प्रसिद्ध चित्रकार कवि  हरिपाल त्यागी जी पिछले कुछ दिनों से रक्त कैंसर जैसी घातक बीमारी से जूझ रहे थे। दुर्भाग्य से आज शाम पांच बजे उनका निधन हो गया।  हरिपाल त्यागी जी मूल रूप से चित्रकार थे, पर उन्होंने बेहतरीन कविताएं भी लिखी हैं। करीब दो वर्ष पहले वे मीरा रोड ठाणे में ‘चिंतन दिशा’ के दफ्तर में आए थे। हम मित्रों से उनकी लम्बी बातचीत हुई थी। उस बातचीत में उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन व सांस्कृतिक कार्यों का विस्तार से जिक्र किया था।
 वे  करीब साठ के दशक में  उत्तर प्रदेश  के हिमालयी क्षेत्र (उत्तराखंड) में भूमिगत रहे और राजनीतिक गतिविधियों में शामिल रहे। इन दिनों उन्होंने काफी विकट परिस्थितियों का सामना किया। बाद में उन्हें लगने लगा कि इस तरह बड़े बदलाव को अंजाम नहीं दिया जा सकता , अस्तु वे लेखन की तरफ मुखातिब हुए। बुरुश और रंग उनका पैशन था । उन्होंने हिन्दी के सभी बड़े साहित्यकारों की पेंटिंग्स बनाईं हैं। जब हम चिंतन दिशा के साथी त्रिलोचन शास्त्री के शताब्दी वर्ष में उन पर पत्रिका का एकाग्र संपादित कर रहे थे , तो उनके अनन्य मित्र आदरणीय वाचस्पति जी ने आवरण पृष्ठ के लिए उनका एक तैलचित्र भेजा। जैसा कि विदित है हरिपाल त्यागी जी ने त्रिलोचन जी के विभिन्न मुद्राओं के कई चित्र बनाए हैं। मुक्तिबोध के स्केच और उनकी पेंटिंग भी उन्होंने बनाई थी, जो मुक्तिबोध शताब्दी वर्ष में कई पत्रिकाओं के कवर पृष्ठ की शोभा बनी। आदरणीय त्यागी जी बेहद विनम्र व संवेदनशील रचनाकार थे। कामरेडशिप उनमें कूट-कूट कर भरी थी। जब त्यागी जी की सुकन्या एक फैशन डिजाइनर के रूप में मुंबई आई तो हम सबके परम मित्र आदरणीय वाचस्पति जी ने फोन पर सूचना दी कि त्यागी जी के बेटी – दामाद इन दिनों मुंबई में हैं और अवसर मिलने पर अवश्य मिलें।
 जब मैंने उनके दामाद अनिल अत्री जी को फोन किया तो उन्होंने बताया कि त्यागी जी आए थे और तकरीबन दो महीने रहे और अब वापस दिल्ली लौट गए हैं, आगे जब वे कभी आएंगे तो हम उन्हें लेकर चिंतन दिशा अवश्य आएंगे। अगले वर्ष त्यागी पुनः मुंबई आए और अनिल अत्री जी ने उनके आने की सूचना दी। हम लोगों ने उनसे समय लिया और उनके सम्मान में गोष्ठी का आयोजन किया। त्यागी जी ने ‘चिंतन दिशा” के आवरण के लिए अपनी कई पेंटिंग्स हमें दीं और कहा ” जब भी जरूरत लगे इनका इस्तेमाल अवश्य करें। हम लोगों ने त्यागी जी के कई चित्र और स्केच चिंतन दिशा में छापे।
हरिपाल त्यागी एक प्रतिबद्ध रचनाकार थे। आज जहां लाखों में पेंटिंग्स बिक रही हैं और बेची जा रही हैं , वहीं भाऊ समर्थ और हरिपाल त्यागी ने देश की सभी लघु पत्रिकाओं के कलापक्ष को मजबूत किया और पाठकों में आधुनिक कला संस्कार भी विकसित किए ।  उन लघु-पत्रिकाओं को  आकर्षक बनाया। भयानक बीमारी से पीड़ित होने के बाद भी उन्होंने तूलिका , और रंग का साथ नहीं छोड़ा। अभी अप्रैल में उन्हें देखने आदरणीय वाचस्पति जी बनारस से दिल्ली गए थे और उन्होंने चित्र बनाते हुए उनका एक फोटो ग्राफ व्हाट्स ऐप पर पोस्ट किया था। त्यागी जी नागार्जुन, त्रिलोचन के अनन्य मित्र थे। उन्होंने इन दोनों महाकवियों के अनगिनत चित्र बनाए हैं। कविता , और साहित्य की अन्य विधाओं में उन्होंने विपुल व मूल्यवान लेखन किया है। देश – विदेश के श्रेष्ठ चित्रकारों पर उन्होंने बेहतरीन विश्लेषणात्मक लेख लिखें हैं।
 हरिपाल त्यागी जी सच्चे अर्थों में कर्म योगी थे। कला व साहित्य के प्रति  उनके जैसा समर्पण विरल है।   बाजार की व्यावसायिकता के लोभ- लाभ से वे पूरी तरह मुक्त थे।  वे सरल , मित्र वत्सल , पारदर्शी व निर्लोभी व्यक्तित्व के धनी थे। उच्च प्रतिभा के बाद भी उन्होंने कभी किसी पर रोब नहीं झाड़ा। वे नए से नए रचनाकारों को  भी भरपूर सम्मान देते थे। अपनी बात बिना लाग- लपेट के वे कहते थे। आलोचना करने में भी वे कभी झिझकते नहीं थे। उनके निधन से कला व साहित्य का एक कोना सदा- सदा के लिए सूना हो गया। हम जनवादी लेखक संघ, मुंबई के साथी उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।  साथ ही परिजनों को दुख सहन की शक्ति मिले , ऐसी कामना करते हैं। परिवार जनों के प्रति हम सबकी गहरी सहानुभूति है। पुनष्च हरिपाल त्यागी जी की स्मृति को प्रणाम।

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