सवाल यह है कि ‘न्यूनतम आय’ जैसी योजनाओं के मौलिक उद्देश्य क्या हैं? क्या इनके केंद्र में मनुष्य हैं? या कि बाजार?
भारत के विशेष संदर्भ में यह सवाल और जरूरी हो जाता है।

बाजार के लिये जरूरी है कि उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ती रहे, उनकी क्रय शक्ति बढ़ती रहे। लेकिन, बाजार की प्रवृत्तियों में जो अमानुषिक तत्व हैं वे पूंजी को असीमित शक्ति प्रदान करते हैं कि वह श्रम का अधिकाधिक दोहन और शोषण करे। यहीं पर सरकारों की भूमिका शुरू होती है कि वह उचित कानून और सक्षम नियामक तंत्र बना कर बाजार की मनमानियों पर रोक लगाए और श्रमिक अधिकारों की रक्षा करे।

जिस देश और समाज में श्रमिक आबादी की संख्या अधिक है वहां यह शोषण चरम पर पहुंचता है और श्रम का मूल्य इतना भी नहीं दिया जाता कि कोई दिहाड़ी पर मजदूरी करके अपने परिवार की मौलिक जरूरतों को पूरी कर सके। भारत में ऐसे श्रमिकों की ही बड़ी संख्या है। फिर, काम-रोजगार की उपलब्धता का संकट भी है।

भारत के उभरते बाजार के सामने संकट यह है कि उसकी उत्पादन क्षमता लगातार बढ़ रही है, बाजार उपभोक्ता सामग्रियों से अटे पड़े हैं लेकिन उस अनुपात में खरीदारों का अभाव है। अंतिम पंक्ति की बड़ी आबादी तो बाजार से बाकायदा बाहर ही है।

बीते दो-ढाई दशकों में सत्ता-संरचना में कारपोरेट के बढ़ते प्रभाव ने आर्थिक नीतियों को उनके हितों के अनुरूप बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। नतीजा में उनकी समृद्धि में बीते वर्षों में बेहिंसाब इज़ाफ़ा हुआ है, जबकि आधी से अधिक आबादी विकास के लाभों से वंचित होती गई है। अभी पिछले वर्ष की ही ऑक्सफेम की रिपोर्ट ने बताया कि बीते वर्ष में देश की कुल आमदनी का 73 प्रतिशत ऊपर के मात्र एक प्रतिशत धनी लोगों की जेब में गया। जाहिर है, निर्धन आबादी की आमदनी ही जब अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं बढ़ी तो उनकी क्रयशक्ति में इज़ाफ़ा होने का सवाल ही नहीं।

बाजार में घबराहट है। तमाम ऑफर्स की बौछारों के बावजूद बाजार में गति नहीं आ रही। कस्बाई और ग्रामीण बाजारों की हालत तो बेहद खराब है। तीन चौथाई आबादी को विकास की मुख्यधारा से बाहर कर देने वाली कारपोरेट परस्त आर्थिक नीतियों के दुष्परिणाम इस रूप में सामने आ रहे हैं कि बाजारवाद के दौर में बाजार ही संकट में है।

रोजगारों का सृजन, श्रमिकों के हितों की सुरक्षा और उन्हें बेहतर मजदूरी दिलाने आदि के मामले में सरकारें विफल रही हैं। बीते वर्षों में भारत की विकास दर बेहतर रही है लेकिन विशेषज्ञ इसे ‘जॉबलेस ग्रोथ’ की संज्ञा से नवाज़ रहे हैं। यानी, देश की अर्थव्यवस्था का तो विस्तार होता गया लेकिन उस अनुपात में न रोजगार मिले न निर्धनता कम हुई। ग्रामीण और कस्बाई बाजारों में चमक आए तो कैसे…?

अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग न्यूनतम आय की गारंटी का पक्षधर होकर सामने आया है। राहुल गांधी के सौजन्य से भारत के राजनीतिक विमर्श में भी यह मुद्दा शामिल हुआ है।अच्छी बात है। निर्धनों के एकाउंट में कुछ पैसे आएंगे और बाजार को भी कुछ राहत मिलेगी।

लेकिन, कितनों के खाते में पैसे डाले जा सकेंगे? भारत में अभी भी अपरंपार गरीबी है। रोजगारों के सृजन में विफलता ने हालात विस्फोटक बना दिये हैं और विकास की कारपोरेट केंद्रित अवधारणाओं ने निर्धनों का अधिक भला नहीं किया है। सरकारी शिक्षा और चिकित्सा की बदहाली ने उनकी जिंदगियों को और अधिक कठिन बना रही है।

लेकिन, सरकारी स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक परिवहन की बेहतरी के मुद्दे विमर्श के दायरों से ही बाहर कर दिए गए हैं।

यानी, सरकारें इतना करने के लिये तैयार हो सकती हैं कि निर्धनों के खाते में नकदी जमा करवा दें ताकि न्यूनतम पोषण उन्हें मिलता रहे, वे कुछ पैसे बाजार में भी खर्च कर सकें ताकि बाजार को भी थोड़ा सहारा मिलता रहे। न्यूनतम पोषण मिलेगा तो निर्धनों के बच्चे मरियल नहीं, कुछ बेहतर स्वास्थ्य के साथ बड़े होंगे ताकि स्वस्थ और सक्षम श्रमिकों की आपूर्त्ति होती रहे।

लेकिन… सरकारी अस्पतालों के बड़े पैमाने पर निर्माण, उनके बेहतर संचालत पर ध्यान देने के बदले निर्धनों को सरकारी हेल्थ बीमा का लॉलीपॉप थमाया जाएगा। कुछ गम्भीर बीमारियों में हेल्थ बीमा निर्धनों के लिये सहारा हो सकता है, लेकिन आवश्यक संसाधनों से युक्त सरकारी अस्पतालों का कोई विकल्प नहीं हो सकता।

अगर मनुष्य के बारे में सोचा जाए, निर्धनों के बारे में सोचा जाए तो सार्वजनिक शिक्षा, चिकित्सा और परिवहन के तंत्र को बेहतर करने पर व्यवस्था का दिमाग और संसाधन खर्च होगा, नीतियां ऐसी बनेंगी कि अंतिम पंक्ति के लोगों को उनके आर्थिक-सामाजिक अधिकार मिलेंगे।
रोजगारों के निरन्तर सृजन और वाजिब मजदूरी का विकल्प कुछ और नहीं हो सकता। कम्पनियों को न्यूनतम पारिश्रमिक कानून के दायरे में लाना होगा, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करनी होगी।

वरना, क्या ऐसा नहीं लगता कि न्यूनतम आय की गारंटी आदि की बातें मनुष्य के लिये कम, बाजार की चिंता से अधिक प्रेरित हैं?
वैसे, अगर जमीन पर उतर सकी तो भारत में इस योजना का स्वागत है…क्योंकि अंतिम पंक्ति के निर्धनों की आर्थिक बदहाली सामाजिक अराजकताओं को ही आमंत्रित करती है।
लेकिन तब भी…सवाल अपनी जगह कायम रहेंगे क्योंकि शिक्षा का, इलाज का, रोजगार के अधिकार का कोई विकल्प नहीं हो सकता और….वास्तविक कल्याण भी इन्हीं अधिकारों की प्राप्ति में निहित है।

(फेसबुक से साभार!)

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