रॉफेल लडाकू विमान घोटाले का तूफान फौरी तौर पर तो लगता है कि थम सा गया है लेकिन असल में थमा नहीं है। इसकी अनुगूंज अभी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में और फिर कुछ महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव तक रह-रहकर सुनाई देती रहेगी। हालांकि सरकार की पूरी कोशिश होगी कि चुनावों में यह मामला मुद्दा न बने। बताया जाता है कि इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी सरकार के इशारे पर ही दाखिल कराई गई है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस याचिका को लेकर सरकार से कोई असुविधाजनक सवाल नहीं पूछा है, लिहाज आसार इसी बात के है कि वहां से भी सरकार को ‘क्लीन चिट’ मिल जाएगी और वह उसका इस्तेमाल चुनावों के दौरान विपक्ष के हमलों का जवाब देने में करेगी।

रॉफेल विमान घोटाला सबसे पहले कायदे से लोकसभा के वर्षाकालीन सत्र में गूंजा था। लोकसभा में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस के दौरान इस मुद्दे पर हुई बहस को जनता ने टेलीविजन पर देखा था। सरकारी चैनलों के साथ ही निजी टीवी चैनलों को भी व्यावसायिक मजबूरी में इसे दिखाना पडा था। लोकसभा में रॉफेल सौदे पर राहुल गांधी के उठाए सवालों को अचानक उनके द्बारा मारी गई आंख पर कोहराम मचा कर दबाने की कोशिश की गई थी। राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर देश भर मे कोई जन-आंदोलन भले ही खड़ा नहीं किया हो, लेकिन उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा। वे देशभर में जहां भी गए, ‘चौकीदार ही चोर है’ कहकर उन्होंने भाजपा को सन्निपात की स्थिति में ला दिया। बौखलाई हुई भाजपा ने मोदी को वैश्विक नेता बताना शुरू कर दिया। मोदी-मोदी के स्वर को हर-हर महादेव से बड़ा मान लिया था। अपने द्वारा गढी गई उस मोहिनी मूरत को इस तरह से खंडित होते देखकर भाजपा के नेता और मंत्री राहुल गांधी पर निम्नस्तर के आरोप लगाते हुए खुद कौनसे स्तर पर उतर गए, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है।

कांग्रेस पार्टी अपने आप को महात्मा गांधी की पार्टी बताती है। गांधी ने दुनिया को सत्याग्रह का जो अस्त्र दिया, वह उनके ही देश में निशस्त्र बनने की दिशा में प्रस्थान कर चुका है। सत्याग्रह का मतलब होता है कि यदि आप सही है तो पहले गलती करने वाले के समक्ष ज्ञापन, प्रदर्शन, धरना, आंदोलन, जेल, अनशन और फिर आमरण अनशन करें। राहुल गांधी से लेकर उनकी पूरी पार्टी ने पिछले चार वर्षों मे ऐसा कोई कर्म या संघर्ष नहीं किया है। अलबत्ता उन्होंने कभी मानसरोवर की यात्रा और शिव स्त्रोत के पाठ जैसे कर्मकांड जरुर किए। यदि राहुल गांधी ने सत्याग्रह की अवधारणा को धारण किया होता तो देश हिल जाता। जनहित के मुद्दांे से देश गुंजायमान होता है, लेकिन राहुल ऐसा नहीं कर सके। दूसरी विपक्षी पार्टियों का रेकॉर्ड भी इस मामले में कांग्रेस से जुदा नहीं है।

हमारे देश की राजनीति में संघर्ष के सारे हथियार धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। दरअसल किसी भी आंदोलन खड़ा करने के लिए पहली जरुरत होती है नैतिकता और आत्म बल की और दूसरी जरुरत होती है परिश्रम करने और पसीना बहाने की। उससे निकलता है संघर्ष। राहुल गांधी ने यदि आंशिक रू प से भी यह सब किया होता तो देश भर में कांग्रेस उठ खड़ी होती। उसमें कुछ गरमी आती जनता को भी लगता कि हमारे दर्द की कराह को यह पार्टी महसूस करती है। लेकिन यह सब नहीं हो सका।

टीवी ने इस कमी को कम करने का प्रयास जरुर किया, लेकिन अपनी व्यावसायिक जरुरतों के मुताबिक। वैसे इसका ही दूसरा पहलू यह भी है कि देश 135 करोड़ का हो चुका है। टीवी पर आकर कोई छोटा सा आंदोलन बडा बन जाता है और कोई बड़ा सा आन्दोलन मर जाता है। आजादी के सात दशकों में देश की राजनीति मे जिदगी मे बहुत कुछ बदला है। पहले साइकिल होना सुविधा थी, आजकल कार आवश्यकता बन चुकी है। हेलिकाप्टर हवाई जहाज तो बडे नेता स्कूटर-कार की तरह उपयोग मे लाते है। यह सब वे कहां से लाते हैं? जहां से लाते हैं वहीं पर सत्याग्रह को छोड आते हैं। यहां पर एक बात और भी गौर करने लायक है कि पिछले 1०-2० वर्षों में सत्याग्रह करने वालों की बड़ी दुर्गति हुई है और उनकी आवाज न सरकार ने सुनी है और न देश की जनता ने। मेधा पाटकर की अगुवाई में जारी नर्मदा बचाओ आंदोलन और मणिपुर में इरोम शर्मिला का अनशन सबसे बडी मिसाल है। वहीं इसका दूसरा पहलू भी है। अन्ना हजारे के 2०12-13 में दिल्ली में किए गए आंदोलन ने देश को हिलाया था। अन्ना हजारे से लेकर रामदेव तक और किरण बेदी से लेकर केजरीवाल तक किसी ने एक लाठी तो ठीक एक दिन की जेल की हवा भी नहीं खाई थी, लेकिन देश के हीरो बन गए थे। इसमें दो चीजे मुख्य रू प से थी, पहली यह कि वे जनता के गुस्से को अभिव्यक्त कर रहे थे और दूसरी उससे बड़ी बात मीडिया उन्हें लगातार दिखा रहा था। यह दिखाना आपको एक दिन में 135 करोड से रुबरू करा देता है। लेकिन बगैर किसी जमीनी हकीकत के दिखाए जाने पर उतनी ही जल्दी भुलवा भी देता है। हम कह सकते है कि यह लोकतंत्र के सभी अंगांे की सार्थकता और निरर्थकता का दौर है।

रॉफेल घोटाले में मोदी सरकार की अनेकानेक बंदिशों के बाद भी मीडिया और उससे भी ज्यादा सोशियल मीडिया ने सच्चाई सामने लाने का काम किया है। कम या अधिक का अंतर हो सकता है। इस सिलसिले में राजनीति और मीडिया के कुछ लोगों की असली सूरत भी सामने आ है, जो बड़ी ही अदाकारी से अपनी राजनीति और पत्रकारिता को छद्म अंदाज में अंजाम देते रहे है।

राकांपा के नेता शरद पवार ने मराठी में बड़ी ही चतुराई से नरेंद्र मोदी को क्लीन चीट देने की कोशिश की थी। मीडिया उसे पचा कर धीरे-धीरे मोदी को बरी करने की कोशिश भी करता, इसके पहले ही उनके ही दल के तारिक अनवर ने उनके चेहरे पर से छद्मता का नकाब उतार अंबानी और मोदी से उनके लगाव संलिप्तता को दिखा दिया। तीन दिन बाद पवार सफाई दे रहे थे कि मीडिया ने उनके कथन को तोड-मरोडकर दिखाया है। प्रश्न उठता है यह सब उन्हे तारीक अनवर के दल छोड़ने के बाद ही क्यों याद आया? उसी तरह से पत्रकार शेखर गुप्ता ने तीन लेख मोदी को बरी करने के लिए और अंबानी को भला साबित करने के लिए अभी तक लिख दिए हैं। नेता और पत्रकार मे यही अंतर होता है। नेता को जनता को जवाब देना होता है। पत्रकार की भी जवाबदेही तो जनता के प्रति होनी चाहिए, लेकिन उसे वोट की जरुरत नहीं होती है, लिहाजा वह अपनी जवाबदेही से बच निकलता है। वह अपनी जवाबदेही मालिक और सरकार के प्रति आसानी से निभा सकता है। रॉफेल घोटाले में शरद पवार, शेखर गुप्ता जैसांे की लाख कोशिशें जनता को बहला नहीं सकेगी। वे राहुल गांधी को रॉफेल सौदे पर सवाल उठाने के लिए पप्पू और बोफोर्स मामला उठाने वाले वी.पी. सिह को भले ही चतुर होने की संज्ञा दे दे, लेकिन सच यही है कि बोफोर्स के पहाड खुदायी में से चुहिया भी नहीं निकली थी। यही नहीं कारगिल की लडाई में बोफोर्स ने ही विजय दिलाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। नरेंद्र मोदी की तरह राजीव गांधी ने प्रत्यक्ष तो क्या अप्रत्यक्ष रू प से भी साठ हजार करोड के अघोषित दिवालिये अनिल अंबानी जैसे किसी शख्स के साथ डील भी नही करवाई थी। बोफोर्स तोपों की संख्या भी रॉफेल विमानों की तरह घटाई या बढ़ाई नहीं थी। बोफोर्स की कीमत भी रॉफेल की तरह नही बढ़ाई थी। बोफोर्स मामला सिर्फ स्विस रेडियो पर ‘दलाली ली गई है’, कहने का नतीजा था, जबकि रॉफेल घोटाले की फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति भी पुष्टि कर रहे हैं। भाजपा के पास अपने बचाव का कोई ठोस तर्क नहीं हैं। राफ़ेल और बोफोर्स में यही

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