राहुल के अहंकार ने जगन मोहन को बिदका दिया

लगता है लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हुई ऐतिहासिक दुर्गत से राहुल गांधी अभी सबक लेने को तैयार नहीं हैं या फिर वे कांग्रेस की बची-खुची संभावनाओं भी खत्म करना चाहते हैं। बताया जा रहा है कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस में वापसी करना चाहते थे, लेकिन राहुल की बदमिजाजी या यूं कहें कि बचकाना रवैये के चलते उन्होंने अपना इरादा बदल दिया। बताते हैं कि जगन मोहन के परिवार के दूसरे सदस्य खासकर उनकी मां विजयालक्ष्मी रेड्डी चाहती थीं कि परिवार की घर वापसी हो जाए। उन्हीं के दबाव मे जगन मोहन ने पिछले दिनों कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं के माध्यम से राहुल गांधी से मुलाकात की। काफी जद्दोजहद के बाद राहुल जगन मोहन से मिलने को राजी हुए। जब जगन उनसे मिलने गए तो उन्हें करीब एक घंटे तक इंतजार करना पडा। यह भी बताया जा रहा है कि जब राहुल उनसे मिलने आए तो हालचाल पूछने की बजाय सबसे पहले यह पूछा कि मुकदमों का क्या हाल है। यह एक तरह का तंज था। गौरतलब है कि जगन मोहन और उनके परिवार के खिलाफ जितने भी मुकदमे चल रहे हैं वे सारे कांग्रेस सरकार के कराए हुए हैं। इसीलिए जब राहुल ने जगन से मुकदमों का हाल पूछा तो बताया जा रहा है कि वे असहज हो गए। मौजूदा दौर में मुकदमेबाजी से बचने के लिए जब दूसरे कांग्रेसी पार्टी से किनारा करते जा रहे हैं, तब जगन मोहन ने कांग्रेस में ओर लौटने की हिम्मत दिखाकर बडी जोखिम उठाई थी। मगर राहुल के अहंकारी रवैए से मामला बिगड गया।

अखिलेश की खुशी का राज

उत्तर प्रदेश में हमीरपुर विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में भाजपा के मुकाबले सपा और बसपा को हार का सामना करना पडा है। लेकिन जितनी खुशी भाजपा को अपनी जीत की नहीं है, उससे ज्यादा खुशी सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को हार जाने के बावजूद हो रही है। दरअसल सपा को यह सीट जीतने का भरोसा था भी नहीं। वह तो इस चुनाव के जरिए मुख्य विपक्षी दल के रू प में अपनी वापसी करना चाहती थी, जो बसपा के तीसरे नंबर पर रहने से हो गई। 2०19 लोकसभा चुनाव के नतीजों में बसपा से पिछड जाने के बाद सपा नेतृत्व अवसाद और सवालों के घेरे में था। दरअसल 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा ही भाजपा के खिलाफ मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में दिखी थी। 2019 में सपा-बसपा के बीच गठबंधन हुआ, जिसमें सपा घाटे में रही। बसपा ने सपा से दो गुनी सीटें जीत ली और गठबंधन खत्म करने का ऐलान भी कर दिया। बसपा अपने को मुख्य विपक्षी दल मानकर चल रही थी। उधर सपा के लिए मुख्य विपक्षी दल के पायदान से हट जाना किसी बडे झटके से कम नहीं था। इस धारणा को गलत साबित करने के लिए उसे मौके की तलाश थी। हमीरपुर उपचुनाव में उसे यह मौका मिल गया। अब सपा को यह कहने का मौका मिल गया कि बसपा को लोकसभा चुनाव में जो बढत मिली थी, वह उसकी वजह से थी।

आनंदीबेन की सक्रियता

किसी राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके व्यक्ति के लिए पद से हटने के बाद यह स्वीकार कर पाना काफी मुश्किल होता है कि अब वह मुख्यमंत्री नहीं है। गुजरात की मुख्यमंत्री रहीं आनंदीबेन पटेल के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। पिछले दिनों उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया, लेकिन वे अपने को राजभवन तक सीमित नहीं रखना चाहतीं। इससे पहले मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ की राज्यपाल रहते हुए भी वे खूब सक्रिय रहीं, दौरे किए और यहां तक कि अपने भाषणों में जनता से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ मजबूत करने की अपील भी की। उत्तर प्रदेश में भी वे जिलों के दौरे कर रही हैं। अफसरों के साथ बैठक कर योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर निर्देश भी रही हैं। किसी भी मुख्यमंत्री को किसी राज्यपाल का सक्रिय होना कभी भी रास नहीं आता। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी राज्यपाल की सक्रियता से बहुत खुश नहीं हैं, लेकिन उनकी मुश्किल यह है कि इस बारे में वे अपनी असहमति व्यक्त कैसे करे और किसके सामने करे। आनंदीबेन गुजरात की मुख्यमंत्री रही हैं और उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के बेहद करीबी नेताओं में गिना जाता है। यही वजह है कि उनके सामने योगी को मजबूरी में खुश दिखना पडता है। योगी खुद अपनी सरकार के अब तक के कार्यकाल का एक प्रेजेंटेशन दे चुके हैं।

प्रियंका को खरोंच से बचाने की कोशिश

कांग्रेस की बडी मुश्किलों में से एक है- शीर्ष नेतृत्व की छवि को बचाए रखना। ताजा मामला प्रियंका गांधी का है। वे उत्तर प्रदेश की प्रभारी हैं। उनकी सक्रियता को देखते हुए एक कयास यह भी लगाया जा रहा है कि राज्य में पार्टी उन्हें योगी के खिलाफ मजबूत चेहरे के तौर पर स्थापित करना चाहती है। तस्वीर का दूसरा रुख यह है कि राज्य में इस महीने के तीसरे हफ्ते में 11 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव होने हैं। अभी पिछले हफ्ते एक सीट के लिए चुनाव हुआ, जिसमें कांग्रेस चौथे नंबर पर रही। जिन 11 सीटों के लिए उपचुनाव होने हैं, वहां भी कांग्रेस की स्थिति कमोबेश ऐसी ही रहना संभावित है। पार्टी के अंदर जो रणनीति बनी है, उसके तहत प्रियंका इन उपचुनावों से पूरी तरह दूर रहेगी ताकि खराब प्रदर्शन के लिए उन्हें जिम्मेदार न ठहराया जा सके। पार्टी के कुछ नेता दबी जुबान से कह रहे है कि पार्टी को अगर उत्तर प्रदेश में ट्रैक पर लाना है तो अतिरिक्त जोखिम लेना ही होगा। प्रियंका प्रभारी हैं तो उनका चुनाव अभियान से दूर रहना इसलिए तर्कसंगत नही होगा, क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भाजपा उम्मीदवारों के लिए अभी से मैदान में उतर चुके हैं। अखिलेश और मायावती भी अपने-अपने उम्मीदवारों के लिए कमर कसते दिखाई पड रहे हैं। अगर कांग्रेस नेतृत्व सेफ गेम ही खेलते रहना चाहता है तो फिर आगे उसे किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

बिहार में सुशील मोदी का विकल्प!

पिछले दिनों बिहार में भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल को बनाया गया। उनकी नियुक्ति चौंकाने वाली इस लिहाज से रही कि यादव-कुर्मी-दलित-भूमिहार और मुस्लिम प्रभुत्व की राजनीति वाले राज्य में वैश्य समुदाय के नेता को अध्यक्ष वैश्य क्यों बनाया गया? एक वजह यह सामने आई कि पार्टी लीडरशिप राज्य में सुशील मोदी से खुश नहीं हैं और उनका विकल्प तैयार करने के मकसद से संजय जायसवाल को लाया गया है। यह भी कहा गया कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि संघ की है। अब एक और वजह भी चर्चा में आई है। कहा जा रहा है कि जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, तो यूपीए सरकार ने गुजरात को दी जाने वाली सोलर प्लांट परियोजना की सब्सिडी को रोक दिया था। जायसवाल उस वक्त लोकसभा मे थे, जहां इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाकर वे मोदी के प्रिय पात्रों में दर्ज हो गए थे। अब जबकि भाजपा बिहार में मजबूत स्थिति मे आ चुकी है और उसके अकेले चुनाव लडने की संभावनाओं पर पर विचार हो रहा है, तो इस मौके पर जायसवाल को कमान सौंपना तमाम संभावनाओं को जन्म दे रहा है। जिन-जिन राज्यों में भाजपा अकेले दम पर सत्ता मे आई है, वहां मुख्यमंत्री पद किसी नए मोदी के चहेते चेहरे को ही सौंपा गया है। यानी कुल मिलाकर संजय जायसवाल की स्थिति तुरुप के पत्ते वाली है।

संबित पात्रा की ग्रह दशा ठीक नहीं

भाजपा के सबसे चर्चित प्रवक्ता संबित पात्रा की राजनीतिक ग्रह दशा लगातार खराब चल रही है। राज्यसभा में जाने की तमाम कोशिशें नाकाम हो जाने के बाद लोकसभा चुनाव में पार्टी की उम्मीदवारी हासिल हुई लेकिन मोदी लहर के बावजूद हार गए। उनके साथ के या बाद के प्रवक्ता जीवीएल नरसिंहराव, अनिल बलूनी आदि पहले ही राज्यसभा में पहुंच चुके हैं। पार्टी के कई राज्यसभा सदस्य लोकसभा में पहुंच गए तो राज्यसभा में उनकी खाली सीटों पर संबित ने नजरें गडाई। उम्मीद थी कि पार्टी नेतृत्व कहीं न कहीं से उन्हें राज्यसभा में पहुंचा देगा। लेकिन पार्टी नेतृत्व ने कोई भाव नहीं दिए। अरुण जेटली के निधन से उत्तर प्रदेश की एक सीट खाली हुई तो उस पर अब राजनाथ सिंह के करीबी समझे जाने वाले सुधांशु त्रिपाठी को उम्मीदवार बना दिया गया है, जिनका निर्वाचित होना तय है। हालांकि त्रिपाठी का नाम पहले भी एक बार तय हो गया था लेकिन ऐन वक्त पर जेटली का नाम तय होने वे राज्यसभा में जाने से रह गए थे। राम जेठमलानी के निधन से बिहार की भी एक सीट खाली हुई है, जिस पर पूर्व सांसद सतीश दुबे को उम्मीदवार बना दिया गया है। कुल मिलाकर संबित पात्रा के भाग्य में अभी इंतजार करना ही लिखा है। इसी बीच टीवी पर कांग्रेस की ओर से बतौर प्रवक्ता अवतरित हुए गौरव वल्लभ से उनकी हो रही भिंडत भी खूब चर्चित हो रही है। हर भिंडत में गौरव वल्लभ उन पर सवा सेर साबित हो रहे हैं, जिससे पार्टी में संबित का ग्राफ गिर रहा है।

चलते-चलते

दिल्ली में लवकुश रामलीला समिति के तत्वावधान में आयोजित रामलीला में केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने अगस्त्य ऋषि की और दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी ने परशुराम की भूमिका निभाई। कई लोग हैरानी जता रहे हैं कि हेमामालिनी और स्मृति ईरानी जैसी पेशेवर एक्ट्रेस को मौका क्यों नहीं दिया गया, जबकि रामायण में कई सकारात्मक और नकारात्मक महिला पात्रों की भूमिका निभाने में दोनों ही नेत्रियां सक्षम हैं।

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