कांग्रेस कार्यसमिति में राहुल कैसे?

कांग्रेस में सोनिया गांधी के कमान संभाल लेने के बाद भी नित नए अजूबे हो रहे हैं। चुनाव में हार की नैतिक जिम्मेदारी कुबूल करते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके राहुल गांधी उनका नाम अचानक कार्य समिति में जोड दिया गया है। पार्टी की अधिकृत वेबसाइट पर अन्तरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के बाद जिन 24 कार्यसमिति सदस्यों के नाम हैं, उनमें पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नाम के बाद राहुल का नाम है। यह कैसे हो गया? पार्टी संविधान के मुताबिक इस सर्वोच्च नीति निर्धारक निकाय के आधे सदस्यों का चुनाव होता है और आधे सदस्यों का मनोनयन। पूर्व अध्यक्ष के नाते अपने आप इसका सदस्य बन जाने का कोई प्रावधान पार्टी संविधान में नहीं है। अध्यक्ष ही उसको मनोनीत कर सकता है। 2017 में जब राहुल गांधी अध्यक्ष बने तो सोनिया गांधी इसलिए कार्यसमिति की सदस्य रहीं, क्योंकि वे संसदीय दल की नेता थीं और नियमानुसार संसदीय दल का नेता कार्यसमिति का सदस्य होता है। राहुल तो संसदीय दल के नेता भी नहीं हैं और न ही अभी सोनिया ने उन्हें मनोनीत किया है। फिर भी कमाल की बात है कि राहुल कार्यसमिति के सदस्य हो गए हैं।

तीन पार्टियों का राष्ट्रीय दर्जा खत्म होगा

लोकसभा चुनाव 2019 के बाद चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) को नोटिस जारी कर पूछा था कि क्यों न उनका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म कर दिया जाए। दरअसल इस चुनाव में ये तीनों पार्टियां राष्ट्रीय पार्टी होने की अर्हता पूरी नहीं कर सकी है। हैरानी की बात है कि कई राज्यों में अपनी मौजूदगी के बावजूद ये पार्टियां राष्ट्रीय पार्टी नहीं रहेंगी लेकिन पूर्वोत्तर के छोटे-छोटे तीन-चार राज्यों में असर रखने वाली कोनरेड संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल जाएगा। यह स्थिति राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा देने के लिए तय नियमों पर बडा सवाल है। बहरहाल, जब आयोग ने तृणमूल, एनसीपी और सीपीआई को नोटिस जारी किया तो इन पार्टियों ने आयोग से सहानुभूतिपूर्वक विचार करने को कहा और थोडा समय मांगा। उनको लग रहा है कि अगले कुछ दिनों में होने वाले विधानसभा चुनावों में वे प्रदर्शन सुधार कर अपनी कसर पूरी कर लेंगी। मगर आयोग सहानुभूति के साथ विचार करने को बिल्कुल तैयार नहीं है। यानी तीनों का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म होकर रहेगा।

मनमोहन के मुकाबले संबित पात्रा

पूर्व प्रधानमंत्री और जाने माने अर्थशास्त्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने पिछले दिनों एक वीडियो संदेश के जरिए देश की अर्थव्यवस्था पर चिता जताई और बताया कि देश गंभीर से गंभीरतम आर्थिक संकट की ओर बढ रहा है। सरकार ने मनमोहन सिंह के बयान का अपने स्तर पर कोई जवाब न देते हुए मसखरे समझे जाने वाले भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा को आगे किया। पात्रा ने अपेक्षा और अपने स्वभाव के मुताबिक मनमोहन सिंह के लिए निहायत अपमानजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि कांग्रेस तो उनका इस्तेमाल कठपुतली की तरह करती ही रहती है। संबित पात्रा की इस टिप्पणी का सीधा आशय यह है कि जो भी मंदी की बात करेगा, सरकार उसको खारिज करेगी। हालांकि पात्रा की इस तरह की छिछोरी टिप्पणी से अर्थव्यवस्था की जो हकीकत है वह बदलने वाली नहीं है। मगर जानकार मानते हैं कि मनमोहन सिंह की टिप्पणी का संबित पात्रा से दिलवाना दो बातों की ओर इशारा करता है। एक तो यह कि सरकार अर्थव्यवस्था के संकट को गंभीरता से नहीं ले रही या फिर यह कि अरुण जेटली के जाने के बाद सरकार या भाजपा के पास मनमोहन सिंह या अर्थव्यवस्था के अन्य किसी जानकार की बात का तर्कसंगत जवाब देने के लिए अब कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं है। जो भी हो, दोनों ही स्थिति न तो सरकार और भाजपा के लिए और न ही फिलहाल देश के लिए अच्छी कही जा सकती है।

सिंधिया को कमलनाथ के फंसने की आस

पी. चिदंबरम की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस के संकटमोचक माने जाने वाले कर्नाटक के वरिष्ठ नेता डीके शिवकुमार की गिरफ्तारी हो गई है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी को सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया है। इसी आधार पर मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक सोशल मीडिया पर प्रचार कर रहे है कि अगला नंबर कमलनाथ का हो सकता है। कहा जा रहा है कि उनके सहयोगियों के यहां पडे छापों में कई ऐसी चीजें मिली हैं, जिनसे जांच की आंच मुख्यमंत्री तक पहुंच सकती है। इसीलिए सिंधिया समर्थक उम्मीद लगाए बैठे हैं कि उनके नेता के भाग्य से छींका टूट सकता है। लेकिन फिलहाल तो ऐसी स्थिति आती नहीं दिख रही है कि कमलनाथ किसी जांच में फंसे। जांच में फंसे चिदंबरम और शिवकुमार से कमलनाथ का मामला अलग है। उनके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी बहुत अच्छे रिश्ते हैं और कारपोेरेट जगत में भी खासकर अडानी और अंबानी उनके प्रति सद्भाव रखते हैं। इसलिए उन तक अभी तुंरत आंच पहुंचने के आसार कम ही हैं। अगर किसी वजह से वे मुश्किल में फंसते भी हैं तब भी सिंधिया के भाग्य से छींका टूटने के आसार बहुत कम हैं। अनुच्छेद 370 को लेकर उन्होंने जिस तरह पार्टी लाइन से हटकर सरकार के फैसले का समर्थन किया और प्रदेश कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति को लेकर उनके समर्थकों ने जिस तरह की बेलगाम बयानबाजी की, उससे पार्टी में और गांधी परिवार में भी उनकी स्थिति कमजोर ही हुई है।

कश्मीर के बाद हैदराबाद पर निशाना

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने के बाद अब भाजपा हैदराबाद को निशाना बनाकर राष्ट्रवादी कार्ड खेलने जा रही है। इस महीने की 17 तारीख को पूर्व हैदराबाद रियासत के भारतीय संघ में शामिल होने की सालगिरह है। केंद्र सरकार इस मौके पर हैदराबाद में एक गृह मंत्री अमित शाह की सदारत में एक भव्य आयोजन करने जा रही है। आयोजन की खास बात यह है कि अमित शाह वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद कार्यक्रम की शुरुआत करेंगे। इस ‘ध्वजारोहण’ के ही कुछ राजनीतिक निहितार्थ है। राज्य सरकार अभी तक यह तय नही कर पा रही है कि वह केंद्र सरकार के इस कार्यक्रम पर ‘रिएक्ट’ कैसे करे। भाजपा के दोनों हाथों में लड्डू है। अगर राज्य सरकार विरोध में जाती है तो भी उसे राजनीतिक लाभ होगा और साथ आती है तो भी। भाजपा को लगता है कि दोनों ही स्थिति में राज्य के सियासी समीकरण उसके पक्ष में काफी हद बदल जाएंगे। भाजपा का इरादा आगे-पीछे हैदराबाद को भी केंद्र शासित क्षेत्र बनाने का है।

सरकार की गाज गिरना तय है!

भारत सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय के अधीन काम करने वाले नेशनल नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के निदेशक विजय कुमार पर सरकार की गाज गिरना तय है। वजह यह है कि विजय कुमार ने पिछले दिनों मध्य प्रदेश के इंदौर में एक कार्यक्रम में साफ तौर पर कह दिया है कि सरकार को अब स्वीकार कर लेना चाहिए कि नोटबंदी और जीएसटी की वजह से भारी नुकसान हुआ है। आमतौर पर सरकारी विभागों से जुडे लोग इस किस्म की टिप्पणी से परहेज करते हैं मगर विजय कुमार ने बहुत तफसील से नोटबंदी और जीएसटी के नुकसान पर चर्चा की। कुमार के मुताबिक एनएसएसओ ने इस साल जून तक का रोजगार का डाटा जुटा लिया है पर कहीं भी उसे सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है। यही बात रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट में भी अलग तरह से कही गई है। रिजर्व बैंक ने माना है कि भारत में 2016 में हुई नोटबंदी के मुकाबले अभी ज्यादा नकदी आ गई है। बैंक ने यह भी माना है कि जाली नोटों के चलन में भी बढ़ोतरी हुई है। मगर इस सबके बावजूद सरकार अभी भी नोटबंदी की विफलता को या जीएसटी से पैदा हुई समस्याओं को स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

चलते-चलते

नया मोटर व्हीकल एक्ट लागू होने के बाद चालान की रकम रोज नए रिकार्ड बना रही है। गुडगांव में एक ट्रैक्टर-ट्रॉली चालक 59,000 रुपए का और भुवनेश्वर मे एक ऑटो ड्राइवर का 47,500 हजार रुपए का चालान कट गया। यही स्थिति जारी रही तो जल्द ही बैंक और फायनेंस कंपनियां चालान भरने के लिए भी लोन ऑफर करने लगेंगी।

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