कर्नाटक में विधायकों इस्तीफे देकर सरकार गिराने में लगे हैं और गोवा में विधायकों ने थोक में अपनी पार्टी बदल कर गिरती सरकार को रोक लिया है। देनों जगह दल-बदल कानून की धज्जियां उड़ गई हैं। कर्नाटक में बड़ी संख्या में दल-बदल संभव नहीं था तो त्यागपत्र के जरिए बहुमत के लिए जरूरी संख्या कम की जा रही है ताकि भाजपा सरकार बना सके। गोवा में गोवा फरवर्ड पार्टी के बाहर जाने की संभावना थी तो कांग्रेस को तोड़ दिया गया। इसके पहले राज्यसभा में तेलुगु देसम पार्टी के चार सांसद भाजपा मं चले आए। कई लोग पूछते हैं कि क्या यहपहली बार हो रहा है? जी नहीं, यह पहली बार नहीं हो रहा है। यह पहली बार नहीं हो रहा है। पहली बार यह रहा है कि इसे लेकर  राजनीति या समाज में कोई शोर नहीं है। यह सच है कि यह मार्ग  कांग्रेस ने ही दिखाया, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि इसके खिलाफ आवाज नहीं उठी या राजनेताओं ने इसकी आलोचना नहीं की। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि इन सत्कर्मों को अंजाम देने वाली पार्टी यानि कांग्रेस भी चेहरा छिपाए फिरती थी। अभी तो हर भाजपा नेता आक्रामक ढंग से इस राजनीतिक अपराध  वकालत कर रहा है। सहज भाव से कह रहा है कि कांग्रेस अपना घर ठीक रखे। यह वैसा ही है कि डाका डालने वाला घर के मालिक को सुरक्षा पाने में विफल होने का दोषी बताए।
वैसे राजनाथ सिंह की छवि एक संजीदे राजनेता की रही है। लेकिन लोक सभा में अपने भाषण में उन्होंने भी यह तर्क पेश कर दिया कि कर्नाटक में विधायकों को इस्तीफे दिलाने का काम भाजपा ने नहीं किया है, इस्तीफां की शुरूआत तो राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने से शुरू हुई है। उन्होंने झट से अपनी पार्टी को पाक-साफ बता दिया कि उनकी पार्टी दल-बदल के लिए दबाव नहीं बनाती।
पार्टी के दोहरेपन का अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है कि मोदी को मिले जनादेश को लेकर उठाए जा रहे सवालों के जवाब में उसने यह प्रचार किया कि लोग सवाल उठा कर लोकतंत्र का असम्मान कर  रहे हैं। कर्नाटक या गोवा में पार्टी जो कर रही है वह लोकतंत्र का कैसा सम्मान है?
लेकिन कर्नाटक या गोवा में जो हो रहा है उसे महज दल-बदल कानून को बेअसर करने का एक तरीका नहीं मानना चाहिए। इसे लोकतंत्र की उस बीमारी का लक्षण मानना चाहिए जो भाजपा के सत्ता में लौटने से उभर कर आ रही है। भाजपा विप़क्ष को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है और सत्ता पाने की इसकी कामना ने इतना अधिक विस्तार ले लिया है कि यह विधानसभाओं से लेकर ग्राम पंचायतों तक में सत्ता में दीखना चाहती है। इसके कार्यकर्ता अब कहीं इंतजार नहीं कर सकते। इसकी शुरूआत शीर्ष में बैठे नेताओं से होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले चुनावों में दिखा दिया कि सत्ता में रहने के लिए उन्होंने किस तरह राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और धनबल का सहारा लिया। उन्होंने गलत ऐतिहासिक तथ्य रखे और सोशल मीडिया के उनके सैनिकां ने बेहिचक झूठ फैलाया। आचार संहिता का खुलेआम उल्लंघन किया और आयकर विभाग से लेकर सीबीआई का इस्तेमाल विपक्ष को नीचा दिखाने के लिए किया। शीर्ष से निकली सत्ता की यह लोलुपता नीचे तक चली आई है। अब भाजपा का कोई कार्यकर्ता कहीं भी सत्ता से बाहर नहीं रहना चाहता। सत्ता की ताकत से मिलने वाले मजे को आप विधायक के हाथ में बल्ला देख कर मत लगाएं। विकास का जो खरबों के बजट में हिस्सा पाने में भी देखिए। कर्नाटक में येदुरप्पा जनता की भलाई के लिए बेचैन नहीं हैं और न ही गोवा में स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर के पुत्र उत्पल पर्रिकर कांग्रेस विधायकां को तोड़ कर लाने में इसलिए सक्रिय हैं कि गोवा के विकास कार्य में बाधा न हो। वे अपने-अपने राज्यों में सत्ता की कुंजी हाथ में रखना चाहते हैं। इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में जल्द ही भाजपाई सरकार गिराने में लग जाएंगे। मोदी ने भाजपा कार्यकर्ताओं को मंत्र दे दिया है कि मोदी है तो मुमकिन है। इस मंत्र का अर्थ है कि सत्ता पाना सिर्फ मोदी और शाह के लिए मुमकिन नहीं है, हर कार्यकर्ता के लिए मुमकिन है। लेकिन भाजपा के नेताओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि सत्ता की कामना वासना में तब्दील हो जाने के बाद अपना नग्न रूप दिखाने लगती है। उसे संभालना उनके लिए मुश्किल होगा।

Comments