प्रसिद्ध अर्थशास्त्री विवेक कौल, जिन्होंने “ईजी मनी ट्रायोलॉजी” लिखी है, ने अपने एक आलेख में भारतीय अर्थव्यवस्था की एक तस्वीर खींची है। यह तस्वीर उजली तो कतई नहीं है। हम इस तस्वीर को ‘डार्क’ न भी कहें तो भी ‘मटमैली’ तो कहना ही पड़ेगा! विवेक कौल की इस मटमैली तस्वीर के मुख्य बिंदु निम्नानुसार हैं :-

  1. अप्रेल से अगस्त 2018 के दौरान भारत का व्यापार घाटा 80.5 बिलियन डॉलर रहा। इस वित्त वर्ष में 136 बिलियन डॉलर का कुल निर्यात हुआ, पर आयात हुआ 216.5 बिलियन डॉलर का।
  2. देश में डॉलर चार प्रकार से आते हैं – (1) विदेशी निवेशक डॉलर लाते हैं। यह निवेश भी दो प्रकार से होता है – प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) तथा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (2) सेवाएं या सर्विस सेक्टर के माध्यम से आने वाला डॉलर (3) विदेशी पर्यटकों के माध्यम से आने वाला डॉलर तथा (4) रेमिटेंस यानी विदेशों में कार्यरत भारतीय अपने घरों में जो डॉलर भेजते हैं उसे रेमिटेंस कहते हैं।
  3. इस साल अप्रैल से जुलाई के बीच विदेशी निवेशक केवल 4.20 बिलियन डॉलर ही देश में लाये हैं। यह सन 2014 के बाद सबसे कम राशि है।
  4. सर्विस सेक्टर के माध्यम से इस वर्ष अप्रेल से जुलाई के बीच 25.90 बिलियन डॉलर देश में आया जो पिछले साल के मुकाबले सिर्फ 10 प्रतिशत अधिक है।
  5. इस साल अप्रैल से जून के बीच रेमिटेंस के जरिये देश में 17 बिलियन डॉलर आये जो पिछले साल के मुकाबले 18.40 प्रतिशत अधिक है।

लेकिन डॉलर के रूप में ये सब प्राप्तियां भी 80.50 बिलियन डॉलर के घाटे को पाटने के लिये पर्याप्त नहीं हैं।

  1. 1अप्रेल को रिजर्व बैंक का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 399 बिलियन डॉलर था जो कि अगस्त के अंत तक 376 बिलियन डॉलर ही रह गया है।
  2. भारत में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की जितनी खपत होती है, उसका 80 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात होता है। इस साल अप्रैल से अगस्त के बीच कच्चे तेल का औसत दाम करीब 72.90 डॉलर प्रति बैरल रहा है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में वह 49.60 डॉलर प्रति बैरल था।
  3. कच्चे तेल के अलावा भारत का गैर तेल आयात भी बढ़ रहा है और इससे भी डॉलर की मांग बढ़ रही है। इस वर्ष अप्रैल से अगस्त तक हमारा गैर तेल आयात 57.60 बिलियन डॉलर रहा। यह 2014-15 के बाद सबसे अधिक है। भारत कच्चे तेल के अलावा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रक्षा उत्पाद एवं हथियार तथा सोने का मुख्य रूप से आयात करता है।

इस वजह से तेल आयात पर हुआ खर्च अप्रैल से जुलाई के बीच 59 फीसदी बढ़कर 39.10 बिलियन डॉलर हो गया। विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने से रुपये का मूल्य गिर रहा है, क्योंकि ईरान को छोड़कर अन्य सभी देशों से भारत डॉलर में ही तेल का आयात करता है। अमेरिका के दबाव के आगे झुकने के बाद नवम्बर से भारत ईरान से तेल खरीदना बन्द कर देगा। तब तेल का सारा आयात डॉलर में ही करना पड़ेगा। जिस तरह तेल उत्पादक देश तेल के भाव बढ़ा रहे हैं, उसी अनुपात में डॉलर मजबूत होगा और रुपये का और अधिक अवमूल्यन होगा। यानी प्रकारांतर में व्यापार घाटा भी बढ़ेगा और उसी अनुपात में महंगाई भी बढ़ेगी।

पिछले कई सालों से भारत का निर्यात नहीं बढ़ रहा है। वर्ष 2011-12 में कुल निर्यात 306 बिलियन डॉलर था और 2017-18 में यह 303 बिलियन डॉलर ही रहा है। यानी निर्यात बढ़ने के बजाय घट रहा है। कच्चे तेल के अलावा भारत का गैर तेल आयात भी बढ़ रहा है और उससे भी डॉलर की मांग बढ़ रही है। इस वर्ष अप्रैल से अगस्त तक तेल आयात 57.60 बिलियन डॉलर रहा है जो कि 2014-15 के बाद सबसे अधिक है। जिस तरह विश्व बाजार में तेल के भाव बढ़ रहे हैं तेल आयात का बिल और अधिक बढ़ने की पूरी संभावना है।

विवेक कौल मौजूदा माहौल में डॉलर की आपूर्ति बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका यह मानते हैं कि सरकार को मल्टी ब्रांड फॉरेन रिटेलिंग में सौ फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति देना चाहिये। अधिकांश अर्थशास्त्रियों का सारा ध्यान व्यापार घाटे को कम करने पर ही रहता है, वे देश की बेरोजगारी की समस्या पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं। यदि मल्टीब्रांड रिटेल में 100 फीसदी निवेश को अनुमति दी जाएगी तो देश के छोटे रिटेलर दुकानदारों का धंधा बन्द हो जाएगा। इसके अलावा सभी छोटे उद्योग धंधे भी नष्ट हो जाएंगे। तब बढ़ती आबादी और रोजगार के संकट से कोई भी सरकार कैसे निपटेगी? इस पर भी अर्थशास्त्रियों को सोचना चाहिये और कोई अन्य वैकल्पिक मार्ग सुझाना चाहिये।

 

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