देश की राजनीति में झाबुआ हमेशा ही केंद्र बिंदू रहा है! जो भी पार्टी सत्ता में रही, उसने आदिवासी उत्थान के नाम पर झाबुआ को ही प्रयोगशाला बनाया और योजनाएं चलाई! आजादी के बाद से कांग्रेस ने इस आदिवासी इलाके को अपने हिसाब से पाला-पोसा! लेकिन, करीब एक दशक में झाबुआ की राजनीति की धारा में काफी बदलाव आया! भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने काफी मेहनत से जमीन तैयार की है। नतीजा ये रहा कि जहाँ के आदिवासी मतदाता सिर्फ ‘पंजे’ को ही राजनीति का निशान समझते थे, उन्होंने ‘कमल’ को भी पहचानना शुरू कर दिया! लेकिन, इसके लिए भाजपा को कांग्रेस में ही सेंध लगाना पड़ी! दिलीपसिंह भूरिया ने ही भाजपा को लोकसभा में पहली जीत दिलाई थी! लेकिन, धीरे-धीरे राजनीतिक हालात बदले और कांग्रेस को भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा! 2013 का विधानसभा और 2014 का लोकसभा चुनाव इस नजरिए से महत्वपूर्ण माना जाएगा, जब भाजपा को अच्छी सफलता मिली! लेकिन, इस बार फिर आदिवासी मतदाता का मानस बदला दिखाई दिया!
  ये उपचुनाव सिर्फ उम्मीदवार और पार्टी की हार-जीत ही तय नहीं करेगा, बल्कि इससे प्रदेश की राजनीति और मतदाताओं का मिजाज भी स्पष्ट होगा! सिर्फ पाँच महीने में जिस तरह मध्यप्रदेश में राजनीति की धारा बदली है, वो क्या दिशा थी! इस बात का अंदाजा भी इस उपचुनाव से हो जाएगा! विधानसभा में भाजपा का पिछड़ना और कांग्रेस का जीतना क्या महज संयोग था या आंकड़ों की उलझन से कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका मिल गया? लेकिन, कुछ ही महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने फिर बाजी मार ली! ये वो बदलाव है, जिसने राजनीतिक के जानकारों को भी हतप्रभ कर दिया! वे समझ नहीं सके कि क्या देश का मतदाता प्रदेश और देश की राजनीति को इतनी गंभीरता से समझने लगा है कि एक पार्टी के हाथ में सारे सूत्र देकर उसे बेलगाम होने देना नहीं चाहता! झाबुआ का उपचुनाव ऐसी बहुत सी गफलत का जवाब देगा! यदि यहाँ से कांग्रेस जीती तो ये उसके लिए संजीवनी बूटी होगी! लेकिन, यदि बाजी फिर भाजपा के हाथ लगी, तो उसे कमलनाथ सरकार को अस्थिर करने का नया मौका मिल जाएगा! साथ ही ये संदेश भी जाएगा कि मतदाता भाजपा से नाराज नहीं थे, पर शिवराज सरकार की वापसी उन्हें मंजूर नहीं थी! सवाल तो कई हैं, पर जवाब एक ही कि झाबुआ से कौन जीतेगा? हो भी जीतेगा, वो चुनाव के साथ-साथ मतदाता और राजनीति का मिजाज भी बताएगा!
   झाबुआ में आने वाले 6 महीने कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए मुश्किल वाले होंगे! क्योंकि, झाबुआ विधानसभा सीट के लिए होने वाला उपचुनाव दोनों पार्टियों के लिए एक तरह लिटमस टेस्ट होगा! इस चुनाव का नतीजा जिसके पक्ष में रहेगा, उसके अपने अलग मंतव्य होंगे! यही कारण है कि दोनों पार्टियां चुनाव तक झाबुआ में पूरे दमखम से अपनी ताकत दिखाएंगी। कांग्रेस के लिए ये उपचुनाव प्रदेश की सरकार बनाए रखने और अपनी जमीनी पकड़ साबित करने का मौका होगा! अभी तक ये सीट भाजपा के पास थी, इसलिए इस पार्टी की पूरी कोशिश होगी कि इसे बरक़रार रखा जाए! भाजपा 2018 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के बागी जेवियर मेढ़ा के कारण जीती थी, इसमें शक नहीं! कांग्रेस उम्मीदवार विक्रांत भूरिया के सामने जेवियर के निर्दलीय खड़े होने से कांग्रेस हार गई थी! अब भाजपा को इस धारणा को बदलना होगा कि वो ये चुनाव बगावत को बढ़ावा देने की तिकड़म से नहीं, बल्कि जनसमर्थन से जीते थे। यहाँ से भाजपा ने गुमानसिंह डामोर पहले विधानसभा और फिर लोकसभा का चुनाव लड़वाया और वे दोनों ही चुनाव जीत गए! ऐसे में यहाँ एक उपचुनाव होना तय ही था!
   भाजपा संगठन ने 12 दिन के असमंजस के बाद अंततः तय कर लिया कि गुमानसिंह डामोर को विधानसभा से इस्तीफ़ा दिलाकर लोकसभा में रहने दिया जाए! उन्हें इस्तीफ़ा दिलवा भी दिया गया है। किसी व्यक्ति के दो सदनों में चुने जाने पर एक सदन को छोड़ना स्वाभाविक परंपरा है। यदि कोई दो सदनों के लिए चुना जाता है, तो उसे 14 दिन में किसी एक पद को छोड़ना पड़ता है। इससे भाजपा को ये नुकसान हुआ कि विधानसभा में आंकड़ों की खींचतान में वो कदम पीछे आ गई! अब उसके सदस्यों की संख्या 108 रह गई! अगर सदन में विश्वास मत हांसिल करने का मौका आया, तो मुकाबला 229 विधायकों के बीच होगा। ऐसे में कांग्रेस अपने 115 विधायकों के साथ ही विश्वास साबित कर सकती है। इस स्थिति को देखते हुए लग रहा है कि अब झाबुआ उपचुनाव का नतीजा आने के बाद ही कमलनाथ सरकार के रहने या गिरने पर बात चलेगी! यदि झाबुआ उपचुनाव कांग्रेस जीतती है, तो इससे सरकार की ताकत बढ़ जाएगी। लेकिन, यदि ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस को सदन में विश्वास जीतने के लिए ज्यादा जोर लगाना पड़ेगा।
  झाबुआ को कांग्रेस का परंपरागत इलाका माना जाता है। यहाँ से विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनाव में कांग्रेस का डंका बजता रहा! लेकिन, 2013 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनाव में यहाँ पांसा पलट गया था। लोकसभा चुनाव में भाजपा के दिलीपसिंह भूरिया ने कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया को पटखनी दे दी थी। लेकिन, सालभर में ही दिलीपसिंह का निधन होने से ये सीट खाली हो गई और यहाँ उपचुनाव हुए जिसमें कांतिलाल भूरिया फिर सांसद बन गए! जबकि, उस उपचुनाव में प्रदेश की पूर्व भाजपा सरकार ने अपना पूरा दम लगा दिया था। अभी भी झाबुआ सीट पर होने वाला विधानसभा जीतना भाजपा के लिए बहुत आसान नहीं कहा जा सकता! क्योंकि, प्रदेश में कांग्रेस सरकार होने का भी कांग्रेस उम्मीदवार को फ़ायदा मिलेगा! उससे बड़ी बात ये कि भाजपा इस सीट  बहुत ज्यादा विकल्प नहीं हैं। लेकिन, पार्टी यहाँ तोड़फोड़ करने की जुगत में है! संभव है कि चुनाव से पहले कुछ कांग्रेसियों का दिल बदल जाए!

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