शापित है सिंधिया परिवार

सिंधिया परिवार के लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी सपने जैसी है! लगता है परिवार को किसी तरह का श्राप है, जिसके चलते उसका कोई सदस्य आज तक इस सूबे का मुख्यमंत्री नहीं बन सका। सिंधिया परिवार सात दशक से मध्य प्रदेश की राजनीति में सक्रिय है। पहली बार विजयराजे सिंधिया 1957 में कांग्रेस के टिकट पर सांसद बनी थीं। वे एक दशक तक कांग्रेस में रहीं। खुद मुख्यमंत्री नहीं बन सकीं मगर कांग्रेस से बगावत कर एक अन्य बागी कांग्रेसी गोविंदनारायण सिंह को मुख्यमंत्री बनवा दिया और जनसंघ में शामिल हो गईं। वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापकों में से एक थीं और पार्टी में उनकी हैसियत अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के बराबर थी। शुरुआती दिनों भाजपा लगभग उनके ही साधनों-संसाधनों से चली। मगर वे मुख्यमंत्री नहीं बन सकीं। उनके सक्रिय राजनीतिक जीवनकाल में उनकी पार्टी के वीरेंद्र कुमार सखलेचा, कैलास जोशी और सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री बन गए मगर वे नहीं बन सकीं। ऐसा ही उनके बेटे माधवराव सिंधिया के साथ भी कांग्रेस हुआ। वे राजीव गांधी के पारिवारिक मित्र थे। इसके बावजूद राजीव गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष रहते भी और सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते भी जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी तो माधवराव मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, श्यामाचरण शुक्ल और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने। माधवराव की एक बहन यशोधरा राजे भी मध्य प्रदेश भाजपा से भाजपा की सांसद और राज्य सरकार में मंत्री रहीं लेकिन मुख्यमंत्री पद से दूर रहीं। लगता है यही कहानी ज्योतिरादित्य के साथ भी दोहराई जाएगी। वे कांग्रेस में रहकर मुख्यमंत्री नहीं बन सके तो भाजपा में चले गए हैं। लेकिन वहां भी संभावना कम ही है, क्योंकि भाजपा में बाहर से आए किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाने का रिवाज नहीं है।

नाथवानी अब आंध्र से राज्यसभा में जाएंगे!

मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह के प्रेसीडेंट परिमल नाथवानी इस बार आंध्र प्रदेश से राज्यसभा में जाएंगे। वे पिछली दो बार से झारखंड में भाजपा और आजसू के समर्थन से निर्दलीय के रूप में राज्यसभा पहुंचते रहे हैं। इस बार झारखंड से उनके सांसद बनने की गुंजाइश नहीं है, इसलिए चर्चा है कि वे आंध्र प्रदेश से राज्यसभा में जाएंगे। वे पिछले दिनों आंध्र प्रदेश गए थे और मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी से मिले थे। बाद में उन्होंने मीडिया को बताया भी कि वे वाईएसआर कांग्रेस के समर्थन से राज्यसभा में जाना चाहते है। गौरतलब है कि आंध्र प्रदेश की 175 सदस्यों की विधानसभा में वाईएसआर कांग्रेस के 157 विधायक हैं। इसलिए वहां से खाली हो रही सभी चारों सीटें वाईएसआर कांग्रेस को ही मिलेगी। यह भी कहा जा रहा है कि रिलांयस समूह के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने खुद इस नाथवानी के बारे में जगन मोहन रेड्डी से बात की है। जगन किस शर्त पर नाथवानी को राज्यसभा में भेजने को तैयार हुए, यह नहीं कहा जा सकता है। पर यह सब जानते हैं कि 2009 के विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद जगन के पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी के हेलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन के बाद उनके समर्थकों ने रिलायंस समूह पर साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया था। हालांकि बाद में सब कुछ ठीक हो गया था।

चंद्रशेखर की चुनौती से बेचैन हैं मायावती

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा सुप्रीमो मायावती इन दिनों की भाजपा या सपा को लेकर उतनी बेचैन नहीं हैं, जितनी दलित नेता चंद्रशेखर के पार्टी बनाने के फैसले से। इस बेचैनी की वजह यह है कि बसपा का मुख्य जनाधार है दलित वोट, जिसमें चंद्रशेखर बहुत तेजी से लोकप्रिय होकर उभरे हैं। चंद्रशेखर पहले बसपा की छतरी के नीचे आकर ही राजनीति करना चाहते थे, लेकिन भविष्य में नेतृत्व को मिल सकने वाली चुनौती से आशंकित होकर मायावती ने उन्हें अपने आस-पास भी फटकने नहीं दिया। दलित युवाओं के बीच चंद्रशेखर के प्रभाव को खत्म करने के लिए ही मायावती ने अपने भतीजे को आगे किया, लेकिन इससे भी बात कुछ बनी नहीं, क्योंकि भतीजा भी अपनी बुआ की तरह विशाल कोठी की ऊंची चाहरदीवारी के पीछे रहकर ही राजनीति कर रहा है। उधर चंद्रशेखर ने मुस्लिम नौजवानों के साथ भी बेहतर संवाद स्थापित किया है और अब 15 मार्च को अपनी पार्टी का ऐलान करने जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि बसपा वे लोग, जो पार्टी से बाहर हो चुके हैं और जिन्हें अभी बेहतर ठिकाना नहीं मिला है, वे अब चंद्रशेखर के संपर्क में हैं। यही नहीं, जो लोग मजबूरी में बसपा में बने हुए हैं, वे भी चंद्रशेखर से अपने तार जोडे हुए हैं। छोटे-छोटे जाति समूह वाले कुछ अन्य दल भी दल भी चंद्रशेखर के साथ मिलकर काम करने के इच्छुक हैं। कांग्रेस को लेकर भी कहा जा रहा है कि वह उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर से हाथ मिला सकती है। ऐसे में मायावती का बेचैन होना लाजिमी है।

सोशल मीडिया में सिंधिया घराने का पोस्टमार्टम

सोशल मीडिया के कई फायदे और कई नुकसान भी। एक फायदा यह है कि लोग बहुत सारी नई बातें जान जाते हैं। हालांकि नई बातों में कई निराधार होती हैं, मगर सूचनाओं को फिल्टर करने की समझ हो तो सही-गलत का अंदाजा लग सकता है। जैसे देश भर के लोग इन दिनों वाट्सएप यूनिवर्सिटी से कोरोना वायरस के बारे में डॉक्टरेट की डिग्री ले रहे हैं, वैसे ही सिंधिया घराने के इतिहास के बारे में पीएचडी की डिग्री बंट रही है। कांग्रेस छोडकर भाजपा में गए ज्योतिरादित्य सिंधिया पर कुपित होकर कांग्रेस के नेता और कांग्रेस समर्थक बुद्धिजीवी उनके खानदान का इतिहास खंगाल रहे हैं। उनके बारे में तरह-तरह की भविष्यवाणियां की जा रही हैं। सिंधिया परिवार के पूर्वजों को लेकर सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता खूब शेयर हो रही है। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई पर अपनी कविता में लिखा है- अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोडी राजधानी थी, खूब लडी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। एक महिला पत्रकार ने बताया- सिंधिया राजपूत नहीं हैं बल्कि मराठा कुनबी यानी कुर्मी है। ये पेशवा की सेना में सैनिक होते थे। पेशवा अंग्रेजों से लडते रहे तो उनका राज खत्म हो गया और सिंधिया घराना अंग्रेजों से मिल गया तो ये नए राजा हो गए। सिंधिया के पिता और उनकी दादी के दलबदल करने की कहानी भी खूब शेयर की जा रही है। कुल मिलाकर देश इस समय सोशल मीडिया के जरिए सिंधिया परिवार के इतिहास और राजनीतिक विरासत से परिचित हो रहा है।

सभी सहयोगियों ने कांग्रेस को निराश किया

किसी ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि कांग्रेस को ऐसे दुर्दिन देखना पडेंगे। एक तरफ भाजपा ने अपनी सहयोगी पार्टियों के नेताओं को राज्यसभा में भेजने का बंदोबस्त किया तो दूसरी ओर कांग्रेस अपनी सहयोगी पार्टियों के सामने झोली फैला कर खडी दिखाई दी कि उसके नेताओं को राज्यसभा मिल जाए पर किसी सहयोगी पार्टी ने उसे भाव नहीं दिया। कांग्रेस की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टियों में से एक राष्ट्रीय जनता दल ने कांग्रेस के प्रस्ताव को सिरे से ठुकरा दिया। गौरतलब है कि बिहार की खाली हो रही पांच राज्यसभा सीटों में से दो सीटें राजद-कांग्रेस गठबंधन के खाते में हैं, पर राजद ने दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार देने का फैसला किया। उसने कांग्रेस के प्रभारी शक्ति सिह गोहिल को टिकट देने की कांग्रेस की मांग ठुकरा दी। ऐसा ही झारखंड में हुआ, जहां कांग्रेस चाहती थी कि मुख्यमंत्री की कुर्सी के बदले हेमंत सोरेन राज्यसभा की सीट कांग्रेस के प्रभारी आरपीएन सिंह को दे दें। मगर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपना पहला उम्मीदवार शिबू सोरेन को बना दिया। तमिलनाडु में भी कांग्रेस के साथ उसकी सहयोगी डीएमके ऐसा ही सुलूक किया। वहां कांग्रेस अपने महज आठ विधायकों के दम पर एक सीट मांग रही थी। असम में कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी आएआईयूडीएफ के साथ मिल कर उम्मीदवार उतारने का फैसला किया तो उसने भी साफ कर दिया कि वह कांग्रेस के किसी नेता को समर्थन नही देगी। आखिरकार कांग्रेस को अपने नेता की बजाय सामाजिक कार्यकताã और पत्रकार अजय भुइंया के नाम पर सहमत होना पडा।

सिंधिया के असर में कांग्रेस ने दिखाई तेजी

मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोडने के बाद कांग्रेस में तेजी लौटी है। उसने आनन-फानन में दो प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति की। दोनों जगह मठाधीश नेताओं की बजाय लोकप्रिय नेताओं को कमान दी। दिल्ली में अपेक्षाकृत युवा और तेजतर्रार नेता अनिल चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो कर्नाटक मे कांग्रेस के संकटमोचन रहे डीके शिवकुमार को पार्टी की कमान सौंपी गई। ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस ने सिंधिया प्रकरण से कुछ सीख ली है। उसे अभी संगठन से जुडे कई फैसले करने हैं। मध्य प्रदेश में ही, जहां सरकार संकट मे फंसी है वहां नया अध्यक्ष नियुक्त होना है। अभी कमलनाथ ही मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों की जिम्मेदारी 15 महीने से निभा रहे हैं। राजस्थान में भी उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ही अध्यक्ष बने हुए हैं। ऐसे ही झारखंड में प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव को राज्य सरकार में मंत्री बना दिया गया है और वे दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे है। राज्यों के अलावा कांग्रेस को केंद्रीय संगठन के बारे में भी फैसला करना है। सवाल यह भी है कि सोनिया गांधी कब तक अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर कामकाज संभालती रहेगी?

कोलकाता पर ‘दिल्ली इफेक्ट’

दिल्ली के चुनाव में अरविंद केजरीवाल की कामयाबी का सीधा असर कोलकाता में ममता बनर्जी पर हुआ है और वह पीके का कहना पहले से ज्यादा मानने लगी हैं। पीके यानी प्रशांत किशोर तृणमूल कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार है। दिल्ली में वे केजरीवाल के भी रणनीतिकार थे। उन्होंने केजरीवाल को जो पहला पाठ पढाया था, वह यही था कि मोदी और शाह से टकराव का रास्ता छोडना होगा। जनता ने आपको सत्ता सौंपी है तो वह आपको परफॉर्म करते देखना चाहती है। टकराव से कुछ हासिल नहीं होगा, उल्टे अपने ही मतदाता को नाराज कर लेंगे। केजरीवाल ने सलाह मानी और वे चुनाव से पहले तक बदल चुके थे। उन्होंने अपने चुनाव अभियान में मोदी और शाह का रत्ती भर भी जिक्र नहीं किया, सिर्फ अपनी सरकार के कामों का जिक्र करते रहे। अब ममता भी यह फॉर्मूला अपना रही हैं। यही वजह है कि हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह जब पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में हिस्सा लेने भुवनेश्वर पहुंचे तो ममता बनर्जी ने न सिर्फ इस बैठक में हिस्सा लिया बल्कि ओडिशा के मुख्यमंत्री बल्कि नवीन पटनायक के घर पहुंचकर उन्होंने अमित शाह के साथ भोजन भी किया। कोलकाता में नागरिकता कानून के समर्थन में अमित शाह की होने वाली सभा की अनुमति भी दे दी। ममता ने अपनी पार्टी के नेताओं को भी हिदायत दी है कि वे भाजपा पर हमलावर होने के बजाय अपनी सरकार के कामकाज को प्रचारित करने पर ज्यादा ध्यान दें।

चलते-चलते

पंजाब एंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक डूबा था तो खाता धारकों के लिए 10 हजार रुपए से अधिक की निकासी पर रोक लगी थी। अब यस बैंक डूबा है तो नकद निकासी की सीमा 50 हजार रुपए तय की गई है। सरकार चाहे तो कह सकती है कि यह भी तो भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत होने का प्रमाण है!

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