रवीश कुमार को मैगसेसे पुरस्कार मिलने पर आई प्रतिक्रियाओं को देखकर लगता है कि इसे लेकर उन लोगों में भी नाराजगी है जो सरोकारवाली पत्रकारिता में विश्वास करते हैं। इनमें ऐसे लोग भी हैं जिनकी मंशा पर संदेह नहीं किया जा सकता। वे सेकुलरिज्म और लोकतंत्र में रवीश से कम यकीन नहीं करते और अपने छोटे-बड़े औजार के साथ मुस्तैदी से खड़े हैं। इन लोगों की राय में रवीश व्यक्तिवादी हैं और अपने को प्रोजेक्ट करते हैं। कई लोग रवीश को उसी कारपोरेट का हिस्सा मानते हैं जो सत्ता के सामने सिर झुका कर खड़ा है। दूसरी ओर, उनके समर्थन में खड़े लोग रवीश के बारे में बहस के पक्ष में नहीं हैं। लेकिन रवीश पर बहस होनी चाहिए क्योंकि वह विरोध की पत्रकारिता के एक स्थापित प्रतिनिधि बन चुके हैं। लेकिन इस बहस की शर्त यह होनी चाहिए कि उनकी प्रतिबद्धता पर संदेह न किया जाए। मीडिया की सनातन भूमिका विपक्ष में रहने की है। कठिन समय में रवीश या उनके जैसे कुछ और लोग इसे निभा रहे हैं, इसके लिए उनकी तारीफ होनी चाहिए। पूरा का पूरा मीडिया जब सत्ता पक्ष के प्रचार सेल की भूमिका निभा रहा हो, इन पत्रकारों की भूमिका उन्हें हीरो बना देती है तो इसमें उनका दोष नहीं है। वैसे भी टीवी का माध्यम आपको लोगों की नजर में जल्दी ले आता है। इसका फायदा उन्हें मिलेगा ही। रवीश या उनके सरीखे कुछ लोग इतना ज्यादा नजर में क्यों है? इसकी वजह साफ है। अभी के समय में उनके जैसे लोगों की संख्या गिनती की है। इनमें तो कई लोग तो ऐसे हैं जो नरेंद्र मोदी की पहली पारी में उनके पक्ष में थे या बच कर चल रहे थे। वे भी अगर विरोध करने वालों की कतार में शामिल हो गए हैं तो उनकी सराहना होनी चाहिए। उनके कमजोर समय या पहले फिसलन को लेकर उन्हें खारिज करना सही नहीं हैं। हां, उनके अवसरवाद पर जरूर नजर रखनी चाहिए।
आज से तीन दशक पहले यानि बाबरी मस्जिद को ढहाने के पहले किसी पत्रकार का सेकुलर और लोकतांत्रिक होना एक सामान्य बात थी। यह भी सामान्य था कि आप सत्ता के विरोधी हैं। सरकारों का रवैया अक्सर बचाव का ही होता था। आज की तरह प्रवक्ता या राजनीतिक aविश्लेषक के वेष में घूमने वाली सत्ता-पक्ष की लाठीधारी टोली नजर नहीं आती थी। टीवी चैनलों ने खांटी कार्यकर्ताओं को रातोंरात विशेषज्ञ बना दिया है। भाड़े पर चलने वाली यह टोली सोशल मीडिया पर सक्रिय रहती है। तीन दशक पहले, इसके लिए जगह नहीं थी। वैसे भी विरोध में खड़ा होना और संवैधानिक मूल्यों के साथ रहना ज्यादा सम्मानजनक होता था। उस समय तो संघ परिवार से जुड़े पत्रकार भी सेकुलर और लोकतांत्रिक बने घूमते थे। उस दौर की सबसे अहम बात यह थी कि मुख्यधारा की राजनीति से अलग प्रतिरोध की संगठित धाराएं थीं जो मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यो ंके लिए संघर्ष करती थीं। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। प्रतिरोध की संगठित धाराएं कमजोर हो चुकी हैं। राजनीति में विपक्ष खोखला है। ऐसे शून्य में अगर रवीश जैसे लोग खड़े होते हैं तो वे निश्चित तौर पर अलग से दिखाई देंगे और अलग से दिखाई देने के कारण उनका व्यक्तिवादी बन जाना स्वाभाविक है। वह खुद को दिखाएंगे और सीधे या ढंक कर यह जताएंगे कि पत्रकारिता में अकेले ही वही लोगों की आवाज बुलंद कर रहे हैं। जाहिर है कि मीडिया, राजनीति या दूसरी किसी भी जगह ऐसे व्यक्तिवाद से लक्ष्य को नुकसान पहुंचता है। व्यक्तिपूजा कहीं भी सही नहीं है। फिल्म या साहित्य में यह चल जाता है क्योंकि यहां मनोरंजन मुख्य होता है। लेकिन मीडिया या राजनीति में संगठित संघर्ष की जरूरत होती है। वैसे, इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ के अनुभवों को देखें तो यही लगता है कि संगठित पहल का लाभ मिलता है। इन संगठनों से जुड़़े लोगों ने बेहतरीन फिल्में दी और उत्कृष्ठ साहित्य दिया। ऐसे समय में जब मुख्यधारा की राजनीति में प्रतिरोध की शक्तियां कमजोर हो चुकी हैं और मानवाधिकार संगठन भी पहले की तरह असरदार नहीं रह गए हैं, मीडिया में प्रतिरोध की संगठित शक्ति की जरूरत है। यह काम सिर्फ प्रेस क्लब आफ इंडिया, प्रेस एसोसिएशन आफ इंडिया और एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया के जरिए नहीं हो सकता है। व्यक्तिवाद संगठित प्रतिरोध में बाधक है। इसका मतलब रवीश जैसे लोगों को खारिज कर दिया जाए? कतई नहीं। व्यक्तिवाद से लड़ने का एक ही उपाय है कि मीडिया में सरोकार की पत्रकारिता करने वालों को साथ लाया जाए और नौजवान पत्रकारों को मानवाधिकार तथा लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ा जाए। श्रमजीवि पत्रकार संगठनों के निष्क्रिय हो जाने के कारण पत्रकारों की नौकरी तथा उनकी सुरक्षा के लिए लड़ने वाले संगठन नहीं रह गए हैं। ऐसे संगठनों में नई जान फूंकने की जरूरत है।
लेकिन गौर से देखें तो प्रतिरोध का एक आंदोलन विकसित हो चुका है जो संगठित भले न हो, असरदार जरूर है। यह अखबारों, टीवी चैनलों, हर जगह सक्रिय है। सिद्धार्थ वरदाराजन, ओम थानवी, विनोद दुआ, निखिल वागले, उर्मिलेश, आरफा खानम, हरतोष सिंह बाल, राजेश प्रियदर्शी तथा जयशंकर गुप्त जैसे लोग लगातार लगे हैं। मुख्यधारा मीडिया से अलग रह कर कुमार प्रशांत जैसे लोग डटकर खड़े हैं। सोशल मीडिया पर तो देश भर में इतने लोग सत्ता-प्रतिष्ठान के भाड़े के सिपाहियों से लड़ रहे हैं कि उनकी गिनती संभव नहीं है। इनमें जाबिर हुसैन, अरूण माहेश्वरी-सरला माहेश्वरी, कैलाश मनहर, नूर मुहम्मद नूर, अनवर शमीम जैसे लोगों ने तो हर उपलब्ध विधा को अपना हथियार बना रखा है। इस आंदोलन में ललित सुरजन, सुनील तांबे जैसे अनुभवी पत्रकार हैं तो गिरीश मालवीय, हेमंत मालवीय, प्रणव प्रियदर्शी, धनंजय कुमार, साध्वी मीनू जैन, हेमंत कुमार झा, संतोष कुमार झा और अनिल जैन जैसे अपेक्षाकृत युवा भी। इनमें बिलक्षण रविदास, अनिल प्रकाश, विश्वंभर चौधरी, सौरभ वाजपेयी, रामशरण, डा योगेंद्र, चारूल जोशी जैसे सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। ये नाम सिर्फ उदाहरण के लिण् लिए गए हैं। फेहरिश्त लंबी है और लोग इसमें कोई भी नाम जोड़ लें। जरूरत है इस आंदोलन में शिरकत की। सामूहिक
संघर्ष ही व्यक्तिवाद का विकल्प है।

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