सूरत के कोचिंग सेंटर अग्निकांड में 22 बच्चों की मौत के बाद गुजरात के शिक्षामंत्री ने सूरत महानगर पालिका प्रशासन को ज़िम्मेदार ठहराया। महानगर पालिका प्रशासन ने अभिभावकों को ज़िम्मेदार बताते हुए कहा कि अभिभावक बच्चों को कोचिंग भेजने से पहले सुनिश्चित कर लें कि वहाँ अग्निशमन यंत्र लगे हैं या नहीं!

दरअसल इस देश की शिक्षा व्यवस्था सड़क हादसों की तरह जानलेवा होती जा रही है। एजुकेशन हब जैसे आयातित शब्द अब हर शहर के सिर का गौरवशाली ताज बनते जा रहे हैं, जहाँ शिक्षा के नाम पर केवल पिंडारियों जैसी लूटपाट है। पिंडारी दल रुमाल में तांबे का सिक्का बांध यात्रियों के समूहों का गला घोंटा करते थे, तो एजुकेशन हब वाले शहर कोचिंग सेंटरों के जरिये युवाओं का शिकार कर रहे हैं।

जो शहर एजुकेशन हब की मणि लगाये इतरा रहे हैं, वहां तो कोचिंग सेंटरों की संख्या दसियों हज़ार होगी..और बाकी शहरों में भी इन बहेलिया संस्थानों की संख्या तीन से पांच हज़ार तो होती ही होती है।

सूरत या कोटा या किसी भी शहर में शासन या प्रशासन की क्रूर और निर्मम मानसिकता के चलते और इन संस्थानों की इंसान को पशुओं की श्रेणी में रखने की बाज़ार की व्यवस्था के चलते कितनी ही जानों का निपट जाना इस देश को सीरिया, फलस्तीन, लेबनान, कोलंबिया, लीबिया या अफगानिस्तान जैसे हालात में डालने पर आमादा दिख रहा है। बस फर्क यह है कि उन देशों में युद्ध है और हमारे यहाँ निडर, निर्ल्लज और मनचाही अव्यवस्था।

जिस शहर में बाहर से आये पांच से दस लाख युवा अपने कॅरियर को सिला देने के लिए अपने माँ-बाप के दसियों लाख रूपए फूंकते हैं, रहने, खाने और पढ़ने को लेकर उस शहर के बाशिंदे, शिक्षा संस्थान और कोचिंग सेंटर सब मिल कर उन सपने देख रहे युवाओं पर भेड़िए की तरह टूट पड़ते हैं। मतलब कि कहाँ-कहाँ नहीं लूटा जाता इस देश के होनहारों को।

सूरत की जिस इमारत में आग से जल कर दसियों युवाओं की मौत हुई। वो पुरातन भाषा में गुरुकुल था और आधुनिक भाषा में चक्रव्यूह..जिसमें जाया तो सकता है, निकलने का कोई रास्ता नहीं।

कोटा शायद लिम्का बुक में शामिल किया जा चुका होगा कोचिंग सेंटरों की भरमार के चलते। लाखों रुपए वसूलने वाले ये संस्थान एक सपनीली दुनिया का निर्माण करते हैं जो अंत में चक्रव्यूह ही होने का सच साबित होती है कि जिसमें घुसिये, लुटिये, और खुद की या सपनीली दुनिया के क्षत विक्षत शवों को अपने कन्धों पर लाद कर वहीँ अपनी क़ब्र खोद लीजिए। सिलसिला रुकने वाला नहीं क्योंकि युद्ध छोटा मोटा नहीं पांच हज़ार से जारी महाभारत है।

अब सुनिए 15 साल पहले का किस्सा..जो खुद को भी रोज रोज सुनाने की जरूरत है। तमिलनाडु के कुंभकोणम इलाके की एक पाठशाला में आग से 94 बच्चों का जल मरना देश के किसी भी स्तर के विकास या आगे कभी चमकने वाली विकासदरों पर एक भरपूर तमाचा है,  क्योंकि यह कोई आसमान में दो विमानों के टकराने का मामला नहीं है। यह सीधे-सीधे हमारी केन्द्र और राज्य सरकारों की बच्चों के विकास के प्रति जघन्य सोच का नतीजा है..

जघन्य इसलिये कि एक ऐसी इमारत में चार-चार स्कूल चलते थे, जिनके साढ़े आठ सौ बच्चे छोटे-छोटे छप्पर की छत वाले अंधेरे कमरों में ठुंसे रहने की बेबसी झेलने को अभिशप्त थे..सीढ़ियां इतनी संकरी थीं कि एक बार में एक ही चढ़ सकता था.. गेट की भी वही हालत थी, जिसमें निकल न पाने की ही वजह से ही इतने ज्यादा बच्चे जल मरे। मुख्यमंत्री को   (जयललिता रही हो या करूणानिधि) क्या फर्क पड़ता है ऐसे स्कूलों के बारे में रिपोर्ट काफी दिन पहले भेज दी गयी थी, जो किसी अलमारी की शोभा बनी पड़ी होगी।

यह हाल दूर-दराज बसे कुंभकोणम का ही नहीं देश भर में फैले सरकारी विद्यालयों का है। देश के किसी भी महानगर या नगर में बच्चे चमड़ी जला देने वाली गर्मी और खून जमा देने वाली सर्दी में टेंटों में पढ़ रहे हैं..तो बिहार और उत्तरप्रदेश में सरकारी विद्यालय की हर दूसरी इमारत ढहने को तैयार बैठी है।

सिर को टूटने से बचाने के लिए मास्टर जी बच्चों को जाड़ा, बरसात या तपती धूप में पेड़ के नीचे पढ़ाते दिख जाएंगे। या वो इमारत किसी दबंग के पारिवारिक समारोह के काम आ रही होगी, तो स्कूल आए बच्चे घर लौट जाएंगे, या मास्टर जी किसी स्थानीय या राष्ट्रीय चुनाव कराने से लेकर जनसंख्या या पोलियो अभियान में लगे होंगे।

तो गैर सरकारी शिक्षण संस्थान आप पर गिद्ध दृष्टि लगाए हैं। वो आपके मरने का भी इंतज़ार नहीं करेंगे।

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