पार्टी विद ए डिफरेंस तो कांग्रेस है!

वैसे यह दावा भाजपा करती रही है कि वह ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ लेकिन असल में इस दावे पर हक तो कांग्रेस का बनता है। कांग्रेस ऐसी पार्टी है, जिसमें कुछ न कुछ नया चलता ही रहता है। इस समय पार्टी दो तरह की मुश्किलों का सामना कर रही है। पहली तो यह है कि पार्टी के भीतर पहली बार राहुल के वफादार बनाम सोनिया के वफादारों के बीच पाला खिंचता दिखाई पड रहा है। दूसरी मुश्किल यह है कि पार्टी में अब राज्य प्रभारियों के खिलाफ बगावत जैसे हालात बन गए हैं। प्रादेशिक नेताओं का कहना है कि केंद्र से नामित राज्य प्रभारी राज्यों में खेल बिगाडने के माहिर है। उनके जरिए अभी तक कोई काम बना ही नहीं। महाराष्ट्र में सरकार में शामिल होने के मुद्दे पर होने वाले विलंब के लिए राज्य प्रभारी को ही जिम्मेदार माना गया। ऐसी ही नाराजगी हरियाणा के प्रभारी गुलाम नबी आजाद को लेकर है। कहा जा रहा है कि वह राज्य की चुनावी फिजा को ही नहीं भांप पाए, जबकि प्रदेश नेतृत्व लगातार कहता रहा कि हम लोग सरकार बना सकते हैं। इससे पहले गोवा में राज्य प्रभारी दिग्विजय सिंह की चूक की वजह से कांग्रेस की सरकार बनने से रह गई थी। मणिपुर में भी कुछ ऐसा ही हुआ था’ ऐसे में राज्यों से यह मांग जोर पकडने लगी है कि शीर्ष नेतृत्व राज्य प्रभारी नियुक्त करना बंद करे।

सोनिया ही बनेंगी पूर्णकालिक अध्यक्ष

कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी एक बार फिर से पार्टी की पूर्णकालिक अध्यक्ष बन सकती हैं। वे लगातार करीब 20 साल तक कांग्रेस अध्यक्ष रही हैं। बीच में एक साल के लिए राहुल गांधी अध्यक्ष बने पर लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने पद छोड दिया। इस्तीफा देते वक्त वे यह भी चाहते थे कि उनके परिवार का कोई सदस्य अध्यक्ष नहीं बने। उन्होंने प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बनाने की मांग करने वालों को फटकार भी लगाई थी। पर वे सोनिया गांधी को फिर से पार्टी की कमान संभालने से नहीं रोक पाए। पिछले दिनों चर्चा थी कि राहुल फिर से अध्यक्ष हो सकते हैं, लेकिन जानकार सूत्रों का कहना है कि राहुल पार्टी के कामकाज में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। यानी फिर से अध्यक्ष बनने में उनकी कोई रुचि नहीं है। दूसरी हकीकत यह है कि पार्टी के तमाम नेता भी किसी गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को अध्यक्ष नहीं बनने देना चाहते। उनका कहना है कि अभी सोनिया गांधी ही अध्यक्ष रहे और 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले राहुल या प्रियंका में से किसी को पार्टी की कमान सौंपे। ऐसा करने के लिए सोनिया गांधी को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनना होगा। बताया जा रहा है कि पार्टी के संगठनात्मक चुनाव अगले एक-दो महीने मे हो जाएंगे और उसके बाद फिर सोनिया को पूर्णकालिक अध्यक्ष बना दिया जाएगा।

दिल्ली में दलबदलुओं का भाजपा प्रवेश थमा

दिल्ली में दलबदल करके भाजपा में शामिल होने के लिए चल रही होड अचानक थम गई है। एक-डेढ महीने पहले लगभग रोजाना ही किसी न किसी पार्टी का कोई नेता भाजपा में शामिल हो रहा था, लेकिन अब यह सिलसिला रुक गया है। असल में महाराष्ट्र और हरियाणा में दलबदल करके भाजपा की टिकट पर लडे नेताओं का हस्र देखने के बाद दूसरी पार्टियों खासकर कांग्रेस छोडने की सोच रहे नेता सावधान हुए हैं और साथ ही भाजपा नेताओ के विरोध को देखते हुए पार्टी ने भी भरती अभियान बंद कर दिया है। पिछले दिनों दिल्ली प्रदेश भाजपा में उम्मीदवार भरती अभियान चल रहा था। चूंकि भाजपा के लगभग सभी स्थानीय नेता चुनाव हारे हुए हैं, इसलिए उनकी सीटों पर नए दावेदार सामने आ रहे थे। कुछ सीटों पर आम आदमी पार्टी के वे विधायक भी भाजपा नेताओं के संपर्क में थे जिन्हें इस बार टिकट कटने की आशंका सता रही है। इससे नाराज पार्टी के पुराने नेताओं ने इसका सार्वजनिक विरोध किया और पार्टी आलाकमान तक शिकायत पहुंचाई। इसी बीच महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजे आ गए, जिनमें भाजपा के टिकट पर खडे हुए ज्यादातर दलबदलुओं को लोगो ने हरा दिया। इसीलिए उम्मीदवार भरती अभियान रुक गया है। अब सबकी नजर झारखंड के नतीजों पर है। उसके बाद ही दिल्ली में चुनाव प्रक्रिया तेज होगी।

अभी कम नहीं होंगी चिदंबरम की मुश्किलें

पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम की मुश्किलें अभी कम नहीं होने वाली हैं। केंद्र सरकार की जांच एजेसियां उनको किसी तरह से जेल से नहीं निकलने देना चाहतीं। इसीलिए वे उनकी जमानत की हर अर्जी का जोरदार विरोध कर रही हैं, जबकि उनसे पूछताछ पूरी हो गई है और सारे दस्तावेज एजेंसियों के पास हैं। इसके बावजूद एक अदालत उनको जमानत दे देती है तो दूसरी अदालत किसी जांच एजेंसी की आपत्ति पर उनको जमानत देने से इंकार कर देती है। अब सीबीआई एयर इंडिया के विमान खरीदने में हुई कथित गडबडियों के मामले में उनसे पूछताछ करना चाहती है। इस मामले में उस समय के विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल भी जांच के दायरे में हैं। चिदंबरम उस समय वित्त मंत्री थे। इस नाते सौदे में उनकी भी अहम भूमिका थी। खबर है कि सीबीआई ने सक्षम अदालत से चिदंबरम से पूछताछ की इजाजत मांगने का फैसला किया है। चूंकि वे जेल में बंद हैं, लिहाजा अदालत की अनुमति से ही उनसे पूछताछ हो सकती है। इस मामले में कार्रवाई आगे बढी तो चिदंबरम की मुश्किलें भी और बढेंगी। इसलिए उनकी कोशिश प्रवर्तन निदेशालय के मामले में जल्द से जल्द सुप्रीम कोर्ट से जमानत हासिल करने की होगी तो केंद्रीय एजेंसियों की कोशिश उनसे जल्द से जल्द विमानन मामले में पूछताछ करने की होगी।

संसद के इस सत्र में भी कुछ ‘बडा’ होगा

संसद के पिछले सत्र की तरह मौजूदा सत्र भी धमाकेदार साबित होगा। पिछली बार सरकार ने ऐन मौके पर संसद का कामकाज एक हफ्ते के लिए बढाया था। तब किसी को अंदाजा नहीं था कि सरकार इस सत्र में कश्मीर को लेकर बडी पहलकदमी करने वाली है। इस बार भी वैसा ही कुछ धमाका करने की तैयारी है। भाजपा के सभी सांसदों से कहा गया है कि वे एक दिसंबर के बाद दिल्ली में ही रहे। आमतौर पर संसद सत्र के दौरान सांसद सोमवार से शुक्रवार तक दिल्ली में रहते हैं और शुक्रवार की शाम को अपने क्षेत्र के लिए निकल जाते है। पिछले सत्र में सांसदों को शनिवार और रविवार को दिल्ली में रोकने के लिए भाजपा की एक कार्यशाला रख दी गई थी। इस बहाने सांसद तीन और चार अगस्त को दिल्ली में थे और पांच अगस्त को सोमवार की सुबह से ही सारे सांसद संसद में थे, जब सरकार ने कश्मीर के बारे में बड़ा ऐलान किया था। इस बार सांसदों को सीधे निर्देश दिया गया है कि वे दिल्ली न छोडे और संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही में मौजूद रहे। पार्टी के इस निर्देश के बाद अटकल लगाई जा रही है कि सरकार कोई बडा धमाका करने की तैयारी में है। जानकार सूत्रों का कहना है कि सरकार समान नागरिक संहिता बनाने पर भी विचार कर रही है। अगर इसका विधेयक तैयार हो गया तो सरकार सीधे उसे संसद मे पेश कर सकती है। चूंकि सरकार ने राज्यसभा में कामचलाऊ बहुमत का जुगाड कर लिया है, लिहाजा वह इस पर सहमति बनाने का प्रयास नहीं करेगी।

वापसी कर रही हैं वसुंधरा

राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जारी खटपट का सबसे ज्यादा मजा अभी तक भाजपा के लोग ही ले रहे थे। वे सत्ता के इन दो शीर्ष नेताओं की लडाई में खूब घी डालने का काम कर रहे थे। लेकिन राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता। अब आ रही खबरों के मुताबिक सूबे के भाजपा नेताओं में ही खलबली मची हुई है और वे अशोक गहलोत-सचिन पायलट को छोडकर अपनी-अपनी फिक्र में जुट गए हैं। संकेत मिल रहे हैं कि वसुंधरा राजे मुख्यधारा की राजनीति में लौट रही हैं। पिछले कुछ समय से राज्य में जिस तरह वसुंधरा विरोधी समझे जाने वाले नेताओं को आगे बढ़ाया जा रहा था, उससे संकेत मिल रहा था कि राज्य की राजनीति में वसुंधरा के दिन पूरे हो गए हैं। इसी संभावना से विरोधी तो खुश थे ही, उनके कई खास लोगों ने भी पाला बदल लिया था। अब जब ‘महारानी’ की मुख्यधारा में वापसी की संभावना बन रही है तो सूबे के भाजपा नेता हैरान खलबली मच गई है। रानी साहिबा के आते ही बहुत उलटफेर हो सकता है। जाहिर सी बात है, विरोधी तो विरोधी, पाला बदल चुके भूतपूर्व वफादार भी इन दिनों दिल्ली के संकेत समझने की कोशिश में हैं। यही वजह है कि गहलोत और पायलट को लेकर प्रदेश भाजपा तरफ से बयानबाजी थमी हुई है। गहलोत-सचिन भी सुकून की सांस ले रहे हैं। भाजपा की यह उठापटक अगर लंबी खिंच गई तो स्वाभाविक है कि कांग्रेस सरकार का सुकून भी लंबा खिंच जाएगा। उसे और चाहिए भी क्या!

चलते-चलते

अपने श्राप से ‘दुश्मन’ पुलिस अधिकारी के जीवन का अंत कर देने का दावा करने वाली सांसद प्रज्ञा ठाकुर रक्षा मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति की सदस्य हो गई है, लिहाजा अब तो चीन और पाकिस्तान की खैर नहीं! बस, अब आशंका इतनी ही है कि इस ‘अलौकिक वीरांगना’ के खिलाफ कोई विपक्षी नेता किसी मारक तांत्रिक क्रिया का सहारा न ले लें, क्योंकि बकौल प्रज्ञा ठाकुर, कुछ भाजपा नेता पिछले दिनों ऐसी तांत्रिक क्रियाओं के शिकार हो चुके हैं। हां, इतना तय है कि प्रधानमंत्री मोदी प्रज्ञा ठाकुर को मन से माफ नहीं करेंगे।

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