पवार के खुलासे के मायने

एनसीपी यानी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो शरद पवार को करीब से जानने वाले उनके बारे में बताते हैं कि पवार साहेब अक्सर जो काम करते दिखते हैं, वह काम वे कभी करते नहीं हैं। यानी उनकी निगाहें कहीं और होती हैं और निशाना कहीं और। इसलिए उन्होंने जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी निजी बातचीत का या अजित पवार और देवेंद्र फडनवीस के बीच मुलाकातों के बारे में जानकारी होने का खुलासा किया तो सबको हैरानी हुई। पवार को समकालीन भारतीय राजनीति में अजातशत्रु कहा जाता है। इसका कारण यह है कि वे सबके साथ रिश्ता निभाते रहे हैं। इसीलिए मोदी से मुलाकात के बारे में उनकी ओर से किए गए खुलासे के मायने खोजे जा रहे हैं। माना जा रहा है कि यह कांग्रेस और शिव सेना पर दबाव बनाने के लिए दिया गया बयान है। पवार यह दिखाना चाह रहे हैं कि उनके पास महाराष्ट्र में दूसरी सरकार बनाने का विकल्प हमेशा मौजूद है और इस बारे में उनकी बात सीधे प्रधानमंत्री से होती है। यह भी कहा जा रहा है कि इस खुलासे के लिए प्रधानमंत्री की भी सहमति रही होगी ताकि महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं को भी यह संदेश मिल सके कि वे मायूस न हो और इंतजार करें, कभी भी पासा पलट सकता है।

मनमोहन की ललकार पर बोले राहुल बजाज

पिछले सप्ताह जब आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी का आंकडा आया तो पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बहुत तीखा बयान दिया। आमतौर पर वे इस तरह से बयान नही देते हैं, मगर जीडीपी साढे चार फीसदी पहुंचने पर उन्होंने कारपोेट जगत की चुप्पी पर सवाल उठाए। उन्होंने एक तरह से देश के उद्योगपतियों को ललकारते हुए कहा कि उन्हें देश की गिरती आर्थिक स्थिति के बारे में बोलना चाहिए। असल में मनमोहन सिंह को इस बात का दुख था कि उनकी सरकार के समय आर्थिक नीति से जुडे हर मुद्दे पर कारपोरेट जगत की प्रतिक्रिया आती थी। कारोबारी उनको चिट्ठियां लिख कर उनकी सरकार की नीतियों की आलोचना करते थे। मीडिया में रोज उनके बयान दिखाए जाते थे। उन्हीं दिनों को याद करते हुए उन्होंने देश के कारोबारी जगत को ललकारा। उनकी ललकार पर और किसी ने तो ध्यान नहीं दिया मगर बजाज समूह के बुजुर्ग उद्योगपति राहुल बजाज ने एक कार्यक्रम में सीधे गृह मंत्री अमित शाह से कुछ सवाल पूछते हुए कहा कि यूपीए की सरकार में तो सब सवाल पूछ रहे थे पर इस सरकार में डर लगता है। अपनी इस साहसिक पहल से सोशल मीडिया में तो राहुल बजाज हीरो बन गए मगर दूसरी ओर भाजपा का आईटी सेल और तमाम प्रवक्ता उनको विलेन बनाने में जुट गए।

मोदी की हिदायत भी अनसुनी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा संसदीय दल की हर बैठक में अपने सांसदों को निर्देश देते हैं कि वे संसद की कार्यवाही में नियमित रूप से हिस्सा लें। मगर देखने में यही आता है कि उनकी पार्टी के ज्यादातर सांसद उनकी इस हिदायत को गंभीरता से नहीं लेते हैं। संसद के चालू सत्र में भी राज्यसभा में तो नहीं, मगर लोकसभा में सांसदों की उपस्थिति बहुत कम दिख रही है। प्रतिदिन सदन की कार्यवाही का पहला चरण यानी प्रश्नकाल खत्म होने के साथ ही सांसदों का सदन से निकल कर जाना शुरू हो जाता है। ज्यादातर सांसद तो संसद छोड कर चले जाते हैं और जो संसद में रहते हैं वे सेंट्रल हॉल में बैठ कर गप्पे मारते रहते हैं। पिछले सप्ताह दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों से संबंधित विधेयक लोकसभा मे रखा गया था। जब उस पर चर्चा चल रही थी उस समय भाजपा के महज 40 सांसद सदन में मौजूद थे। उनमें से दिल्ली के पांच सांसद थे और पांच मंत्री थे। बाकी सांसदों को वहां चल रही चर्चा से कोई मतलब नहीं था। इसी तरह एक अन्य विधेयक पर चर्चा के दौरान भी सत्तापक्ष के ज्यादातर सांसद सदन से नदारद थे। हालांकि दोनों विधेयक पारित कराने के मौके पर सांसदों की संख्या बढ गई। उनके मुकाबले इस बार विपक्षी सांसदों की सदन मे मौजूदगी ज्यादा दिख रही है।

दिल्ली में भाजपा का कंफ्यूजन कार्ड

दिल्ली में भाजपा ने मुख्यमंत्री पद को लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति बनाने का काम शुरू कर दिया है। दूसरे राज्यों में भी भाजपा यही दांव चलती है। जिन राज्यों में मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित नहीं किया जाता वहां उसके नेता चुनाव से पहले हर समुदाय के लोगों को यह मैसेज देते हैं कि उनके समुदाय का नेता मुख्यमंत्री बन सकता है। 2014 के चुनाव में महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में भाजपा ने यह दांव चला था। बाद में यही दांव उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी खेला गया। इसका उसे बड़ा फायदा हुआ। चूंकि दिल्ली में भाजपा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करना है, इसलिए वह भ्रम की स्थिति बना रही है। पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने ऐलान किया कि मनोज तिवारी मुख्यमंत्री बनेंगे। फिर दो घंटे बाद ही उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया और कहा कि अभी यह तय नही हुआ है कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा। पर इन दो घंटों में उनकी बात दिल्ली के पूर्वांचली मतदाताओं तक पहुंच गई। अब इस दांव के अगले चरण में भाजपा का कोई बड़ा नेता विजय गोयल या हर्षवर्धन के लिए ऐसा ही बयान देगा। फिर उसका भी खंडन हो जाएगा। फिर किसी नेता से प्रवेश वर्मा का नाम आगे कराया जाएगा। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के स्टार प्रचारक इसी अंदाज मे अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग नामों को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करेंगे, ताकि प्रवासी, वैश्य, जाट, पंजाबी आदि सभी में यह मैसेज जाए कि उनका मुख्यमंत्री हो सकता है। हालांकि भाजपा का यह दांव कामयाब होना मुश्किल लग रहा है।

राहुल बजाज को ट्रोल करने का मकसद

प्रख्यात उद्योगपति राहुल बजाज ने जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से कुछ सवाल पूछे तो पता नहीं उन्हें इसके असर का अंदाजा था या नहीं। मगर अब उनको इसके असर का अंदाजा हो गया होगा। दूसरे उद्योगपति भी समझ गए होंगे कि इस सरकार में कुछ बोलने या सवाल पूछना ठीक नहीं है। राहुल बजाज के सवाल पूछने के तुरंत बाद भाजपा की ट्रोल आर्मी सोशल मीडिया में सक्रिय हो गई और भाजपा के नेता भी खुल कर राहुल बजाज को निशाना बनाने लगे। उन्हें कांग्रेस का आदमी और यहां तक कि देशद्रोही भी बताया गया। भाजपा की आईटी सेल के प्रभारी अमित मालवीय ने राहुल बजाज को राहुल गांधी का समर्थक बताया। उन्होंने बजाज का एक पुराना ट्विट निकाल कर शेयर किया और कहा है कि वे जब राहुल गांधी के समर्थक हैं तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है। अखबार में छपी किसी पुरानी खबर की कटिंग भी शेयर की गई, जिसमें बताया गया कि राहुल बजाज ने अपने स्कूटर की बिक्री के लिए सरकारी नियमों में फेरबदल करवाया था। सोशल मीडिया के इस अभियान से राहुल बजाज पर असर हो या न हो, पर यह तय है कि अब दूसरा कोई उद्योगपति सवाल नहीं पूछेगा। ट्रोल आर्मी का मकसद भी यही सुनिश्चित करना था कि एक ने पूछ लिया तो पूछ लिया, आगे कोई दूसरा न पूछे।

कांग्रेस चाहती है कि सुप्रिया बने उत्तराधिकारी

महाराष्ट्र में एक महीने तक चले राजनीतिक ड्रामें का एक पहलू तो शिवसेना का भाजपा से अलग होकर कांग्रेस, एनसीपी के साथ सरकार बनाना है और दूसरा महत्वपूर्ण पहलू एनसीपी की अंदरुनी राजनीति है। शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने थोडे समय की बगावत की और फिर घर वापसी की। पर इस दौरान ही पार्टी में शरद पवार का उत्तराधिकारी तय हो गया। पवार की सांसद बेटी सुप्रिया सुले इस पूरी सियासत के दौरान अपने पिता के साथ मौजूद रही। वे बैठकों में शामिल हुईं और जिस दिन विधायकों की शपथ हुई उस दिन विधानसभा में उन्होंने सभी विधायकों का स्वागत किया। उनका साथ देने के लिए शरद पवार ने अजित पवार के भतीजे रोहित पवार को आगे किया। रोहित विधायक हो गए हैं। एनसीपी में चल रही विरासत ट्रांसफर की इस प्रक्रिया में कांग्रेस नेताओं ने भी पूरी रुचि ली। सबसे पहले अजित पवार की बगावत पर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ट्विट किया। उन्होंने लिखा कि एनसीपी में शरद पवार के उत्तराधिकार की समस्या हल हो गई। उन्होंने सुप्रिया सुले को उत्तराधिकारी बताते हुए उनको बधाई भी दी। सरकार बनने के बाद यही काम कांग्रेस के दूसरे नेता मिलिंद देवडा ने किया। कांग्रेस को लग रहा है कि सुप्रिया को एनसीपी की कमान मिली तो कांग्रेस को उनके साथ मिल कर काम करने में आसानी होगी।

चलते-चलते

न्यू इंडिया की न्याय व्यवस्था में महज साढे सात लाख रुपए के आर्थिक अपराध के आरोपी देश के पूर्व वित्त मंत्री को जमानत मिलने में 106 दिन लग जाते हैं, जबकि उन्नाव के बलात्कारी दरिंदों को महज नौ दिन में जमानत मिल जाती है। जमानत पर छूट कर ये दरिंदे अपने बलात्कार की शिकार लडकी को उस वक्त कैरोसिन डालकर जला देते है, जब वह अपने मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट जा रही होती है। जलाने की घटना के तीन दिन बाद (शुक्रवार की रात) दिल्ली के एक अस्पताल में वह लडकी दम तोड देती है।

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