बीच-बीच में ऐसी खबरें आती रहती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम करने के तरीके से आरएसएस नाराज है।  इसके कुछ उदाहरण भी दिए जाते हैं। सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाने के बाद संघ ने भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के अपने प्रोजेक्ट को पूरा करने का नेत्त्व मोदी को सौंपा है और वह इस जिम्मेदारी को भलीभांति निभा रहे हैं। वह संघ के प्रचारक के रूप में ली गई शपथ के अनुसार ही काम कर रहे हैं। मालेगांव धमाके के आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को चुनाव मैदान में उतारने का भाजपा का फैसलेे को इसी प्र्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में देखना चाहिए। प्रधानमंत्री ने एक अंगे्रजी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में उसे साध्वी ही नहीं भारतीय संस्कृति का प्रतीक बताया है। यह भी चेतावनी दी है कि उसे आंतकवादी बताना महंगा पड़ेगा क्योंकि वह महान हिंदू संस्कृति की प्रतीक है। उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े़ राज्य के मुख्यमं.त्री के पद पर एक साधु को बिठा देने की बात संघ नब्बे के दशक में भी नहीं सोच सका था, जब राम मंदिर का आंदोलन अपने चरम पर था। मोदी के राज मंे ही यह संभव हो पाया है, इसे कौन नजरअंदाज कर सकता है?
 प्रधानमंत्री उसकी तुलना राहुल गांधी, सोनिया गांधी से कर रहे हैं जो नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं। मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा इस बार सैन्यवाद को हथियार बना कर मैदान में उतरी है ताकि सत्ता-विरोधी लहर को एक अलग दिशा में मोड़ा जा सके। केंद्र सराकर ने सार्वजनिक क्षेत्र के कई कारोबार नष्ट कर दिए ताकि अडानी और अंबानी को उन पर कब्जा दिला सके। एंयर इंडिया, रेलवे, एमटीएनएल, बीएसएनएल और डाक विभाग को इसने एक ऐसी नींद सुला दी है कि उन्हें जगाने में वर्षों लग जाएंगे। जिओ, पेटीएम जैसी कंपनियों को जबर्दस्त फायदा दिलाया। नोटबंदी के जरिए इसने असंगठित क्षेत्र के कारोबार को पूरी तरह खत्म कर दिया और खुदरा कारोबार में देशी-विदेशी कंपनियों को पैर जमाने के लिए जमीन बना दी है। किसानों की बदहाली और बेरोजगारी में पिछले सभी रिकार्ड तोड़ने के बाद मोदी सरकार के पास राष्ट्रीय सुरक्षा की छतरी तानने के अलावा कोई उपाय नहीं था। दुर्भाग्य यह है कि मीडिया के असहयोग के कारण देश को सुरक्षा देने में भाजपा की नाकामी को लोगों के समाने लाना विपक्ष के लिए संभव नहीं हो पाया। जिस राज में सबसे ज्यादा आतंकवादी हमले हुए और सबसे ज्यादा जवान तथा नागरिक मारे गए, वह यह दावा कर रहा है कि देश की सुरक्षा वही कर सकता है। पुलवामा जैसी आतंकी घटना कई सालों के बाद हुई है।
  भाजपा सरकार देश को देश की संवैधानिक संस्थाओं को नाकाम करने में काफी हद तक सफल रही है। इसकी शुरूआत उसने योजना आयोग के खात्मे से शुरू की। सीबीआई , सीवीसी,  ईडी से लेकर चुनाव आयोग-सभी को इसने विकलांग  बना दिया। भारत सरकार के हर मंत्रालय को पीएमओ ने अपने कब्जे मंे ले लिया।
यह पहली बार हुआ कि सरकार चलाने वालों ने एक ऐसे संगठन को अपने कामकाज का हिसाब पेश किया जो राजनीतिक पार्टी तो क्या कागज पर अपने को सांस्कृतिक संगठन बताता है। मोदी ने अपने राज में गुजरात काडर के उन अफसरों को ही नहीं बिठाया जो उनके इशारे पर काम करते थे, बल्ेिक  संघ से जुड़़े अफसरों को भी महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे।
इस जोड़ी को नागपुर का कितना संरक्षण मिला हुआ है, इसका अंदाजा इसी से होता है कि इसने एक-एक कर सारे पुराने नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन संघ ने कुछ नहीं कहा।
साध्वी का बीच चुनाव में उतरना एक ओर हिंदुत्व  ब्रिगेड के चुनाव हार जाने का भय दिखाता है और दूसरी ओर यह भी दिखाता है कि वह ध्रुवीकरण  की राजनीति को ही अंतिम उपाय मान रहा है। राष्ट्रवाद का जाप और कांगे्रस तथा विपक्ष को पाकिस्तान का एजेंट बता  देने भर से उसे अपना लक्ष्य पूरा होता नहीं दिखाई पड़ रहा है। उसे एक साफ मजहबी विभाजन की जरूरत महसूस हो रही है।
पिछले पांच सालों में, संघ के संगठनों ने गोरक्षा के नाम पर माब लिंचिंग,  राम मंदिर आंदोलन को फिर से ख़ड़ा करने और कुंभ जैसे मेले के राजनीतिक इस्तेमाल के कई प्रयोग किए, लेकिन उन्हें इसमें खास  सफलता नहीं  मिली। साध्वी उनके जखीरे का पुराना हथियार है। गुजरात में मोदी ने दंगाइयों को राजनीति में जगह दी थी, अब आतंकवादी हमले के आरोपी को उन्होंने मैदान में उतार दिया है। उनकी योद्धा इसे उचित ही धर्मयुद्ध बता रही है।
यह सिर्फ आक्रामक हिंदुत्व का एक उदाहरण नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के संघी माडल का प्रदर्शन है। इसे सिर्फ भोपाल की सीट जीतने और चुनाव के बाकी चरणों में पूरे भारत के स्तर पर धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की कोशिश नहीं समझना चाहिए, इसे देश की संवैधानिक ढांचे पर हो रहे प्रहार की एक कड़ी के रूप में देखना चाहिए ।  इसके बावजूद कि अदालत ने संगीन जुर्म का आरोप झेल रहे आरोपियों को चुनाव से दूर रखने की बात कही है, प्रज्ञा को उम्मीदवार बनाया गया। पांच साल के राज के बाद अपने कथित सुशासन के बदले सांप्रदायिक कार्ड खेलने का मतलब साफ है कि विकास  और भ्रष्टाचार-मुक्ति के नारे में  कोई संभावनहीं रह गई है।
साध्वी मध्य प्रदेश में वही भूमिका अदा करेगी जो उत्तर प्रदेश में योगी अदित्यनाथ निभा रहे हैं। यह है मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलना। सवाल उठता है कि क्या राम मंदिर और पाकिस्तान-कार्ड के फेल होने के बाद साध्वी कार्ड चल पाएगा?

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