नमामि गंगे की क्या समीक्षा की प्रधानमंत्री ने?

नमामि गंगे परियोजना पूरी करने की डेडलाइन अगले साल की है। केंद्र सरकार की ओर से 2020 तक इस परियोजना के तहत गंगा को पूरी तरह से साफ करने का वादा किया गया था। पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद नमामि गंगे परियोजना की समीक्षा के लिए कानपुर गए थे। सवाल है कि प्रधानमंत्री ने क्या समीक्षा की? यह परियोजना कहां तक पहुंची, गंगा कितनी साफ हुई और कब तक यह परियोजना पूरी हो जाएगी, इस बारे में कोई खबर नहीं आई। किसी अखबार या टीवी चैनल में यह नहीं बताया गया है कि आखिर प्रधानमंत्री ने क्या समीक्षा की? लेकिन निजी तौर पर इस परियोजना की समीक्षा करने वालों का मानना है कि इस परियोजना का दस फीसदी काम भी अभी तक पूरा नहीं हुआ है। जहां प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री समीक्षा करने के लिए बैठे थे, उस शहर कानपुर में भी अनेक नाले अब भी गंगा मे गिरते हैं। शहरों के कचरा निपटान और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं होने की वजह से गंगा के किनारे बसे शहरों का पूरा कचरा और नालियां गंगा में ही जाती है। गंगा की सफाई की सौगंध लेकर मंत्री बनीं उमा भारती काफी पहले इस मंत्रालय से विदा हो चुकी है। चूंकि गंगा की सफाई की कोई समग्र या व्यापक योजना नहीं है, इसलिए नए मंत्री के तहत भी काम मंथर गति से ही चल रहा है।

प्रणब बाबू के बदलते सुर

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के सुरों में अचानक बदलाव आया है। राष्ट्रपति रहते हुए और पद से हटने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उनका सद्भाव समय-समय पर जाहिर होता रहा है। मोदी भी मौके-मौके पर उनकी तारीफ करते रहते हैं। पर पिछले एक हफ्ते से मुखर्जी के सुर बदले हुए हैं। वे सरकार के बहुमत से लेकर कामकाज और मीडिया के रवैए पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने कम से कम दो कार्यक्रमों में ऐसे ही भाषण दिए हैं। पहले वे आरएसएस और भाजपा के समर्थक संगठन इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन के कार्यक्रम में गए थे, जहां उन्होंने सरकार को नसीहत देते हुए कहा कि उसे उन लोगों को भी साथ लेकर चलना चाहिए, जिन्होंने उसे वोट नहीं दिया हो। नागरिकता कानून और एनआरसी को लेकर अल्पसंख्यकों की चिंताओं को देखते हुए उनका यह बयान अहम है। प्रणब मुखर्जी ने यह भी कहा कि भारत में कभी भी किसी भी सरकार को जनता का पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है। भले सीटों का बहुमत मिल जाए पर यह संभव नहीं है कि देश के मतदाताओं का बहुमत सरकार को मिले। ध्यान रहे भाजपा के पास 303 सीटें हैं, मगर वोट उसे 36 फीसदी ही मिले हैं। बहरहाल, दूसरा कार्यक्रम एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का था, जिसमें प्रणब मुखर्जी ने साफ शब्दों में कहा कि देश के मीडिया में अभी सब कुछ ठीक नहीं है। गौरतलब है कि देश का मीडिया इस समय वही दिखा रहा है, जो सरकार चाह रही है। इसीलिए उनके इस बयान को भी बहुत बारीकी से देखा जा रहा है।

कांग्रेस में इतनी ताकत है कहां?

भाजपा के नेता कमाल कर रहे हैं। नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ हो रहे देशव्यापी प्रदर्शन के लिए प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से लेकर तमाम छोटे-बडे नेता कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कह रहे है कि कांग्रेस ही लोगों को गुमराह कर रही है। लेकिन सवाल है कि क्या वाकई कांग्रेस में ऐसा करने की क्षमता है? वह तो अपने बारे में लोगों को गुमराह किए जाने वाले आरोपों का जवाब भी नहीं दे पाती है तो वह देश को गुमराह कैसे करेगी? गुलाम नबी आजाद भी यही कह रहे हैं कि अगर कांग्रेस के पास इतनी क्षमता होती तो वह चुनाव नहीं हारती और सरकार बना लेती। असल में नागरिकता कानून के खिलाफ चल रहे आंदोलन में कांग्रेस तो कहीं है ही नहीं। असम में असमिया संगठनों के छात्र-युवा आंदोलन कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी खुद आंदोलन का नेतृत्व कर रही हैं। तमिलनाडु में सत्तारूढ द्रमुक ने आंदोलन का नेतृत्व किया है तो दिल्ली में बुद्धिजीवियों, लेखकों और विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र संगठनों ने कमान संभाली है। कांग्रेस तो ले-देकर एक केरल में आंदोलन कर रही है और वह भी वामपंथी दलों के साथ मिल कर। पर समूचे विपक्ष की ओर से कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराना भाजपा के लिए राजनीतिक फायदे का सौदा है। भाजपा का लक्ष्य इस कानून के विरोध को हिंदू बनाम मुस्लिम बनाना है और किसी तरह से लोगों के मन में यह धारणा बैठाए रखने का है कि कांग्रेस मुस्लिमपरस्त पार्टी है। अभी यह काम और जरूरी है क्योंकि कांग्रेस ने महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिल कर सरकार बनाई है।

मास्टर स्ट्रोक के चक्कर में कैच आउट

भाजपा और उसकी केंद्र सरकार एक बार फिर अपने मास्टर स्ट्रोक फैसले पर होने वाली प्रतिक्रिया का सटीक आकलन नहीं कर पाई। इससे पहले सरकार को नोटबंदी पर होने वाली प्रतिक्रिया का अंदाजा भी नहीं हो पाया था और वह जीएसटी के असर का भी आकलन नहीं कर पाई थी। उसी तरह नागरिकता कानून पर भी सरकार यह अंदाजा नहीं लगा पाई कि देश भर में इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी। पूर्वोत्तर के राज्यों में इसका विरोध होगा, यह अंदाजा भाजपा और सरकार को था। मगर असम के मंत्री और नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस के प्रमुख हिमंता बिस्वा सरमा ने भरोसा दिलाया था कि ज्यादा चिंता की बात नहीं है। इसीलिए सरकार ने आनन-फानन में यह बिल पास करा दिया। उसके बाद पूर्वोत्तर सहित पूरे देश में इस पर जैसी प्रतिक्रिया हुई उससे सरकार परेशान हुई। इस परेशानी से उबरने के लिए ही राहुल गांधी के ‘रेप इन इंडिया’ वाले बयान को तूल देने का फैसला किया गया। भाजपा के जानकार नेताओं का कहना है कि सब कुछ रणनीति के तहत हुआ। राजनाथ सिंह को भी इस रणनीति में शामिल किया गया ताकि राहुल को ज्यादा प्रभावी तरीके से घेरा जा सके। राजनाथ सिंह जैसे संजीदा नेता भी तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने के इस अभियान का हिस्सा बने और यहां तक कहा कि ऐसे बयान देने वाले नेता के लिए सदन में जगह नही है। असल में सरकार इसके जरिए बहस को भटकाना चाहती थी। पर उसको कामयाबी नहीं मिली।

दलबदलुओं की परेशानी

महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव से पहले कई पार्टियों के नेता अपनी-अपनी पार्टी छोडकर भाजपा में शामिल हो गए थे। अब इन सारे नेताओं की मुश्किलें शुरू हो गई हैं। महाराष्ट्र में तो भाजपा के पुराने नेताओं ने खुल कर इन नेताओं का विरोध शुरू कर दिया है। महाराष्ट्र में भाजपा के बडे नेता राम कदम ने खुल कर कांग्रेस के राधाकृष्ण विखे पाटिल का विरोध किया है। पाटिल कांग्रेस विधायक दल के नेता थे पर ऐन चुनाव से पहले कांग्रेस छोडकर अपने बेटे के साथ भाजपा मे चले गए थे। अब भाजपा नेताओं का कहना है कि पार्टी को अहमदनगर के इलाके में उनकी वजह से हार झेलनी पड़ी। इसी तरह और भी कई नेता कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना छोडकर भाजपा मे शामिल हुए थे। अब इन तीनों पार्टियों ने मिलकर सरकार बना ली है तो इन्हें छोडकर भाजपा में गए नेता परेशान हो गए है। भाजपा में उन पर हमले हो रहे हैं, लिहाजा वे अब अपनी पुरानी पार्टी में वापसी करना चाहते है। अगले कुछ दिन में भाजपा में गए नेताओं की घर वापसी शुरू हो सकती है। इसी तरह झारखंड में भी कांग्रेस, जेएमएम के कई नेता भाजपा में गए हैं, पर नतीजों से पहले ही उनके बेचैनी शुरू हो गई है। वे वापसी का रास्ता बनाने में लगे हैं।

बॉलीवुड ने इस बार चुप्पी तोडी

देश के फिल्मी सितारे हमेशा राजनीतिक रूप से सुविधाजनक जगह पर खडे रहने का प्रयास करते हैं। वे आमतौर पर सरकार के खिलाफ नहीं बोलते हैं। बॉलीवुड से उलट अमेरिका के हॉलीवुड में फिल्मी सितारे खुल कर राजनीतिक विचारों का का इजहार करते हैं। जैसे डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही वहां के सारे बडे सितारे उनके विरोध में हैं। भारत में पिछले कुछ समय से कम बजट की सार्थक और सामाजिक सोद्देश्यता वाली फिल्में करने वाले कुछ सितारो ने सत्तारूढ पार्टी और सरकार के खिलाफ बोलना शुरू किया। पर इनकी संख्या गिनी चुनी थी। इनमें कोई बडा सितारा या बड़ा निर्माता, निर्देशक शामिल नहीं होता था। इस समय नागरिकता कानून पर देश के अलग अलग विश्वविद्यालयों में हुए आंदोलन और छात्रों पर पुलिस की कार्रवाई ने बॉलीवुड से जुडे लोगों को मुखर बना दिया है। पहली बार बडी संख्या में सितारे और निर्माता-निर्देशक खुल कर छात्रों के साथ खडे हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी के साथ फोटो खिंचवाने वाले कई कलाकारों ने भी छात्रों के समर्थन में बयान दिए हैं। हालांकि तमाम कलाकारों और फिल्मकारों की ललकार के बावजूद अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, सलमान खान, अक्षय कुमार आदि की जुबान नहीं खुली। और तो और समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन ने भी अभी तक चुप्पी साध रखी है।

चलते-चलते

शनिवार को विपक्षी दलों के बिहार बंद के दौरान हिंसा की कोई खबर नहीं आने से टीवी चैनलों की एंकर बेहद मायूस रहे। शुक्रवार को भी देर शाम को उत्तर प्रदेश और दिल्ली से हिंसा में लोगों के मरने की खबरें आने पर ही उनके चेहरों पर चमक आई थी। शनिवार को भी दिन-भर हिंदू-मुस्लिम करते हुए कहीं से आग लगने या किसी के मरने की खबरों का इंतजार करते रहे।

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