लोकसभा में वित्त मंत्री ने वित्त वर्ष 2018-19 में प्रत्यक्ष कर वृद्धि के जो आंकड़े प्रस्तुत किये हैं उसका श्रेय उन्होंने नोटबन्दी को दिया है, जो कि पूरी तरह भ्रामक हैं। अर्थशास्त्री ही नहीं कोई सामान्य व्यक्ति भी यह जानता है कि विगत वर्ष की तुलना में आगामी वर्ष में करों में सामान्य वृद्धि दर 15 से 18 प्रतिशत रहती आई है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जब वर्ष 2018-19 का बजट लोकसभा में पेश किया था तब उन्होंने बहुत लम्बे-चौड़े वायदे करते हुए कर वृद्धि का लक्ष्य 20 प्रतिशत रखा था, जिसे बाद में संशोधित कर 19.76 प्रतिशत कर दिया गया था। अब जब वित्त वर्ष समाप्ति पर है और अधिकांश एडवांस टैक्स की राशि जमा हो चुकी है तब संशोधित लक्ष्य को हासिल करना भी दिवास्वप्न बना हुआ है।

प्रधानमन्त्री मोदी ने 8 नवम्बर 2016 को रात के 8 बजे नोटबन्दी का एलान कर पूरे देश को सकते में डाल दिया था। तब भी यानी वित्त वर्ष 2016-17 में प्रत्यक्ष कर, जिसमें कार्पोरेट टैक्स और व्यक्तिगत आय कर शामिल होता है, में 8.50 लाख करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ था जो कि विगत वर्ष (2015-16) की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक था। हम सब जानते हैं कि नोटबन्दी के कारण वित्त वर्ष 2015-16 की अंतिम तिमाही में देश के उद्योग-धंधे और व्यवसाय जगत की रीढ़ टूट गयी थी। वित्त वर्ष 2017-18 भी नोटबन्दी के कहर से मुक्त नहीं हो पाया था और संगठित तथा असंगठित क्षेत्र की लाखों नौकरियां चली गयी थीं, उसके बावजूद उस वित्त वर्ष में भी प्रत्यक्ष कर के रूप में 10.02 लाख करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ था जो कि विगत वर्ष की तुलना में 18 प्रतिशत अधिक था।

इस वित्त वर्ष का संशोधित लक्ष्य 12 लाख करोड़ तथा वृद्धि दर 19.76 प्रतिशत रखी गयी थी जो अब हासिल होना सम्भव नहीं है। वित्त मंत्री ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि इस वर्ष प्रत्यक्ष कर में वृद्धि 18 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो कि विगत वर्ष के बराबर ही है। तो वे अपनी उपलब्धि किसे कह रहे हैं? वित्त मंत्री ने लोकसभा को यह बताने का कष्ट नहीं किया कि इस वर्ष विदेशी निवेश की दर पिछले चार सालों में सबसे कम रही है। इस वर्ष सिर्फ 1.5 लाख करोड़ रुपये का ही विदेशी संस्थागत निवेश भारत आया है, जबकि उसकी तुलना में बहुत अधिक धन भारत से बाहर भी चला गया है। यानी आने और जाने वाले धन की यदि तुलना की जाए तो विदेशी निवेश की वृद्धि दर माइनस में ही है।

इसी वजह से देश में नौकरियों का संकट खड़ा हो गया है और बेरोजगारी की दर दहाई के आंकड़े को छूने के लिये बेसब्र हो रही है। जब निवेश ही नहीं आएगा, इन्वेस्टमेंट ही नहीं होगा तो संगठित और असंगठित क्षेत्र में नोकरियां आएंगी कहां से? जहां तक शासकीय विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र का सवाल है, वहां भी हजारों पद खाली पड़े हैं जिन्हें भरने के सार्वजनिक क्षेत्र, केंद्र और राज्य सरकारों ने कोई गम्भीर प्रयास नहीं किये हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जहां कुछ नौकरियों के लिये विज्ञापन जारी भी किये गए तो उनमें ’13 पॉइन्ट रोस्टर’ जारी कर SC-ST और OBC के अधिकारों को हड़पने का षडयंत्र किया गया है।

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