कभी धरती की जन्नत कहा जाने वाला कश्मीर फिलहाल धरती पर दोजख बना हुआ है। मौजूदा हालात में किसी आम आदमी का ही नहीं, बल्कि किसी मीडियाकर्मी का भी कश्मीर जाना बेहद जोखिम भरा है। इसकी दो अहम वजह है। एक तो सरकार और मुख्यधार के मीडिया, खासकर सरकार के ढिंढोरची बन चुके टेलीविजन चैनलों के प्रति कश्मीरी नौजवानों का गुस्सा और दूसरी वहां कदम-कदम पर सुरक्षा बलों की तैनाती। इन दोनों वजहों से कश्मीर घाटी के माहौल में गहरा तनाव पसरा हुआ है। ऐसे ही चुनौती और जोखिम भरे माहौल में पिछले सप्ताह हम दो मित्रों ने कश्मीर जाने का फैसला किया था। मेरे साथ थे न्यूज पोर्टल ‘जनचौक डॉटकॉम’ के संपादक महेंद्र मिश्र।

दिल्ली से श्रीनगर तक 85 मिनट के हवाई सफर के दौरान एक ही आशंका दिल-दिमाग पर छाई हुई थी कि हमें श्रीनगर शहर में प्रवेश करने से कहीं रोक तो नहीं दिया जाएगा। इसी आशंका में लिपटा हुआ था एक सवाल कि कैसा होगा कश्मीर! हमारे जहाज में लगभग एक चौथाई सीटें खाली थीं और ज्यादातर यात्री कश्मीरी ही थे जो ईरान से मोहर्रम का त्योहार मनाकर भारत लौटे थे और अब अपने घरों को लौट रहे थे। 22 सितंबर की सुबह 6.45 पर गो एअर का हमारा जहाज श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरा। व्योम बाला यानी एयर होस्टेस ने सूचित किया कि बाहर का तापमान 21 डिग्री सेल्सियस है। जहाज से बाहर आते ही लगा भी कि घाटी बहुत सर्द है लेकिन एयर होस्टेस की दी हुई सूचना न तो मौसम के लिहाज से स्थायी तौर पर सच थी और न ही कश्मीर घाटी के माहौल के संदर्भ में।

हवाई अड्डे की बिल्डिंग में प्रवेश करते ही हमारा सामना उस सूचना पट्ट से हुआ जिस पर लिखा है, ‘श्रीनगर एयरपोर्ट पर आपका स्वागत है। यह एक डिफेंस एयरपोर्ट है। यहॉं की तस्वीरें लेना निषिद्ध है।’ यह सूचना हिंदी के अलावा अंग्रेजी और उर्दू में भी लिखी हुई है। अपना सामान लेकर हम हवाई अड्डे से जैसे ही बाहर आए, हमारा सामना सरकार के इस दावे की असलियत से हुआ कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य है। कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करे को 52 दिन हो चुके थे लेकिन घाटी में पब्लिक ट्रांसपोर्ट शुरू नहीं हुआ था। शहर प्रवेश करने के लिए महंगी प्रीपेड टैक्सी का सहारा लेने के अलावा हमारे सामने कोई चारा नहीं था।

हमारी टैक्सी जैसे-जैसे आगे बढ रही थी, कदम-कदम पर बुलैट प्रूफ जैकेट और मशीनगन धारण किए हुए सुरक्षा बलों के जवानों की मौजूदगी और सडकों पर दौड रही स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बलों की गाडियों को देखकर लग रहा था कि सिर्फ श्रीनगर का हवाईअड्डा ही डिफेंस का नहीं है, बल्कि समूचा कश्मीर ही डिफेंस का है। हवाई अड्डे से लेकर कश्मीर प्रेस क्लब तक साढे नौ किलोमीटर के रास्ते में सुरक्षा बलों की गाडियों के अलावा इक्का-दुक्का निजी वाहन ही सडकों पर दिखाई दिए। टैक्सी ड्राइवर रास्ते भर अपनी और श्रीनगर शहर के पर्यटन उद्योग की दर्दभरी दास्तान सुनाता रहा।

तमाम बातों के अलावा मोदी सरकार को इस बात का श्रेय भी दिया जाना चाहिए कि उसने कश्मीर में समय को पीछे धकेल दिया है। इंटरनेट, मोबाइल फोन और अन्य संचार सेवाओं को ठप कर समूची घाटी को उस दौर में पहुंचा दिया गया है जब लोगों के पास संचार या संवाद प्रेषण के लिए सिर्फ डाक का ही सहारा हुआ करता था। संचार क्रांति के मौजूदा दौर में जब कुछ क्षणों के लिए भी इंटरनेट और मोबाइल की सुविधा से वंचित हो जाने पर व्यक्ति बेचैन हो उठता है तो कल्पना की जा सकती है कि कश्मीर घाटी के बाशिंदे करीब दो महीने से मोबाइल और इंटरनेट के अभाव में किस तरह की दुश्वारियों का सामना कर रहे होंगे। वैसे उन दुश्वारियों और तकलीफों को वास्तविक अहसास कश्मीर के बाहर रहकर नहीं बल्कि वहां जाकर किया जा सकता है।

हालांकि सरकार ने कुछ दिनों लैंडलाइन फोन भी कुछ दिनों तक बंद रखने के बाद चालू कर दिए थे, लेकिन इससे जनजीवन पर कोई खास असर नहीं पडा था, क्योंकि मोबाइल फोन आने के बाद ज्यादातर लोगों ने अपने घरों और दुकानों से यह सुविधा हटा दी है। इसी वजह से हमारा श्रीनगर के उन पत्रकार मित्रों से भी संपर्क नहीं हो पा रहा था जिनसे हमने दिल्ली से रवाना होने के पहले किसी तरह संपर्क कर मिलने का समय तय किया था। हमें किस होटल में रूकना है यह भी उन्हीं मित्रों से मिलने के बाद ही मालूम होना था। चूंकि हम तय समय से पहले ही पहुंच गए थे लिहाजा हमारे सामने इधर-उधर टहलने और लोगों से बतियाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

लाल चौक के करीब पोलोव्यू इलाके में स्थित प्रेस क्लब वाली सडक पर दुकानें खुलना शुरू हो गई थी। इतनी सुबह-सुबह दुकानें खुलती देख हमें हैरानी भी हुई, लेकिन पूछने पर दुकानदारों ने बताया कि वे रोज सुबह सात से नौ बजे तक अपनी दुकानें खोलते हैं ताकि साफ-सफाई हो जाए और जरुरतमंद लोग आवश्यक सामान खरीद सके। दो घंटे के लिए दुकान खोलने के पीछे एक मकसद दुकानदारों ने यह भी बताया कि इससे दुकान में रखे सामान को ताजी हवा भी मिल जाती है जिससे वह खराब नहीं होता है। दो घंटे के लिए दुकान खोलने और उसके बाद पूरे दिन बंद रखने का यह सिलसिला 5 अगस्त से जारी है जिस दिन केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के तहत कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा तथा अनुच्छेद 35ए को खत्म करने का फैसला किया था।

दिलचस्प बात यह भी है कि इस तरह की बिल्कुल शांतिपूर्ण आम हडताल का आह्वान किसी भी राजनीतिक, सामाजिक या व्यापारिक संगठन ने नहीं किया है। यह लोगों का स्वस्फूर्त फैसला है जिसका सब लोग पूरी शिद्दत से पालन कर रहे हैं। यह सिलसिल कब तक जारी रहेगा, इस बारे में कोई भी अभी कुछ बताने की स्थिति में नहीं है। कहने को तो यह पूरी तरह शांतिपूर्ण विरोध है, लेकिन सही मायने में इसे शांतिपूर्ण नहीं, बल्कि खामोशी भरा विरोध कहना ज्यादा उचित होगा। लेकिन यह खामोशी साधारण नहीं है, इसमें बहुत कुछ छिपा है, जो आने वाले दिनों में उजागर होगा।

(कश्मीर घाटी के ताजा हालचाल का बाकी ब्योरा कल)

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