सिंधिया भाजपा में जाएंगे?

कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया क्या भाजपा में जा सकते हैं? राजनीतिक हलकों में यह सवाल खासा चर्चा में है। सिंधिया मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना चाहते थे लेकिन नहीं बन पाए। फिर लोकसभा चुनाव भी हार गए। अब वे मध्य प्रदेश में कांग्रेस का अध्यक्ष बनना चाहते हैं लेकिन फिलहाल पार्टी आलाकमान ने उन्हें महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए बनी छानबीन समिति का अध्यक्ष बना दिया है। सिंधिया इस जिम्मेदारी से खुश नहीं हैं और उनकी नाखुशी उनके समर्थक विधायकों के मुंह से व्यक्त हो रही है। मध्य प्रदेश में उनके समर्थक मंत्री और विधायक खुलेआम सिंधिया को बडी जिम्मेदारी देने की मांग करते हुए उन्हें छानबीन समिति का अध्यक्ष बनाए जाने पर सवाल उठा रहे हैं। सिंधिया की दूसरी चिता राज्यसभा में जाने को लेकर भी है। अगले साल मार्च में राज्यसभा के और दोवार्षिक चुनाव होंगे। मध्य प्रदेश में कांग्रेस अपने और समर्थक विधायकों की संख्या के बूते तीन सदस्यों को राज्यसभा में भेज सकती है। सिंधिया चाहते हैं कि पार्टी उन्हें राज्यसभा में भेजने के लिए आश्वस्त करे, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। पिछले दिनों अनुच्छेद 370 खत्म करने को लेकर उन्होंने जिस तरह सरकार का समर्थन किया, उसे भी उनके विद्रोही तेवर के रूप में ही देखा गया। हाल ही में भाजपा के एक बडे नेता से उनकी मुलाकात भी हुई है। गौरतलब है कि ज्योतिरादित्य के अलावा उनका पूरा परिवार भाजपा के साथ है। उनकी दोनों बुआ- वसुंधरा और यशोधरा तथा उनके पिता की मामी माया सिंह भी भाजपा में हैं। दादी विजयराजे तो भाजपा की संस्थापकों में एक रही ही हैं और पिता माधवराव भी ने भी अपनी राजनीति की शुरुआत जनसंघ से ही की थी।

वन नेशन वन इलेक्शन के ढोल की पोल

कुछ दिनों पहले तक प्रधानमंत्री से लेकर उनकी और सहयोगी दल तक ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ का झुनझुना बजा रहे थे। विपक्ष में भी कई दलों के नेता, चुनाव आयोग और कुछ राजनीतिक समीक्षक भी इस झुनझुने की आवाज के समर्थन में ढोल पीटते नजर आ रहे थे। अब स्थिति यह है कि चुनाव आयोग देश के अलग अलग राज्यों में होने वाले विधानसभा के उपचुनाव भी एक साथ नहीं करा पा रहा है। लोकसभा चुनाव में विभिन्न राज्यों में कई पार्टियों के विधायक अब सांसद बन चुके हैं और उनकी खाली हुई विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है। लेकिन तीन महीने बाद भी चुनाव आयोग उन सीटों पर चुनाव की घोषणा नहीं कर सका है। चुनाव आयोग ने चार अलग अलग राज्यों में चार विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की घोषणा की है। उत्तर प्रदेश की हमीरपुर सीट, छत्तीसगढ की दंतेवाड़ा सीट, त्रिपुरा की भद्रघाट और केरल की पाला सीट पर 23 सितंबर को मतदान होगा। हैरानी की बात यह है कि चुनाव आयोग चार महीने से खाली उत्तर प्रदेश की हमीरपुर सीट पर उपचुनाव करा रहा है पर उसने तीन महीने पहले राज्य में खाली हुई 11 अन्य सीटों के लिए चुनाव की घोषणा नहीं की है। इसी तरह बिहार में विधानसभा के पांच और विधान परिषद के दो सदस्य तथा पश्चिम बंगाल में तीन विधायक लोकसभा का चुनाव जीते है। सो, वहां भी उपचुनाव होना है। माना जा रहा है कि सभी राज्यों की खाली सीटों पर एक साथ उपचुनाव हुए तो देश में मिनी चुनाव का माहौल बनेगा और उसका असर अक्टूबर-नवंबर में होने वाले राज्यों के विधानसभा चुनाव पर भी पडेगा। ऐसा आकलन तो राजनीतिक पार्टियां करती हैं लेकिन लगता है कि अब चुनाव आयोग भी ऐसा आकलन करने लगा है।

कांग्रेस में पुराने नेताओं के दिन नहीं लौटेंगे

सोनिया गांधी के फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद, उन नेताओं को फिर से सोचना होगा जो नेता इस बात से खुश हो रहे थे कि पुराने नेताओं के दिन लौट आएंगे और राहुल की टीम आउट हो जाएगी। सोनिया गांधी ने साफ संकेत दे दिया है कि वे पुराने नेताओं को ज्यादा भाव नहीं देने जा रही हैं। पिछले दिनों राजीव गांधी की 75वीं जयंती के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में सोनिया ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोडने के राहुल गांधी के फैसले को सराहा और इस तरह से पार्टी के बाकी नेताओ को भी संदेश दे दिया कि उनको भी आगे बढ कर जिम्मेदारी लेनी चाहिए। अपनी तरफ से उन्होंने झारखंड से इसकी शुरुआत कर दी है। वहां हार के जिम्मेदार रहे सभी नेताओं को प्रदेश कांग्रेस कमेटी से बाहर रखा गया है। अध्यक्ष जरुर पुराने नेता रामेश्वर उरांव को बनाया गया है पर उनके साथ पांच बिल्कुल नए और युवा नेताओं को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद कई प्रदेश अध्यक्षों और राष्ट्रीय प्रभारियों ने इस्तीफा दिया था। माना जा रहा है कि सारे इस्तीफे स्वीकार होंगे और नए लोगों को जिम्मेदारी दी जाएगी। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश में जल्दी से जल्दी नया अध्यक्ष नियुक्त किया जाना है। इन राज्यों में भी एक अध्यक्ष के साथ नए चेहरों के रूप में तीन या चार कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाएंगे। यह भी कहा जा रहा है कि सोनिया नए और भरोसेमंद लोगों की एक टीम बना कर उसे राहुल को सौंपेंगी। अंतत: पार्टी राहुल गांधी को ही संभालनी है।

दिल्ली भाजपा में जुलाहों की लट्ठलट्ठा

दिल्ली में पांच महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। लोकसभा की सातों सीटों पर भारी अंतर से मिली जीत के चलते भाजपा आश्वस्त है कि विधानसभा में भी इस बार जीत उसी की होगी। इसी भरोसे या मुगालते के चलते दिल्ली के करीब आधा दर्जन भाजपा नेता मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर अपनी-अपनी पोजिशनिंग करने में जुटे हैं। दिल्ली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी तो इतने आश्वस्त हैं कि वे अभी से अपने को मुख्यमंत्री ही मानकर चल रहे हैं। उनका दावा है कि उनकी वजह से दिल्ली में बसे 40 लाख पूर्वांचली मतदाता भाजपा से जुडे हैं। केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन भी अपने को स्वाभाविक दावेदार मानते हैं। 2013 का चुनाव भाजपा ने उनके नेतृत्व में ही लडा था और उसे 20 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद विजय गोयल भी लंबे अरसे से दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने की हसरत पाले हुए हैं। हालांकि अरुण जेटली के नहीं रहने से उनकी संभावना पर असर पडना तय है। चौथे दावेदार हैं दिल्ली विधानसभा में भाजपा के चार सदस्यीय विधायक दल के नेता विजेंद्र गुप्ता और पांचवें दावेदार हैं प्रवेश साहिब सिंह वर्मा, जो कि पश्चिमी दिल्ली से सांसद हैं। पिछले चुनाव में भाजपा ने अचानक किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतारा था, सो कई नेता ऐसे भी हैं जो यह मानकर चल रहे हैं कि किरण बेदी की तरह उनकी भी लाटरी लग सकती है।

सेंगर-चिन्मयानंद एक समान

उत्तर प्रदेश में भाजपा का एक विधायक कुलदीप सेंगर एक नाबालिग लडकी से बलात्कार के मामले में फंसा हुआ है। वह बलात्कार, हत्या और हत्या के प्रयास के आरोप में जेल में बंद है। अब भाजपा के एक दूसरे नेता और पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद पर भी एक बार फिर एक लडकी का यौन शोषण करने का आरोप लगा है। सेंगर और चिन्मयानंद पर सिर्फ आरोप ही एक जैसे नहीं हैं, बल्कि दोनों के मामले में और भी कई समानताएं हैं। खुद चिन्मयानंद ने अपने मामले की तुलना सेंगर के मामले से करके समानता बढा दी है। चिन्मयानंद ने सेंगर को बेकसूर और साजिश का शिकार बताते हुए कहा कि उनको भी सेंगर की तरह बलात्कार के झूठे मामले में फंसाया जा रहा है। दोनों के मामले में दूसरी समानता यह है कि चिन्मयानंद के मामले में पीडित लडकी के परिवार वालों ने कहा है कि उनका भी अंजाम उन्नाव की पीडित लडकी के परिवार की तरह हो सकता है। गौरतलब है कि उन्नाव के पीडित परिवार के कई सदस्यों की संदिग्ध तरीके से हत्या हो चुकी है। चिन्मयानंद मामले में भाजपा नेताओं की प्रतिक्रिया भी सेंगर मामले जैसी ही है।

‘आप’ कर रही है भाजपा के ‘हथियारों’ का इस्तेमाल

दिल्ली में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, आम आदमी पार्टी की सरकार न सिर्फ नित नई लोकलुभावन योजनाओं का ऐलान कर रही है बल्कि भाजपा के कार्यक्रमों को अपनाने से भी परहेज नहीं कर रही है। गौरतलब है कि दिल्ली सरकार ने कुछ समय पहले तीर्थाटन की योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत दिल्ली के बुजुर्गों को तीर्थ यात्रा कराई जा रही है। खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इन यात्राओं में शामिल हो रहे हैं। तीर्थाटन योजना मूल रूप से भाजपा की है, जो सबसे पहले मध्य प्रदेश में शुरू की गई थी। तीर्थाटन योजना के बाद दिल्ली सरकार ने स्कूलों में देशभक्ति और संविधान की पढ़ाई शुरू कराने का फैसला किया है, जिसके तहत अगले साल से दिल्ली के स्कूलों में बच्चों को देशभक्ति और संविधान का पाठ पढ़ाया जाएगा। इन योजनाओं को शुरू करने का मकसद भाजपा नेताओं के उस प्रचार को बेअसर करना है जिसके तहत आम आदमी पार्टी के नेताओं को कभी नक्सलियों का हमदर्द बताया जाता है तो कभी उन्हें हिंदू विरोधी और कभी देशद्रोही तक करार दे दिया जाता है।

चलते-चलते

चूंकि जम्मू-कश्मीर अब केंद्र शासित राज्य हो चुका है, लिहाजा वहां के मौजूदा राज्यपाल सत्यपाल मलिक भी अब तकनीकी तौर पर उप राज्यपाल हो गए हैं। अपने ओहदे के दर्जे में आई यह गिरावट उनके बयानों में भी साफ झलक रही है। वे कह रहे हैं कि विपक्षी नेताओं को जनता जूते मारेगी।

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