भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षशील पत्रकारों में गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम अग्रणी है। आजादी की क्रांतिकारी धारा का यह पैरोकार अपने धारदार लेखन से तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता से टकराते रहे और कई बार जेल तक भी गये। 26 अक्टूबर 1890 को इलाहाबाद में जन्में गणेश शंकर विद्यार्थी की कर्मस्थली कानपुर बनी। ‘प्रताप’ व‘ प्रभा’ जैसी पत्रिकाएं आजा़दी की मुखर प्रवक्ता थीं। उनका प्रेस क्रान्तिकारियों के छिपने की जगह था। कानपुर के मज़दूर आन्दोलन को आगे बढ़ाने में उनकी प्रमुख भूमिका थी।
वे साम्प्रदायिकता के खिलाफ सतत संघर्षरत रहे। भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव की शहादत के बाद जनभवनाओं को मोड़ने के लिए अंग्रेजो ने साम्प्रदायिक ताक़तो से मिलकर कानपुर को हिन्दू-मुस्लिम दंगे की आग में झोंक दिया।
इसी दंगे में निसहायों को बचाते हुए 25 मार्च 1931 को वे शहीद हो गये। दंगों की भेंट चढ़ने वाले वह संभवतः पहले पत्रकार थे।
आज जब पूरा देश एक भयावह धार्मिक उन्माद के आगोश में है, तब श्रद्धांजलि के तौर पर धर्मान्धता पर विद्यार्थी जी के विचार-
”इस समय, देश में धर्म की धूम है। उत्पात किये जाते हैं, तो धर्म और ईमान के नाम पर और जिद की जाती है, तो धर्म और ईमान के नाम पर। रमुआ पासी और बुद्धू मियाँ धर्म और ईमान को जानें, या न जानें, परंतु उसके नाम पर उबल पड़ते हैं और जान लेने और जान देने के लिए तैयार हो जाते हैं। देश के सभी शहरों का यही हाल है। उबल पड़ने वाले साधरण आदमी का इसमें केवल इतना ही दोष है कि वह कुछ भी नहीं समझता-बुझता और दूसरे लोग उसे जिधर जोत देते हैं उधर जुत जाता है।“
”अजाँ देने, शंख बजाने, नाक दाबने और नमाज पढ़ने का नाम धर्म नहीं है। शुद्धाचरण और सदाचार ही धर्म के स्पंष्ट, चिन्हन हैं। दो घंटे तक बैठकर पूजा कीजिए और पंच-वक्त नमाज भी अदा कीजिए, परंतु ईश्वर को इस प्रकार की रिश्वत के दे चुकने के पश्चात, यदि आप अपने को दिन-भर बेईमानी करने और दूसरों को तकलीफ पहुँचाने के लिए आजाद समझते हैं तो, इस धर्म को, अब आगे आने वाला समय कदापि नहीं टिकने देगा।“
(‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका से)

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