दिल्ली और एनसीआर यानी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सर्दी इस बार हर रिकॉर्ड तोड रही है। गुडगांव में साल के आखिरी दिन न्यूनतम तापमान 0.4 डिग्री रहा तो राजस्थान के भीलवाडा में 0.6 डिग्री। मध्य प्रदेश के महाकौशल और बुंदेलखंड अंचल के जंगलों में कई जगहों पर बर्फ की महीन परत जम गई है। प्रदेश के एकमात्र हिल स्टेशन पचमढी में पारा लुढक कर -2.0 डिग्री तक पहुंच गया है। मैदानी इलाकों में खजुराहो और उमरिया जिले में तापमान 1 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया जा चुका है। उधर सर्दी में भी गर्मी का अहसास कराने वाला महाराष्ट्र का विदर्भ और सुदूर छत्तीसगढ भी इस बार आश्चर्यजनक रूप से ठिठुर रहा है।

सर्दी के इस शुरुआती सितम से सामान्य जनजीवन बुरी तरह गडबडा गया है। बेघर लोगों के लोगों के मरने की खबरें भी आ रही हैं। हालांकि बडे शहरों से निकलने वाले समाचार पत्रों में अब सर्दी से होने वाली मौतों की खबरों को जगह मिलनी लगभग बंद हो गई है। कुछ साल पहले तक ऐसा नहीं था, अखबारों में नियमित खबरें छपती थीं और हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट उन खबरों का संज्ञान लेकर संबंधित राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों से जवाब तलब करती थीं। लेकिन अब सरकारों का मीडिया प्रबंधन तंत्र ऐसी खबरों को छपने से रोकने में सफल होने लगा है। यही वजह है कि अभी तक अखबारों में महज दो लोगों के मरने की खबर ही आ पाई है- एक मध्य प्रदेश से और दूसरी दिल्ली से। लेकिन हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में भी सर्दी की वजह से लोगों की जानें गई हैं।

कोहरे के कारण सडक, रेल और हवाई यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। नदी-नालों और तालाबों के जमने की खबरें भी आ रही हैं। कुछ जगहों पर तो पानी की आपूर्ति की पाइपलाइन तक जम गई है। वैसे सर्दी हमारे नियमित मौसम चक्र का ही हिस्सा है, कडाके की सर्दी इसका हल्का सा विचलन भर है। सर्दी और भीषण सर्दी अंत में हमें कई तरह से फायदा ही पहुंचाती है। सबसे बड़ी बात है कि कडाके सर्दी की सर्दी हमें आश्वस्त करती है कि ग्लोबल वार्मिंग उतनी सन्निकट नही है, जितना कि अक्सर हम मान बैठते हैं। मौसम की मौजूदा अति हमारे लिए कोई नई बात नही है। हर कुछ साल के बाद हमारा इससे सामना होता रहता है- कभी सर्दी में, कभी गरमी तो कभी बारिश में। मौसम कोई भी हो, जब भी उसकी अति दरवाजे पर दस्तक देती है तो हमारी सारी व्यवस्थाओं की पोल का पिटारा खुलने लगता है। फिलहाल सर्दी की बात की जाए तो हमेशा की तरह इस बार भी सबसे ज्यादा पोल खुली है पूर्वानुमान लगाने वाले मौसम विभाग की। बारिश का मौसम खत्म होते ही हमें बताया गया था कि इस बार सर्दी कम पडेगी। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की चर्चाओं के बीच इस भविष्यवाणी पर किसी को भी हैरानी नहीं हुई।

हालांकि मौसम चक्र में आ रहे बदलाव के चलते सर्दी की शुरुआत कहीं जल्दी तो कहीं देरी से हुई, लेकिन दिसंबर शुरू होते ही सर्दी ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए। फिर मौसम विभाग की ओर से बताया गया कि यह कडाके ठंड चंद दिनों की ही मेहमान है, जल्द ही मौजूदा उत्तर पश्चिमी हवाओं का रुख बदलेगा और तापमान सामान्य के करीब पहुंच जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सर्दी के तेवर और तीखे हुए तो शीतलहर के एक चक्र की घोषणा हो गई। सिर्फ मौसम विभाग ही नहीं, बाकी सरकारी महकमों का भी यही हाल है। फुटपाथों, रेलवे स्टेशनों और भूमिगत पारपथों पर रात गुजारने वाले बेघर लोगों के लिए रैन बसेरों की व्यवस्था अभी भी कई जगह अधूरी है या बिल्कुल ही नहीं है, जबकि सुप्रीम कोर्ट कई बार इस मामले में राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए पुख्ता बंदोबस्त करने के निर्देश दे चुका है। जहां रैन बसेरों की व्यवस्था करना संभव नहीं है, वहां अलाव जलाने के लिए लकडी मुहैया कराई जाती है, लेकिन यह भी नहीं हो पा रहा है।

दरअसल शहरी और अर्द्ध शहरी इलाकों में मौसम की मार से लोगों के मरने के पीछे सबसे बडी वजह है शहरी नियोजन में सरकारी तंत्र की अदूरदर्शिता। जब से आवासीय कॉलोनियों की बसाहट के मामले में विकास प्राधिकरणों और गृह निर्माण मंडलों के बजाय निजी भवन निर्माताओं और कॉलोनाइजरों का दखल बढा है, तब से रोज कमाकर रोज खाने वालों और बेघर लोगों के लिए आवासीय योजनाएं हाशिए पर खिसकती गई हैं। करोडों लोग आज भी फुटपाथों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर या टाट और प्लास्टिक आदि से बनी झोपडियों में रात बिताते हैं। बहुत से लोगों के पास तो पहनने को गरम कपडे या ओढने को रजाई-कंबल तो दूर तापने को सूखी लकडियां तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे लोगों को मौसम की मार से बचाने के लिए अदालतें हर साल सरकारों और स्थानीय निकायों को लताडती रहती है, लेकिन सरकारी तंत्र की मोटी चमडी पर ऐसी लताडों का कोई असर नहीं होता। यह शीतहलर हमें बता रही है कि जब मौसम के हल्के से विचलन का सामना करने की हमारी तैयारी नहीं है और हमारी व्यवस्थाएं पंगु बनी हुई हैं, तो जब ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौती हमारे सामने होगी तो उसका मुकाबला हम कैसे करेंगे?

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