लोक सभा चुनावों की तारीख सामने आ चुकी है। ढाई महीने बाद नई लोक सभा होगी और नई सरकार भी। क्या इस चुनाव को बाकी चुनावों की तरह माना जाए ? इसका जवाब ना में ही आएगा।  पहली बार ऐसा चुनाव हो रहा है जिसमें लोकतंत्र की संस्थाएं और इसे चलाने वाले बीमार हैं। आज से पचास साल बाद जब लोग मौजूदा बहस और मुद्दों को देखेंगे तो माथा पीट लेंगे कि तिलक, महात्मा गांधी, भगत सिंह और बाबा साहेब आंबेडकर के नेतृत्व में विश्व के इतिहास का अनोखा स्वतंत्रता संग्राम लड़़ने वाले और बुद्ध तथा महावीर के दर्शन को मानने वाले मुल्क में चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा यह था कि एक नादान पड़ोसी मुल्क पर किस प्रधानमंत्री ने सर्जिकल स्ट्राइक कराई। वे इस बात पर अचरज करेंगे कि एक ऐसे मुल्क में जहां का सम्राट अकबर आज से करीब साढे चार  सौ साल पहले सभी धर्मों के गुरूओं को बुला कर इस बात का पता लगाना चाहता था कि सभी मजहब किस एक रास्ते पर चल सकते हैं, चुनाव का एक बड़ा सवाल यह था कि भगवान राम के लिए मंदिर किस जगह बनाई जाए। यह देश जो ‘’कण-कण में राम’’ जपता आया है, उसके लोग इस बात के लिए मर मिटने को तैयार हैं कि अयोध्या में मंदिर वहीं बनाएंगे जहां कभी बाबरी मस्जिद थी।
आने वाली पीढी इस बात पर जरूर हंसेगी कि एक मठ का महंथ देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बन बैठा और उसके प्रचार का सबसे बड़ा मुद्दा यह था कि पड़ोसी मुल्क को सबक कैसे सिखाया जाए और राम की सबसे बड़ी मूर्ति कैसे बनाई जाए। उसका शासन इतना यादगार था कि गोरक्षा के नाम पर दिन-दहाड़े एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या हो गई।  उसके राज में महात्मा गांधी की हत्या की घटना की याद दिलाने के लिए उनकी प्रतिमा को गोली मारने का नाटक सार्वजनिक रूप से किया जाता है। उसके राज में आक्सीजन के बिना बच्चे मर जाते हैं और वह सरयू के तट पर लाखों दीप जलाता है।
यह चुनाव इसलिए याद किया जाएगा कि किसानों की बुरी हालत और बेरोजगारी के सबसे खराब दौर में चुनाव के महत्वपूर्ण मुद्दे ये नहीं हैं, बल्कि वे मुद्दे हैं जो वास्तव में निरर्थक हैं। देश के बेरोजगार और सामाजिक रूप से असुरक्षित कामगार दिल्ली के जंतर-मंतर पर जमा होते हैं, लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई नहीं है क्योंकि देश का मीडिया अखबारों और छोटे पर्दे पर भारत-पाकिस्तान में युद्ध कराने में व्यस्त है।
चुनाव के ठीक पहले इस पर नजर डाल लेने में कोई खराबी नहीं है कि देश की संस्थाओं की क्या हालत है। सीबीआई का तमाशा हुए ज्यादा दिन नहीं हुआ जहां मध्यरात्रि में इसके निदेशक को हटा दिया गया और उसके दफ्तर पर पुलिस की सहायता से कब्जा किया गया। रातोरात नोटबंदी कर दी गई और लोगों को अपनी कमाई के रूपयोें को बदलने या बैंक से निकालने के लिए लाइनों में खड़े होना पड़ा। लेकिन रिजर्व बैंक कुछ नहीं कर पाया। अंत में, नरेंद्र मोदी सरकार की मनमानी से आजिज गर्वनर ने इस्तीफा दे डाला। उसकी जगह एक ऐसा आदमी गर्वनर बन गया जिसका अर्थशास्त्र से बहुत नजदीकी संबंध नहीं है। सीवीसी लेकर किसी संस्था का नाम लीजिए और आपको पता चल जाएगा कि उसकी कैसी दुर्गति हुई है।
लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं के विकलांग होने की एक कहानी रफाल का सौदा भी कहता है।  रक्षा के सामान खरीदने की एक तय प्रक्रिया है और रक्षा मंत्रालय तथा सेना मिल कर यह काम करते हैं। लेकिन इसमें प्रधानमंत्री और उनका कार्यालय कूद पड़ा। मामला कोर्ट में गया, लेकिन सौदे को बिना जांच सही बता दिया गया। इस सौदे को देश में खर्च का हिसाब-किताब रखने वाली सर्वोच्च संस्था कैग ने भी सही बता दिया। गनीमत है कि इस मुद्दे को कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिंदा कर रखा है। यह अलग बात है कि उन्हें देश के प्रधानमंत्री पाकिस्तान की तरफदारी करने वाला बता रहे हैं। भारत संभवतः विश्व का पहला लोकतंत्र होगा जिसकी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी को देशद्रोही बताया जा रहा है। वह भी भाजपा जैसी पार्टी की तरफ से जिसकी विरासत विदेशी शासकों से सहयोग करने के आरोप से कलंकित है।
यह शायद सबसे महंगा चुनाव होगा और लोग यह भी नहीं जान पाएंगे कि पैसे किन धन्नासेठों ने लगाए हैं क्योंकि मोदी सरकार ने राजनीतिक चंदे का कानून ही बदल डाला। लोग खुद ही अपने उम्मीदवारों को घेरें तो बात बन सकती है कि इतना खर्च कहां से हो रहा है।
इस चुनाव को प्रधानमंत्री के अंदाजे-गुफ्तगू के लिए भी याद किया जाएगा। वह बेहिचक गलतबयानी कर सकते हैं और मंच पर किसी अभिनेता की तरह अपने विरोधियों की नकल उतार सकते हैं। अपनी पार्टी में उन्होंने सिर्फ अमित शाह को मैदान में उतारा है। स्मृति ईरानी जैसे कुछ नेताओं को छोड़ कर भाजपा के ज्यादातर सिपहसालार नेपथ्य में हैं। वामपंथी पार्टियों को छोड़ कर अधिकतर पार्टियां व्यक्ति-केंद्रित ही हैं। लेकिन उनमें कुछ दूसरे लोग भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं। वैसा केंद्रीकरण कहीं नहीं है जैसा भाजपा में हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस इस बीमारी को बहुत हद तक दूर करने में कामययाब हुई है। राहुल को यह श्रेय भी मिलना चाहिए कि वह सरकार के पक्ष में खड़े मीडिया और विज्ञापन कंपनियों के सहारे चल रहे प्रचार अभियान के बीच बेरोजगारी, सामाजिक सुरक्षा और किसानों की बदहाली को मुद्दा बनाए हैं ।  आरएसएस की सच्चाई का पता चलेगा कि उसमें चुनाव जिताने की कितनी कूवत है।
इस चुनाव में कई कद्दावर नेताओं की ताकत की परीक्षा भी होगी। उनकी एक लंबी फेहरिस्त है जो राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, अखिलेश जैसे युवा नेताओं से शुरू होकर मायावती, ममता बनर्जी, शरद पवार, शरद यादव, उद्धव ठाकरे, नीतिश कुमार, चंद्राबाबू और एचडी देवेगौड़ा तक पहुंचती है। सीताराम येचुरी के नेतृत्व में सीपीएम का यह आखिरी चुनाव है और देखना है कि बेरोजगारी और किसानोें की बदहाली के ज्वलंत मुद्दों को सामने रख कर क्या वह अपना पुराना गौरव लौटा पाएगी।

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