जिस सरकार ने दो करोड नौकरियां प्रति वर्ष देने का वादा किया था, वह सरकार कुछ सैकडा नौकरी भी इस आरक्षण के माध्यम से नहीं दे सकती है। दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग को तो संविधान प्रदत्त आरक्षण से दोहरा नुकसान हो रहा है। उन्हें आरक्षण का पर्याप्त लाभ तो नहीं ही मिल रहा है और इसके बावजूद वे सवण्रों की ईष्याã और तानों के शिकार भी बन रहे है। दलित-आदिवासी और पिछडे वर्गों को जरुरत थी शिक्षा की और चेतना की। जरुरत थी उसे एक अंधे कुए से निकालकर रोशनी दिखाने की। वो सदियो से अंधकार मे रहा, उसमे इतनी çऊ र्जा भी नही बची थी कि वह अपने आरक्षण का लाभ ले सके। देश के उद्योग में व्यापार मे उसकी कोई हिस्सेदारी नहीं थी। मायनो में उसकी उन्नति तो तब होती जब वह उद्योग-व्यापार आदि क्षेत्रों में भागीदारी करता’ लेकिन हुआ उसका उलटा, वह इन क्षेत्रों में जगह बनाना तो दूर, अपने को अध्किार के तौर पर हासिल आरक्षण का भी लाभ पूरी तरह नहीं ले पाया।

सवर्ण वर्ग जिसकी उद्योग, व्यापार, चिकित्सा, शिक्षा में बडी हिस्सेदारी है, आरक्षण का लाभ लेने के लिए उसका वह तबका ज्यादा आएगा, जो उद्योग आदि मे कोई लाभ प्राप्त नही कर सका है। वह पहले भी परेशान था, अब और ज्यादा परेशान हो जाएगा। उसके हिस्से में कुछ भी नहीं आएगा। उन्हें आरक्षण का सपना दिखाना, चुनाव पूर्व अपना चेहरा चमकाने की कवायद भर है।

वैसे दलित, पिछड़ा हो या सवर्ण, नौकरियां कुछ ही है और जरुरत अनगिनत की है। मसलन उत्तरप्रदेश में 1700 नौकरियां, उसमे भी खास तौर पर चपरासी की, मगर आवेदन आते हैं 17 लाख। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में राजस्थान में 300 होमगार्ड की नौकरियों के लिए 30,000 आवेदन आए थे और लाठी चार्ज हुआ था। मोदी सरकार को देश मे नौकरियां उपलब्ध कराना थी। उसके लिए जरुरत थी हुआ उसका उलटा। नोटबंदी, जीएसटी ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी। गाय, लव-जिहाद, हिन्दू-मुसलमान, भारत माता, वंदे मातरम, शहरों के नाम परिवर्तन आदि अनावश्यक मुद्दों ने देश को भटका दिया। ऐसे मे यह सवर्णों के लिए दस फीसद आरक्षण की घोषणा फेअर एंड लवली ज्यादा कुछ नहीं है।

 

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