आजादी के बाद से ही देश में शिक्षा के लिये सरकार के द्बारा बडी राशि खर्च की जा रही है। शिक्षा के निजीकरण के जमाने में भी सरकारी शिक्षा बजट उतना कम नहीं है लेकिन उसके बाद भी सरकारी स्कूलों की दशा दयनीय होती जा रही है।

शिक्षा के क्षेत्र में जो धन उपलब्ध करवाया जा रहा है उससे सरकारी स्कूल भवन तो अपग्रेड हो रहे है, लेकिन शिक्षा का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। चौथे दर्जे का सरकार कर्मचारी भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहता है। इससे ऊँचे दर्जे के कर्मचारियों को तो केन्द्रीय स्कूल भी स्तरीय नहीं लगता है। इसी का परिणाम है कि आज साधन सुविधा प्राप्त सरकारी स्कूलों का स्तर में दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है, और गाजर घास की तरह तेजी से फैल रही निजी स्कूलें लगातार आगे बढती जा रही है।

प्राथमिक शिक्षा को अब अधिकार बना दिया गया है। सरकार और प्रदेश सरकारे इसके क्रियान्वयन पर बडी राशि खर्च करने की तैयारी में है। देश में साक्षरता बढे, बच्चे साक्षर हो इसके लिये शहरों से लेकर ग्रामों और फलियों में स्कूल खोले जा रहे है। षाला त्यागी बच्चों की पढ़ाई की चिंता करते हुए उनके लिए विशेष अभियान चलाये जा रहे है। लेकिन क्या इसका परिणाम हमे मिल पा रहा है? इसका जवाब नकारात्मक ही मिलेगा।

इन सबके बाद सरकारो की ऐसी क्या मजबूरी है कि वे सरकार स्कूलो पर बेहिसाब राशि खर्च करती जा रही है, अगर इतनी राशि खर्च हो रही है तो फिर परिणाम अनुकूल क्यो नही आ पा रहे है।

शिक्षा के भारी भरकम बजट के बावजूद महानगरों, नगरों और ग्रामों के बाद दूरस्थ क्षेत्रों में निजी स्कूल खुलते जाने का राज क्या है? क्या सरकारी स्कूलो में शिक्षा का स्तर नही है? क्या सरकारी स्कूलो में पढाया नही जाता? क्या सरकारी स्कूलों में शिक्षक नही है? या सरकारी स्कूल कागजो पर ही संचालित हो रहे है? ये ऐसे सवाल हैं जिन पर सरकारी नीतिकारो ने या तो कम ध्यान दिया है या फिर ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा गया है।

नव उदारवाद आज सरस्वती के मंदिर में प्रवेश कर चुका है जिसके कारण इसके आवश्यक घटक भ्रष्टाचार के जिन्न ने भी अपने पैर पसार लिए हैं। इस कारण शिक्षा पर होने वाली रा का एक बडा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ रहा है और बनावटी आँकड़े ऊपर तक जा रहे हैं।

इसका सबसे बढा उदाहरण है प्रतिवर्ष स्कूल भवनों पर खर्च होने वाली राशि। केन्द्र से लगाकर राज्य सरकारें स्कूल भवनों को बनाने और इसके संधारण पर बडी राशि खर्च करती है। इसके पीछे जहाँ कमीशन का मकड़जाल है तो दूसरी और आँकडों से यह भी बताया जा रहा है कि सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों की स्पर्द्घा में लाया जा रहा है और शीघ्र ही बेहतर परिणाम दिखाई देने वाले है। लेकिन साल दर साल यही प्रहसन चलता रहता है और परिणाम ढाक के तीन पात की तरह होते हैं।

देशभर में आँकडों को एकत्रित किया जाये तो परिणाम और चौंकाने वाले आ सकते है। सरकार के मातहत कर्मचारियो में सिर्फ शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारियों और अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में दाखिलों के आँकड़े देखें जाए तो आप हैरत में पड़ जाएँगें। मैंने म.प्र. सरकार के स्कूली शिक्षा विभाग और आदिम जाति कल्याण विभाग के प्रमुख सचिवों से सूचना का अधिकार कानून के अन्तर्गत जानकारी माँगी थी कि शासकीय स्कूलों में इन विभागों के कर्मचारियों के कितने बच्चे अध्ययनरत हैं। आश्चर्यजनक रूप से दोनों ही प्रमुख सचिवों ने जानकारी अद्यतन न करने और उपलब्ध नहीं करा पाने की लिखित सूचना देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। जबकि बच्चे के दाखिले के समय पालक का व्यवयाय आवश्यक रूप से दर्ज किया जाता है। प्रमुख सचिव चाहते तो अधिनियम की धारा 6 (3) के तहत आवेदन-पत्रों को निचले कार्यालयों में अंतरित कर जानकारी उपलब्ध करवा सकते थे लेकिन जगहँसाई के डर से उन्होंने मामले को रफादफा करना ही उचित समझा।

दूसरी ओर सरकारी शिक्षा के क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान रखने वाले केन्द्रीय विद्यालयों की स्थिति महानगरों, नगरों में तो बेहतर मानी जा सकती है, लेकिन जिला स्तर पर इन स्कूलों के बजाय निजी स्कूलो के प्रति बच्चों और पालकों की रूचि ज्यादा है। साथ ही, साथ कई स्थानों पर केन्द्रीय विद्यालय के चेयरमेन यानी जिला कलेक्टर के बच्चे तक केन्द्रीय विद्यालय में नही पढते। यानी संस्था प्रमुख ही अपने बच्चों को इस स्कूल में पढ़ाने लायक न समझे तो अन्य शासकीय कर्मचारियो को कोई कैसे कह सकता है कि वे अपने बच्चों का दाखिला इन स्कूलो मे करवाएँ। केन्द्रीय विद्यालय संगठन की स्थापना का उद्देश्य ही सरकारी अधिकारी कर्मचारियो के बच्चो को बेहतर शिक्षा देने का रहा है।

अभी भी वक्त है सरकारो को शिक्षा के उपर किये जा रहे बेहिसाब खर्च का सही मूल्यांकन करने का, नही तो कागजी आंकडो पर वाहवाही सालो साल चलती रहेगी।

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