देश जब गुलाम था और अंग्रेज शासक थे तब उन्होंने देशभक्तों की आवाज को दबाने के लिये सन 1860 में यह कानून बनाया था। दस साल बाद सन 1870 में इस को भारतीय दंड संहिता में धारा 124ए के रूप में शामिल किया गया। इस कानून का उपयोग बाल गंगाधर तिलक के विरुद्ध तथा उसके बाद महात्मा गांधी के विरुद्ध किया गया था जब उन्होंने अंग्रेज सरकार के अत्याचारों के विरुद्ध एक लेख लिखा था। तब गांधीजी ने कहा था, “सेक्शन 124-A जिसके अंतर्गत मुझ पर आरोप लगा है, राजनीतिक वर्गों के बीच नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिये रचे गए भारतीय दंड संहिता के कानूनों का राजकुमार है।”

आजादी के बाद इस औपनिवेशिक गुलामी के प्रतीक कानून को समाप्त हो जाना चाहिये था, लेकिन अंग्रेजों की बनाई हुई नौकरशाही में तो शासन करने की प्रवृत्ति घर कर चुकी थी। नौकरशाही नहीं चाहती थी कि इस कानून को समाप्त किया जाए। अतः उसने तत्कालीन कांग्रेसी सरकार को समझा लिया कि इस काले कानून का बना रहना कितना जरूरी है।

बाद में आने वाली सभी सरकारों ने इस काले कानून को बनाए रखा। नक्सलवादियों के विरुद्ध इस कानून का उपयोग किया गया और चारु मजूमदार, कनु सान्याल तथा उनके अन्य साथियों को आजन्म कारावास की सजा इसी कानून के तहत दी गयी थी।

धीरे-धीरे यह कानून आने वाली सरकारों के लिये एक रक्षा कवच बन गया। जब भी किसी विरोधी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता, लेखक या कलाकार ने उनके विरुद्ध कुछ बोला, लिखा या कोई कार्टून इत्यादि बनाया तो उस पर भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए लगा कर उसे जेल में बन्द कर दिया गया। इस कानून के दुरुपयोग की सबसे ताजा घटनाएं गुजरात के पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नायक हार्दिक पटेल पर तथा जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के विरुद्ध इस कानून का इस्तेमाल किया जाना है।

कोई भी अलोकतांत्रिक सरकार, भले ही वह वोट के माध्यम से चुनी गई हो, लेकिन जिसके संचालकों की विचारधारा और मानसिकता फासिस्ट सोच से अनुप्राणित होती है, वह इस कानून को कभी भी समाप्त नहीं करना चाहेगी; क्योंकि यह कानून उन्हें अपने विरोधियों के दमन की शक्ति प्रदान करता है। अर्थात यह काला कानून अलोकतांत्रिक सरकारों के हाथ में वह हथियार है जिसका दुरुपयोग कर वह विरोध की आवाजों को नष्ट करने की शक्ति हांसिल करती है।

इसी कारण जब राहुल गांधी ने इस कानून को समाप्त करने की बात कही तो हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके थिंक टैंक अरुण जेटली को सबसे अधिक तकलीफ हुई। प्रधानमंत्री अपनी चुनावी सभाओं और रैलियों में पानी पी-पी कर कांग्रेस को कोस रहे हैं कि वह अफ्सपा और इस काले कानून को हटा कर सेना और देश को कमजोर करना चाहती है। अरुण जेटली तो एक कदम आगे बढ़ कर बेसिर पैर का दावा कर रहे हैं कि कांग्रेस घोषणापत्र के अहम बिंदुओं को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ (यह भाजपा और गोदी मीडिया द्वारा ईजाद किया हुआ स्लोगन है) में मौजूद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दोस्तों ने तैयार किया है।

मोदी और जेटली का यह रुदन इस बात को भी शिद्दत से एक बार फिर रेखांकित करता है कि आजादी की लडाई में उनके राजनीतिक और वैचारिक पुरखों तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोई भागीदारी नहीं थी और वे उस समय स्वाधीनता सेनानियों के खिलाफ अंग्रेजों के मददगार बने हुए थे। यही नहीं, कांग्रेस को कोसने के चक्कर में मोदी और जेटली देशद्रोह और राजद्रोह के बीच का फर्क भी नहीं समझ पा रहे हैं और दोनों का एक ही अर्थ लगा रहे हैं। मोदी ऐसा करे तो समझ में आता है क्योंकि उनकी पढाई-लिखाई औसत स्तर की है लेकिन जेटली तो काफी पढे-लिखे और बडे वकील माने जाते हैं मगर वे भी देश की जनता को मूर्ख मानकर देशद्रोह और राजद्रोह को समानार्थी बता रहे हैं।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि कांग्रेस पार्टी आजादी के बाद से अब तक चली आ रही एक भूल को सुधार कर देश को एक वास्तविक लोकतन्त्र बनाना चाहती है जबकि दूसरी ओर वर्तमान सत्ताधारी पार्टी और उसका शीर्ष नेतृत्व इस काले कानून को बनाये रख कर देश में फासिस्ट विचारधारा को मजबूती प्रदान करना चाहता है। अब यह देश की जनता को निर्धारित करना है कि वह खुली हवा में सांस लेना चाहती है और सभी प्रकार के विचारों का सतत एवं अबाध प्रवाह चाहती है या एक बन्द समाज के दमघोंटू वातावरण में जीने के लिये अभिशप्त होना चाहती है?

 

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