सरकार को विपक्ष की सलाह की जरुरत नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के शुरुआती दौर में कई बार सहकारी संघवाद बढावा देने की बात कही थी, मगर जल्दी ही उन्होंने इस बात को भुला दिया। देश और राज्यों से जुडे बडे फैसले करने में न तो वे राज्यों को शामिल कर रहे हैं और न ही विपक्षी पार्टियों से राय-मशविरा कर रहे हैं। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। सरकार सारी घोषणाएं एकतरफा कर रही है। सरकार ने पहले नागरिकता कानून में संशोधन की और फिर पूरे देश में एनआरसी कराने की भी एकतरफा घोषणा की और अब खुद ही कह रही है कि एनआरसी पर चर्चा ही नहीं हुई है और अभी पूरे देश में इसे लागू करने के बारे में कोई फैसला नहीं किया गया है। सरकार के इस रवैए से हैरान विपक्षी पार्टियां चाहती है कि सरकार उनके साथ विचार विमर्श करे। विपक्ष ने राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक बुलाने की अपील की है। इसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री सदस्य होते हैं। काफी समय से इसकी बैठक नहीं हुई है। विपक्ष चाहता है कि यह बैठक हो तो उसमे सारे राज्य अपनी चिंता रखेंगे। दूसरी सलाह यह है कि सरकार एक सर्वदलीय बैठक बुलाए, जिसमें विवाद के सारे मुद्दों पर विपक्ष को अपना पक्ष रखने का मौका मिले। पर सरकार और भाजपा से जुडे सूत्रों का कहना है कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है। सरकार नागरिकता से जुडे किसी भी मामले में विपक्षी पार्टियों से बात नहीं करने वाली है। इसका नुकसान हो या फायदा, भाजपा अकेले ही उठाएगी।

वक्त-वक्त की बात  

पहले छत्तीसगढ, उसके बाद महाराष्ट्र और अब झारखंड। इन तीनों राज्यों से देश के कॉरपोरेट घरानों के सरोकार गहरे तक जुडे हैं। इसलिए इन तीनों राज्यों में विपक्ष की सरकार आने के बाद कॉरपोरेट जगत के मिजाज में बदलाव दिख रहा है। झारखंड मे जहां एक वक्त झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास चुनाव में संसाधनों का टोटा था, लेकिन नतीजों के बाद जैसे ही यह तय हुआ कि हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री होंगे, उनके लिए चार कॉरपोरेट घरानों ने अपने-अपने चार्टेड प्लेन रांची एयरपोर्ट पर खडे करा दिए। कॉरपोरेट घरानों में इस बात की होड दिखी कि हेमंत सोरेन उन्हीं का प्लेन इस्तेमाल करे। कहा तो यह भी जा रहा है कि हेमंत से नजदीकी बढाने के लिए कॉरपोरेट घरानों के प्रतिनिधि रांची में डेरा डाल चुके हैं। चूंकि छत्तीसगढ में कांग्रेस की सरकार है, जबकि महाराष्ट्र और झारखंड में वह सत्ता में भागीदार तो है ही, इस वजह से उन कॉरपोरेट घरानों को भी अपना नजरिया बदलना पडा है, जिन्होंने पहले भाजपा के नाराज होने के डर से कांग्रेस से मुंह फेर लिया था। कांग्रेस से बेहतर रिश्ते बनाने के लिए भी पहल शुरू हो गई है। 2014 के बाद से कांग्रेस के लिए जिस तरह की स्थितियां बनी, उसमें कांग्रेस के लिए भी कॉरपोरेट घरानों से दोस्ती बहुत जरूरी हो चुकी है। कॉरपोरेट क्षेत्र के रुख में आए इस बदलाव का असर भविष्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी दिखेगा। विपक्ष का चुनाव अभियान भाजपा के मुकाबले कमजोर नजर नहीं आएगा। चुनावों में कॉरपोरेट घरानों की भूमिका किसी से छुपी नहीं है।

भारत को नए जनरल रावत मिल गए!

थल सेनाध्यक्ष के पद से रिटायर होते ही जनरल विपिन रावत देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ हो गए हैं। उनकी जगह नए थल सेना प्रमुख बने जनरल मनोज मुकुंद नरवाने ने पदभार ग्रहण करते ही जो बयान दिया, उससे साफ हो गया कि वे जब तक थल सेनाध्यक्ष रहेंगे, लोगों को जनरल रावत की कमी महसूस नहीं होने देंगे। विपिन रावत सेना प्रमुख के रूप में अपने तीन साल के कार्यकाल के दौरान राजनीतिक बयानों को लेकर खूब विवादों में रहे। जनरल नरवाने ने रावत की लाइन पर ही पाकिस्तान को लेकर जो बयान दिया, उससे लगता है कि आने वाले दिनों में नियंत्रण रेखा पर कैसा माहौल रहना है और भारत की ओर से कैसी बयानबाजी होनी है। हालांकि जनरल नरवाने ने राजनीतिक बयान नहीं दिया है, मगर उन्होंने सेना से जुडी बुनियादी बातों और सुधारों पर चर्चा की बजाय देश के मौजूदा सत्तारूढ नेताओं की ओर से बार-बार ‘घर में घुस कर मारेंगे’ जैसे दिए जाने वाले बयान ही आगे बढाया है। उन्होंने कहा कि अगर सीमा पार से आतंकवादी गतिविधियां जारी रही तो भारत उसकी जड पर हमला करने का अधिकार सुरक्षित रखता है। ध्यान रहे जड पर हमला करने का मतलब आतंकवादियों के शिविरों को निशाना बनाना है, जैसा कि सरकार की ओर से सितंबर 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक था और फिर फरवरी 2019 में बालाकोट स्ट्राइक के जरिए करने का दावा किया था।

बिहार में ओवैसी की राजनीति

ऑल इंडिया एमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी बिहार में बडा राजनीतिक खेल खेलने की तैयारी कर रहे हैं। उनकी तैयारी राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस दोनों के लिए चिंता का सबब है। गौरतलब है कि पिछले दिनों बिहार में हुए उपचुनावों में किशनगंज सीट पर ओवैसी का उम्मीदवार जीता था। यह सीट पहले कांग्रेस ने जीती थी और इस सीट से जीते कांग्रेस विधायक के लोकसभा चुनाव जीत कर सांसद बन जाने के बाद इस सीट पर उपचुनाव हुआ था। समूचे विपक्ष को बिहार में एक लोकसभा सीट मिली और उस सीट पर जीता हुआ सांसद अपनी विधानसभा सीट नहीं बचा सका! वह सीट ओवैसी ने जीत ली। इस जीत से उत्साहित ओवैसी ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बिहार में मुस्लिम और दलित गठजोड बना कर चुनाव लडने का इरादा बनाया है। इस काम में पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के नेता जीतनराम मांझी उनकी मदद कर सकते है। रविवार को ओवैसी एक रैली कर रहे हैं, जिसमें मांझी भी शामिल होंगे। उल्लेखनीय है कि मांझी महागठबंधन से अलग हो गए हैं और अपने लिए नई जगह तलाश रहे हैं। अगर ओवैसी के साथ उनका चुनावी तालमेल होता है तो कम से कम कोशी और सीमांचल के इलाके में कांग्रेस और राजद के लिए बहुत मुश्किल होगी। इससे जदयू और भाजपा को भी ध्रुवीकरण कराने में आसानी हो जाएगी।

दो साल एनपीआर, एनआरसी ही चलेगा!

अब अगले दो साल का एजेंडा तय हो गया है। जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी का ऐलान किया तो एक साल तक पूरे देश में इसी की चर्चा चलती रही और चौतरफा अफरातफरी मची रही। उसी तरह अब अगले दो साल तक पूरे देश में नागरिकता कानून, जनगणना, जनसंख्या रजिस्टर और नागरिक रजिस्टर का मुद्दा चलता रहेगा। राजनीतिक नफा-नुकसान एक तरफ है। अभी नहीं कहा जा सकता है कि इसका फायदा किसको होगा और किसको नुकसान होगा पर इसमें संदेह नहीं कि पूरा देश इसी में उलझा रहेगा। अगले साल अप्रैल से लेकर सितंबर तक जनसंख्या रजिस्टर पर काम होगा। उसके बाद 2021 की जनगणना चलेगी। ये दोनों काम पूरे होंगे तो नागरिकता रजिस्टर का काम होगा। माना जा रहा है कि सरकार इन दोनों के आंकडों के आधार पर आगे का रास्ता बनाएगी। अभी भले ही सरकार कह रही है कि एनपीआर और एनआरसी का आपस में कोई लेना देना नहीं है पर हकीकत यह है कि सरकार खुद कई बार कह चुकी है कि एनआरसी का पहला कदम एनपीआर है। सो, तय है कि अगले दो साल से कुछ ज्यादा समय तक देश में इसी पर चर्चा होगी।

मजबूरी बनते क्षेत्रीय दल

2014 के लोकसभा चुनाव में जिस तरह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने अपनी जीत का डंका बजाया था और फिर राज्यों के विधानसभा चुनाव में उसने अपनी जीत का सिलसिला शुरू किया, उसके बाद यह धारणा बनने लगी थी कि अब क्षेत्रीय दलों के दिन लद गए। लेकिन 2019 में लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और पिछले पखवाडे झारखंड के नतीजों ने साबित किया कि क्षेत्रीय दलों का वजूद अभी खत्म नहीं हुआ है और वे राष्ट्रीय दलों की मजबूरी बने रहेंगे। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी (दोनों क्षेत्रीय दल) राष्ट्रीय दलों पर भारी पडे। शिवसेना ने तो भाजपा का सरकार बनाने का सारा खेल ही बिगाड दिया। एनसीपी ने भी कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन कर उसकी निर्भरता को और बढा दिया। हरियाणा में सरकार बनाने के लिए भाजपा को दुष्यंत चौटाला की नवजात जननायक जनता पार्टी को सत्ता में साझेदार बनाना पडा और उसकी शर्तों के झुकना पडा। झारखंड में भी एक क्षेत्रीय दल- झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और भाजपा दोनों से आगे रहा। कांग्रेस को उसका नेतृत्व स्वीकार करना पडा। दिल्ली में आम आदमी पार्टी अभी भी भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती बनी हुई है इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का रास्ता दिल्ली विधानसभा चुनाव में आसान नहीं रहने वाला। दिल्ली के बाद बिहार विधानसभा के चुनाव होने हैं। वहां भी कांग्रेस और भाजपा के लिए क्षेत्रीय दलों पर निर्भर रहना मजबूरी ही होगी। यह पूरा राजनीतिक परिदृश्य क्षेत्रीय दलों को खासा उत्साहित किए हुए है।

चलते-चलते

कोटा भी एक गोरखपुर है,

गोरखपुर भी एक कोटा था।

इनके सिक्के में जंग लगी,

उनका भी सिक्का खोटा था।

(संदर्भ सरकारी अस्पतोलों में बच्चों की मौत)

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