रफाल सौदे की जांच की मांग को खारिज करने के  14 दिसंबर, 2018 के फैसले पर फिर से विचार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ा झटका और राहुल गाँधी के लिए उत्साहवर्धक नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की आजादी के लिए एक मील का पत्थर है। अदालत ने याचिका पर सुनवाई करने का फैसला किया है। उसने सरकार की इस दलील को अस्वीकार कर दिया है कि ‘द हिंदू’ में सौदे से संबंधित दस्तावेजों को सबूत न मानें क्योंकि  ये अवैध ढंग से हासिल किए गए हैं। ये दस्तावेज सबूत के तौर पर जांचे जायेंगे । मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली खंडपीठ  का यह फैसला अभी रफाल मामले में न्याय देने के लिए है, लेकिन इसके दूरगामी प्ररिणाम होंगे और यह आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र के आधार को मजबूत करने में मदद देगा। खंडपीठ के  सदस्य जस्टिस केएम जोसेफ ने अलग से दिए गए फैसले में सूचना के अधिकार और गोपनीय दस्तावेजों  को लोगों के सामने रखने को लेकर अहम बातें कही हैं। उन्होंने कहा है कि सूचना का अधिकार साधारण नागरिक को  यह अधिकार देता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और किसी दूसरे राष्ट्र से संबंधों पर असर डालने वाली सूचनाएं भी ले सकता है बशर्ते ऐसी सूचना से होने वाला जनहित इससे होने वाले नुकसान से ज्यादा हो।
सूचना के अधिकार को आधिकारिक गोपनीयता कानून 1923 से ऊपर मानने और इनके प्रकाशन की आजादी देने के  के इस फैसले से प्रेस की आजादी को जबर्दस्त ताकत मिलेगी। इससे भ्रष्टाचार और मानवाधिकार के मामलों से संबंधित सूचनाएं हासिल करने और इन्हें प्रकाशित करने में कोई बाधा नहीं रह गई है। फैसले में अभिव्यक्ति की आजादी को बहाल करते समय सुरक्षा जैसे सवालों से दुनिया भर में पैदा होने वाली दुविधाओं और न्यायपालिका में उसके निपटारे के लिए अपनाए गए तरीके की विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें अभिव्यक्ति की आजादी को लोकतंत्र के लिए अत्यंत जरूरी बताया गया है। जस्टिस जोसेफ ने कहा है भारतीय संविधान के तहत मंत्रियों की ओर  से राष्ट्रपति को भेजी जाने वाली चिट्ठियों के अलावा कोई भी सूचना के पाने और प्रकाशित करने की मनाही नहीं है बशर्ते कि वह जनहित में हो और उससे होने वाला जनहित होने वाले नुकसान से ज्यादा हो।
रफाल मामले पर इस फैसले असर जाहिर है। इसका अर्थ है कि अदालत में  ‘द हिंदू’ में प्रकाशित उन तीन दस्तावेजों  पर विचार होगा जो रफाल सौदा तय करने में प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के हस्तक्षेप और सौदे को फ्रांस सरकार की गांरटी और बैंक गांरंटी तथा अन्य कई महत्वपूर्ण शर्तों में छूट से संबंधित हैं।
देश का मीडिया रफाल सौदे से संबंधित गोपनीय दस्तावेजों के प्रकाशन के प्रेस के अधिकार को सही ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की चर्चा  सीमित रूप में कर रहा है। जस्टिस जोसेफ ने अपने फैसले में प्रेस की आजादी, सामान्य नागरिकोें की अभिव्यक्ति की आजादी और सूचना पाने के अधिकार को लोकतंत्र में  सबसे ऊपर माना है । उन्होंने  न केवल सरकार की ओर से आने वाली हर बाधा को दूर करने का कानूनी रास्ता निकाला  है बल्कि उन गैर-सरकारी बाधाओं को भी दूर करने की जरुरत बताई है जो मीडिया के व्यापारीकरण और राजनीतिकरण से पैदा हुए हैं। उन्होंने संविधान और लोकतंत्र के विरोध में खडे हो गए मीडिया के इस हिस्से, जो वर्तमान में इसकी मुख्यधारा है, की ओर हमारा ध्यान खींचा है। उन्होंने कहा है, ‘‘ अगर प्रेस  निर्विवाद आजादी का उपभोग जिम्मेदारी के गहरे भाव के बिना करता है तो लोकतंत्र कमजोर होता है। कुछ हिस्सों में पक्षपात की परेशान करने वाली प्रवुत्ति दिखाई देती है।  व्यापारिक हितों के नियंत्रण और राजनीतिक वफादारी बिना किसी पक्षपातक के सूचना जमा करने के कर्तव्य को खत्म करता है।’’
जस्टिस जोसेफ ने प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैय्यर की आत्मकथा ‘बियोंड लाइंस’ को उद्धुत किया है जिसमें उन्होंने पत्रकारिता के घटते स्तर को लकर निराशा जाहिर की है। उन्होंने कहा कि मुझे  सबसे भयभीत यह बात करती है कि संपादकीय प्रमुखता को व्यापारिक फायदे और निहित स्वार्थों  के लिए त्याग दिया गया है। क्या  जस्टिस जोसेफ की इस टिप्पणी पर एक बड़ी बहस की जरूरत नहीं है?

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