था जहां बापू ने सत्याग्रह का आश्रम बनाया था और जहाँ  से उन्होंने दांडी मार्च किया था। किसी ने गांधीवाद पर  मोदी के इस सांकेतिक हमले की ओर लोगों का ध्यान नहीं दिलाया क्योेंकि भारतीय मीडिया अपनी रचनात्मकता खो चुका है और इतिहास की उसकी समझ सोशल मीडिया पर आने वाले उस झूठ से संचालित होती है जिसमेें नेहरू कश्मीर को भारत से अलग करते और 1965 का युद्ध पाकिस्तान से हारते दिखाई देते हैं।
 यह वाकई दुर्भाग्य की बात है कि आक्र्रमकता के मामले में राहुल भी कई बार मोदी की बराबरी करते नजर आते हैं। उनकी देह की भाषा में भी मोदी की बराबरी करने की ललक दिखाई देती है। यह देश की राजनीति के घटते स्तर को दिखाता है। प्रियंका ने इस तरीके को पलटने की कोशिश की और यह कह कर कि देशभक्ति का अर्थ लोगों का जागरूक होना, उन्होंने राष्ट्रवाद की आरएएसएस और भाजपा के माडल के मुकाबले एक नया माडल रखा। उन्होंने मुझे चुनो के मोदी के नारे के मुकाबले ‘‘सोच-समझ कर अपना भविष्य चुनो’’ का नारा भी दिया।  यह एक नई चेतना की बात है।
स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊंचाई देने वाले दांडी मार्च के स्थल पर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक सही समय पर हुई है। पुलवामा और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद फैलाए जा रहे उन्माद का इससे  बेहतर राजनीतिक जवाब नहीं हो सकता है। दांडी मार्च से शुरू हुए सिविल नाफरमानी के आंदोलन ने आजादी के आंदोलन की दिशा बदल दी। पहली बार आजादी के आंदेालन मंे महिलाओं ने इतनी बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। उन्मादी राजनीति के जवाब में कांगे्रस ने सही रणनीति अपनाई और  उसने प्रियंका को महात्मा गांधी के प्रेम और करूणा का संदेश रखने का काम सौंपा। प्रियंका ने इस जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक निभाया। वह देश में चल रहे उन्माद और नफरत के माहौल में प्रेम और करूणा की भाषा बोल रही है,  यह देश के बीमार लोकतंत्र के ईलाज के लिए सबसे जरूरी दवा है। पाकिस्तान-विरोध और आतंकवाद भारतीय राष्ट्रवाद के आधार नहीं हो सकते। भाजपा कांग्रेस समेत देश के सभी संगठनों को देशद्रोही बता रही है। इस तरह की बीमार राजनीति से बचने का रास्ता यही है कि प्रेम और करूणा की बात की जाए। प्रियंका ने अपने पहले  भाषण में इसे आधार बना कर चुनाव-अभियान को नई दिशा में ले जाने की कोशिश की है। प्रियंका को गंभीरता से लेना चाहिए।

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