प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अचल संपत्ति से जुड़े तथाकथित घोटाले / अनियमितताओं की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है. याचिका में मांग की गई है इस घोटाले की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया जाए.

याचिकाकर्ता साकेत गोखले, जो एक पत्रकार रहे हैं, ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (A) के अनुसार  एक भारतीय नागरिक/ मतदाता के उस मौलिक अधिकार का हवाला दिया है जिसके तहत उसे सार्वजनिक पदों को ग्रहण करने के इच्छुक उम्मीदवारों से सम्बंधित कानून सम्मत तथ्यों को जानने का संवैधानिक अधिकार है.

याचिका में गुजरात राज्य और चुनाव आयोग को भी प्रतिवादी बनाया गया है.
सबसे पहले याचिका की पृष्ठभूमि में मौजूद उन तथ्यों को जानना जरूरी है जिनके कारण तथाकथित अनियमितताएं प्रकाश में आई हैं.

गुजरात सरकार की एक पॉलिसी के तहत सांसदों एवं विधायकों को बहुत ही कम मूल्य पर 330 और 200 वर्ग मीटर माप के आवासीय  भूखंड आबंटित किए जाते  है. लाभार्थी सांसद एवं विधायक  जिलाधीश की अनुमति के बगैर किसी अन्य को यह भूखंड न तो उपहार में दे सकते हैं और न ही हस्तांतरित कर सकते हैं.

यहाँ गौरतलब बात यह है कि गुजरात सरकार की उपरोक्त पालिसी को चुनौती देने वाली एक अपील जब 2002 में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सुनवाई के लिए आई थी तो भाजपा नेता मीनाक्षी लेखी, जो इस केस में गुजरात सरकार की वकील थीं, ने कोर्ट को बताया था कि गुजरात सरकार ने वर्ष 2000 के बाद कोई भूखंड आबंटित नहीं किया है.
याचिकाकर्ता की दलील है कि चुनाव के लिए नामांकन भरते समय नरेंद्र मोदी ने अपनी चल–अचल संपत्तियों का खुलासा करते हुए जो शपथपत्र अब तक दाखिल किए हैं उनमें गुजरात सरकार द्वारा उन्हें आबंटित एक ऐसे ही भूखंड के बारे में चुनाव आयोग के समक्ष अलग–अलग समय पर गलत सूचनाएं प्रस्तुत की है.

उपरोक्त पालिसी के तहत गुजरात सरकार द्वारा 2002 में मुख्यमंत्री श्री मोदी को 330 वर्ग मीटर का एक भूखंड गांधीनगर में सेक्टर 1 प्लाट 411, रुपए की 1,30,448 की धनराशि के भुगतान पर आबंटित किया गया था.

2007 में गुजरात विधानसभा चुनाव के समय दाखिल किए गए शपथपत्र में श्री मोदी ने इस भूखंड का उल्लेख किया है.

लेकिन इसके बाद 2012 गुजरात विधानसभा और 2014 लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन भरते समय उपरोक्त भूखंड का कोई उल्लेख उन्होंने नहीं किया.

बल्कि इसके बजाए उन्होंने उसी सेक्टर 1 में एक दूसरे भूखंड में अपनी ¼ हिस्सेदारी का उल्लेख किया जिसका प्लाट नंबर है 401-A और क्षेत्रफल 326.11 वर्ग मीटर.
सरकारी भू- अभिलेखों में सेक्टर 1 प्लाट नंबर 411 अब भी स्पष्ट रूप से मोदी के नाम पर दर्ज है. अभिलेखों में कहीं पर भी मोदी द्वारा इस प्लाट को बेचे जाने का भी उल्लेख नहीं है.

जबकि दूसरा प्लाट न. 401-A अभिलेखों में कहीं दर्ज नहीं है. यहाँ तक कि प्रधानमंत्री की आधिकारिक वेबसाईट पर भी उनकी परिसंपत्तियों के बारे में प्रतिवर्ष 401-A प्लाट का ही उल्लेख किया जाता है.

याचिकाकर्ता के अनुसार केंद्र सरकार में मंत्री अरुण जेटली भी उपरोक्त प्लाट नंबर 401- A में स्वयम को ¼ का भागीदार बताते हैं. उन्होंने 2007, 2012 और 2014 में अपने नामाकंन के समय शपथपत्र में इसी प्लाट नंबर 401-A में स्वयम को हिस्सेदार बताया है.

याचिकाकर्ता की यह भी मांग है कि उपरोक्त प्लाट नंबर 401-A में मोदी व जेटली के अतिरिक्त और किस-किस की हिस्सेदारी है, इसका भी खुलासा किया जाए.

याचिकाकर्ता का कहना है की हैरानी इस बात की है कि चुनाव आयोग नरेंद्र मोदी द्वारा दाखिल शपथपत्रों में इस अनियमितता का संज्ञान लेने में अक्षम रहा.

“चूंकि प्रधानमंत्री देश के एक सर्वोच्च पद पर आसीन हैं तो यह उनका कर्तव्य है कि सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता के उच्चतम मानदंड स्थापित करें‘’, कहते हैं याचिकाकर्ता साकेत गोखले.

‘’अपनी सम्पति के विषय में गलत व भ्रामक सूचना देने के कारण मोदी न केवल झूठा शपथपत्र दाखिल करने के दोषी हैं बल्कि प्रथमदृष्टया उनके द्वारा प्रस्तुत अन्य सूचनाओं के बारे में संदेह पैदा होता है.’’

याचिकाकर्ता ने Lok Prahari vs UOI & Ors (2018) वाद में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को नजीर के तौर पर पेश किया है. जिसमें कहा गया है उम्मीदवार द्वारा सम्पत्ति सम्बन्धी जानकारी छिपाए जाने पर उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है.

..the importance of citizens being the ultimate repository of sovereignty in a democracy that he must have access to all information that enables critical audit of the performance of the state and their incumbent or aspiring public officials…the non-disclosure if assets and sources of income of the candidates and their associates would constitute a corrupt practice falling under heading “under influence” as defined as defined under Sectio 123(2) of the 1951 RP Act.”

इस बिनाह पर याचिकाकर्ता का दावा है मोदी ने नागरिकों / मतदाताओं के उस मौलिक  अधिकार का उल्लंघन किया है जिसके तहत उन्हें सत्य एवं वर्तमान सूचनाओं के आधार पर अपना जनप्रतिनिधि चुनने का अधिकार है.

अत: याचिकाकर्ता ने न्यायालय से अनुरोध किया है कि नरेंद्र मोदी की चल-अचल संपत्तियों, विशेषकर गुजरात सरकार द्वारा आबंटित उपरोक्त भूखंड, की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में SIT का गठन किया जाए.

जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत मोदी द्वारा शपथपत्र में तथाकथित रूप गलत जानकारी देने से उनकी उम्मीदवारी खतरे में पड सकती है.

 

 

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