रमणिका गुप्ता को विनम्र श्रद्धांजलि। आदिवासियों के साहित्य को भारत के शेष समाज के  सामने लाने व उनके संघर्षपूर्ण जीवन से रुबरू कराने का उन्होंने स्तुत्य कार्य किया। आदिवासी समाज को उनका जीवन  समर्पित था। रमणिका जी में  अदम्य साहस था। उन्होंने अपने  जीवन के किसी पक्ष को छिपाया नहीं। उनकी पत्रिका *युद्ध रत आम आदमी* को हम सब नब्बे के दशक से पढ़ते रहे हैं। पहले ट्रेड यूनियन की गतिविधियों व मज़दूरों की समस्याओं को उनकी पत्रिका प्रमुखता से स्पेस देती थी। उन दिनों वे धनबाद में कोयला मज़दूरों के बीच काम करतीं थीं।
 सन्1995 के बाद वे आदिवासी जीवन व उनके संघर्षों की तरफ प्रवृत्त हुईं।  उन्होंने अपने नाम से एक फाउंडेशन बनाया। इस फाउंडेशन ने आदिवासियों के साहित्य, उनकी परंपराओं , जंगल और ज़मीन के संघर्षों, भाषाई विविधता व समानता आदि का हर दृष्टि से गंभीर अध्ययन प्रस्तुत किया। मुंबई में दो बार उनके साथ संवाद करने का अवसर मिला। वे सहज व सरल स्वभाव की थीं, पर विचार, दृष्टिकोण में उनकी दृढ़ता सर्वोपरि थी। वे कई सालों तक सीपीएम की सक्रिय कार्यकर्ता थीं और  झारखंड विशेष कर धनबाद इकाई  का सफल नेतृत्व किया।
  उन्होंने सामाजिक सौहार्द को सुदृढ़ करने वाले साहित्य व उसके सर्जक को सम्मान देने का भी स्तुत्य कार्य किया। पिछले वर्ष मुंबई के प्रतिष्ठित कथाकार जनाब सलाम बिन रज्जाक को यह सम्मान मिला। रमणिका जी अपने लेखन में बेहद मुखर (बोल्ड) थीं।
वे सामंतीय शुचिता की प्रबल विरोधी थीं।  उनकी आत्मकथा  ने तथाकथित नारीवादी लेखन की चूलें हिला दीं । रमणिका जी ने कभी दोहरा जीवन नहीं जिया। उनका  जीवन समाज को समर्पित था। उनकी निजता उनके सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों में विलीन हो गई थी। पिछले कई वर्षों से वे एकनिष्ठ हो कर  आदिवासी समाज के लिए काम कर रही थीं। उन्होंने देश के हर आदिवासी समाज के साहित्य को हिन्दी, अंग्रेजी और उनकी बोली-भाषा में लाने का महान कार्य किया। पूर्वोत्तर भारत की जन-जातियों के साहित्य को हमने पहली बार मुकम्मल तरीके से उनके यहां ही पढ़ा।
 हम हिंदी को राष्ट्रभाषा का गौरव ज़रुर  देते हैं , पर , उसे सच्चे अर्थों में राष्ट्र भाषा बनाने व समृद्ध करने के लिए कुछ नहीं करते। रमणिका जी नेआदिवासी साहित्य को हिन्दी में ला कर सच्चे अर्थों में हिंदी को एक राष्ट्र भाषा बनाने  व उसे पुष्ट करने का श्रेष्ठ कार्य किया  और उसके राष्ट्र भाषा होने के दायित्व को भी पूरा किया। उनका यह कार्य किसी  अकादमी से कम नहीं है। रमणिका जी एक व्यक्ति होते हुए भी कई संस्थाओं जितना कार्य किया। हम उनके बहुआयामी व्यक्तित्व व कार्य को सलाम करते हैं।

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