लोकसभा चुनाव के लिए पहले चरण का मतदान 11 अप्रैल को हुआ था और 12 मई को मतदान का छठा चरण समाप्त हो गया। इन छह चरणों के बीच शेयर मार्केट के निवेशकों को करीब 10 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है….एक महीने में 2273 अंक नीचे आ गया है सेंसेक्स।

इसके लिए ऊपरी तौर पर अमेरिका और चीन के ट्रेड वॉर को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। समीक्षक इसे मौजूदा सरकार के प्रति विश्वास के खत्म होने से जोड़ रहे हैं। यह संकेत मोदी सरकार की विदाई के हैं, लेकिन हमे थोड़े और अलग नजरिए से सोचना होगा।

सच यह है कि देश के आर्थिक हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं। देश मंदी के भंवर में फंस गया है, क्योंकि कई प्रमुख आर्थिक संकेतकों में गिरावट देखी गई है। आज तक न्यूज़ वेबसाइट में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि…

-साल 2018-19 में GDP में बढ़त सिर्फ 6.98 फीसदी रहने का अनुमान है।

-फरवरी में आईआईपी में सिर्फ 0.1 फीसदी की बढ़त हुई, जो पिछले 20 महीने में सबसे कम है।

-साल 2018-19 में बिजली उत्पादन में सिर्फ 3.56 फीसदी की बढ़त हुई, जो पांच साल में सबसे कम है।

-साल 2018-19 में यात्री कारों की बिक्री में सिर्फ 3 फीसदी की बढ़त हुई है, जो पिछले पांच साल का सबसे कम स्तर है।

-2018 की सितंबर और दिसंबर की तिमाही में पेट्रोलियम खपत में पिछले सात तिमाहियों के मुकाबले सबसे कम बढ़त हुई।

-साल 2018-19 में कॉरपोरेट जगत की बिक्री और ग्रॉस फिक्स्ड एसेट भी पांच साल में दूसरी सबसे धीमी गति से बढ़ी है।

-अप्रैल के पहले पखवाड़े में बैंक कर्ज में 1 लाख करोड़ रुपये की गिरावट आई है।

-तैयार स्टील का उत्पादन पिछले पांच साल में दूसरा सबसे कम रहा।

-ईपीएफओ के मुताबिक, अक्टूबर 2018 से अब तक औसत मासिक नौकरी सृजन में 26 फीसदी की गिरावट आई है।

23 मई के बाद ही इन सारे फैक्टर्स का अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला हाहाकारी असर देखने को मिलेगा।

 

 

 

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