राजनाथ सिंह की मुश्किल

जब पूरे देश में नागरिकता कानून और एनआरसी को लेकर विरोध बढता ही जा रहा है तो गृहमंत्री के रूप में राजनाथ सिंह के कार्यकाल की खूब चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि राजनाथ सिंह का राजनीतिक कौशल ही था कि 2016 में नागरिकता संशोधन विधेयक को बतौर गृहमंत्री उन्होंने लोकसभा में बिना किसी हल्ले-गुल्ले के पारित करा लिया था। हालांकि बाद में राज्यसभा में यह पास नही हो सका, जिसकी वजह से इस साल फिर से पास कराना पड़ा है। तब उसमें भी यही सारे प्रावधान थे, लेकिन उन्होंने धार्मिकता वाला रंग नहीं आने दिया था। इसीलिए कहीं इस तरह का आक्रोश देखने को नहीं मिला था, जैसा कि इस बार दिख रहा है। सोशल मीडिया के जरिए कहा जा रहा है कि राजनाथ ने गृह मंत्री के रूप में देश में अनावश्यक विवाद पैदा करने वाले मुद्दे नहीं उठने दिए, लेकिन अमित शाह के गृहमंत्री बनने के बाद विवादित मुद्दों की जैसे बाढ आ गई है। राजनाथ सिंह की मुश्किल यह है कि वे यह समझ नहीं पा रहे कि यह धारणा उनके लिए ‘पॉजिटिव’ है या ‘नेगेटिव।’ सियासी गलियारों में शुरू से माना जा रहा है कि 2014 के बाद से पार्टी के अंदर उनके लिए सब कुछ सहज नहीं रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि पार्टी गृह मंत्रालय के जरिए कुछ बडा कराना चाहती थी। इसी वजह से उन्हें हटाकर अमित शाह को लाया गया। अब अगर अमित शाह के मुकाबले उनके कार्यकाल की तारीफ होती है तो पार्टी के भीतर उनके लिए अच्छा संदेश नहीं जाएगा।

मुख्यमंत्रियों के हारने का सिलसिला

झारखंड में मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्रियों के चुनाव हारने का सिलसिला पुराना है, जो इस बार भी नही टूटा। इस बार मुख्यमंत्री रघुबर दास अपनी पारंपरिक जमशेदपुर पूर्वी सीट पर भारी अंतर से चुनाव हार गए। इस सीट से वे पांच बार विधायक रहे हैं। पिछली बार उनकी जीत का अंतर 70 हजार वोट का था। पिछले चुनाव में इस इलाके में ही अपनी पारंपरिक खरसांवा सीट से पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा चुनाव हार गए थे। अर्जुन मुंडा पूर्व में उसी सीट से चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने थे। पिछली बार मुख्यमंत्री के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन भी दुमका सीट से विधानसभा का चुनाव हार गए थे। उनको पहले से अपनी हार का अंदाजा था, इसलिए वे दो सीटो से लडे थे। राजमहल की बरहेट सीट से वे चुनाव जीत गए थे। इस बार भी इसी वजह से वे दो सीटो से लडे थे। गौरतलब है कि उनके पिता और पृथक झारखंड आंदोलन प्रणेता शिबू सोरेन भी मुख्यमंत्री रहते उपचुनाव हार गए थे और उनको पद से इस्तीफा देना पडा था। मधु कोडा इकलौते पूर्व मुख्यमंत्री हैं, जो विधानसभा का चुनाव नहीं हारे हैं। हालांकि वे एक बार लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं। इस बार उन्हें चुनाव लड़ने की मंजूरी नहीं मिली थी।

उद्धव ठाकरे की परीक्षा

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे किसी तरह से ऐसे मुद्दों पर से ध्यान हटाना चाहते हैं, जिन पर उनके अपनी सहयोगी पार्टियों- कांग्रेस और एनसीपी से मतभेद हैं। सांप्रदायिक, धार्मिक और राष्ट्रवाद से जुडे कई मुद्दे हैं, जिन पर तीनों पार्टियों की एक राय नहीं है। जैसे नागरिकता कानून का ही मुद्दा है। उद्धव ठाकरे ने बहुत मुश्किल से संतुलन बनाया। लोकसभा में विरोध किया और राज्यसभा में वाकआउट करके अपनी जान बचाई। इसी तरह सावरकर पर दिए राहुल गांधी के बयान पर भी उद्धव ठाकरे की पार्टी ने जैसे तैसे संतुलन बनाया। ऐसे सारे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए मुख्यमंत्री ने किसानों की कर्ज माफी का ऐलान किया। अब जल्द ही वे मंत्रिमंडल का विस्तार भी करेंगे। मगर उनकी परीक्षा खत्म होने वाली नहीं है। अब नागरिकता कानून लागू करने या नहीं करने का मुद्दा सामने आ गया है। एनसीपी नेता शरद पवार ने कहा है कि दूसरी विपक्षी राज्य सरकारों की तरह महाराष्ट्र को भी इसे लागू करने से इनकार कर देना चाहिए। उद्धव के लिए ऐसा करना मुश्किल होगा। इस बीच खबर है कि भाजपा मुंबई के एक नामी शिक्षण संस्थान का नाम सावरकर के नाम पर करने की मांग करने वाली है। नागरिकता का मुद्दा ठंडा पड़ते ही भाजपा इसकी मांग करेगी। इस पर भी उद्धव ठाकरे के लिए बडी मुश्किल होगी। उन्हें अहसास है कि वे कांग्रेस के साथ के साथ रहते ऐसा नहीं कर पाएंगे। मगर भाजपा तो उनको इस धर्मसंकट में फंसाएगी ही।

मायावती की परेशानी

नागरिकता कानून और एनआरसी को लेकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की परेशानी दूसरी विपक्षी पार्टियों से बिल्कुल अलग तरह की है। इस मुद्दे पर जारी आंदोलन के जरिए भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर का जिस तरह उभार हो रहा है, वह बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए चुनौती है। मायावती जिस सियासी समीकरण (दलित-मुस्लिम) के जरिए अपनी ताकत वापस हासिल करना चाहती है, चंद्रशेखर इसी समीकरण के जरिए अब अपनी राजनीतिक पार्टी लॉन्च करना चाहते हैं। दलित और मुस्लिम नौजवानों में वे पहले से ही खासे लोकप्रिय हैं और पिछले दिनों एनआरसी के मुद्दे पर उन्होंने दिल्ली में जो सक्रियता दिखाई, उससे उनकी साख और बढ गई है। ये सब ऐसे वक्त हो रहा है जब बसपा अपने जनाधार के छिटकने के खतरे से जूझ रही है। ऐसे में ‘बहनजी’ यानी मायावती का चंद्रशेखर की सक्रियता और लोकप्रियता को लेकर परेशान होना स्वाभाविक है। खबर है कि मायावती जल्द ही पार्टी नेताओ के साथ बैठक कर चंद्रशेखर की चुनौती से निबटने की रणनीति तैयार करने वाली है। देखना दिलचस्प होगा कि ‘बहनजी’ चंद्गशेखर की कैसी काट ढूंढती है और वह कितनी कारगर होती है।

‘आप’ और कांग्रेस के साथ आने की चर्चा

महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव नतीजों से कांग्रेस को अहसास हो गया है कि जिन राज्यों में उसकी जमीन कमजोर हो गई है, वहां ‘छोटा भाई’ बन कर राजनीति करना फायदे का सौदा हो सकता है। झारखंड विधानसभा चुनाव के बाद दिल्ली में यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या कांग्रेस को आम आदमी पार्टी (आप) के साथ मिल कर चुनाव लडना चाहिए। कांग्रेस में कई नेता ऐसा चाहते हैं। इस बीच राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि उनकी पार्टी दिल्ली में कांग्रेस के साथ मिल कर लडेगी। राजद का कांग्रेस के साथ मिल कर लडने का ऐलान और जनता दल (यू) का अकेले लडने का फैसला भाजपा के लिए फायदेमंद हो सकता है। इससे प्रवासी और अल्पसंख्यक वोटों का बंटवारा होगा, जो ‘आप’ का मुख्य आधार है। इसीलिए कांग्रेस के नेता कोई नया गठबंधन बना कर वोटों का बंटवारा करने की बजाय ‘आप’ की मदद करने के बारे में सोच रहे हैं। कांग्रेस में कई नेताओं का कहना है कि पार्टी को लोकसभा चुनाव पर फोकस करना चाहिए। इस बार लोकसभा चुनाव में दिल्ली में कांग्रेस पांच सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी। जाहिर है कि दिल्ली में जो अल्पसंख्यक मतदाता ‘आप’ के साथ है वह लोकसभा में कांग्रेस के साथ था। अगर दोनों पार्टियों में इस बात पर सहमति बनती है कि लोकसभा में कांग्रेस ज्यादा सीटें लडे और विधानसभा मे ‘आप’ को ज्यादा सीटें मिले तो दोनों में समझौता हो सकता है।

रिजर्व फॉर अजित पवार

रसूख हो तो अजित पवार जैसा! अब देखिए न, महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार की भूमिका भले ही अभी तय नहीं हो पा रही हो, लेकिन उनके लिए सरकारी बंगला जरूर ‘रिजर्व’ हो गया है। दरअसल मुंबई में मुख्यमंत्री के सरकारी आवास ‘वर्षा’ के बाद जिस सरकारी बंगले को सबसे ज्यादा भव्य माना जाता है वह है- ‘देवगिरी’। यह वहां के बेहद महंगे इलाके ‘मलाबार हिल’ पर है और लंबे समय तक यह अजित पवार के पास ही रहा। यह वह दौर था जब अजित पवार महाराष्ट्र की एनसीपी-कांग्रेस की साझा सरकार में मंत्री हुआ करते थे। 2014 में जब राज्य मे भाजपा-शिवसेना की सरकार बनी तो अजित पवार को यह बंगला छोडना पड़ा था। अब 2019 में जब शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी की साझा सरकार बनी तो मंत्रियों के बीच ‘देवगिरी’ को अपने-अपने नाम आबंटित कराने की होड मच गई। सबने अपने-अपने स्तर से संबंधित विभाग को फोन लगाए। लेकिन जवाब था- ‘सर, यह बंगला आपको नहीं मिल सकता।’ मगर क्यों? ‘सर, आप तो जानते ही है कि यह बंगला अजित साहब को बेहद पसंद है। पता नहीं उनकी वापसी कितने महत्वपूर्ण पद पर हो। तब हमसे यह सवाल होगा, जब पता था कि यह बंगला अजित पवार को पसंद था, तब किसी और को कैसे आवंटित हुआ? इस वजह से इस बंगले को हम लोगों ने रिजर्व में डाल दिया है।’ इस तरह अजित पवार के रसूख की वजह से ‘देवगिरी’ में रहने का सपना तमाम दूसरे मंत्रियों के लिए सपना ही बना हुआ है।

चलते-चलते

झारखंड के चुनाव को लेकर एग्जिट पोल के अनुमान बता रहे थे विधानसभा त्रिशंकु रहेगी और भाजपा सबसे बडी पार्टी के रूप में उभरेगी। मतगणना के दौरान टीवी चैनलों पर भाजपा के प्रवक्ता भी कह भी रहे थे कि सबसे बडे दल के रूप में राज्यपाल की ओर से सरकार बनाने का न्योता भाजपा को ही दिया जाएगा। लेकिन दोपहर बाद साफ हो गया कि महाराष्ट्र के घटनाक्रम से सबक लेते हुए झारखंड के मतदाताओं ने राष्ट्रपति और सूबे की राज्यपाल को इस कडाके की सर्दी में आधी रात तक जागने या तडके नींद से उठने की तकलीफ नहीं दी है।

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