आधुनिक औद्योगिक सभ्यता दो विश्वयुद्ध देख चुकी है. युद्ध विशेषज्ञ अभी तक तय नहीं कर पाए हैं कि दो विश्वयुद्धों में कितनी मौतें – फौजी और नागरिक – हुईं. दोनों विश्वयुद्धों में मारे गए लोगों का अनुमानित आंकड़ा 10 से 15 करोड़ के बीच में बताया जाता है. पहले और दूसरे विश्वयुद्ध के आगे-पीछे कई बड़े-छोटे युद्ध हुए हैं. सभी उपनिवेशित देशों ने अपने-अपने स्वतंत्रता युद्ध लड़े हैं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद 1946 से सोवियत रूस के विघटन तक चले शीतयुद्ध के दौर को भी विद्वानों ने एक ख़ास तरह का विश्वयुद्ध कहा है और उसमें मारे जाने वाले लोगों की भी बड़ी संख्या बताई है. शीतयुद्ध के दौरान और बाद भी कई सीधे और प्रॉक्सी युद्ध हुए हैं, जिनमें दो देशों से लेकर पांच-छह देशों की भागीदारी रही है. कई युद्धों, जैसे युगोस्लाविया के विघटन के बाद हुए आतंरिक संघर्षों में गृहयुद्ध और नस्ली नरसंहार का मिश्रण हो गया है. पिछले कुछ दशकों में इस्लामी आतंकवादियों ने युद्ध और गृहयुद्ध को मिला कर युद्ध को एक अलग आयाम दे दिया है. इसके चलते ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ (वार अगेंस्ट टेरर) नाम से एक नया युद्ध शुरू हुआ है, जिसका विस्तार विश्वव्यापी है.

पहले विश्वयुद्ध में रासायनिक हथियारों का प्रयोग तो हुआ था, लेकिन परमाणु हथियारों का नहीं. दूसरे विश्वयुद्ध में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु बम गिरा कर आने वाले समय में अपने चक्रवर्तित्व की घोषणा कर दी थी. तभी से दुनिया जहां एक ओर परमाणु युद्ध के खतरे में जी रही है, वहीँ दूसरी ओर परमाणु हथियारों को तीसरे विश्वयुद्ध को रोकने का एक बड़ा निवारक (डेटेर्रेंट) भी माना जाता है. हालांकि हथियार-निर्माता देश एक से बढ़ कर एक एक्सट्रीम वेपन्स बनाते जा रहे हैं. इस बीच तीसरे विश्वयुद्ध की चर्चा भी लगातार होती रही है. दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के समय से ही माना जाता है कि यूरोप और अमेरिका ने यह फैसला कर लिया था कि तीसरा विश्वयुद्ध युद्ध उनकी धरती पर नहीं लड़ा जाएगा. अल्बर्ट आइन्स्टीन ने कहा है, ‘मुझे नहीं मालूम तीसरा विश्वयुद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्वयुद्ध छड़ियों और पत्थरों के साथ लड़ा जाएगा.’  

भारत ने भी युद्धों की इस सभ्यता में कुछ हिस्सेदारी की है. कई युद्धों और उसके बाद संधियों के माध्यम से ब्रिटेन ने भारत को अपना उपनिवेश बनाया. ब्रिटेन का उपनिवेश होने के नाते दोनों विश्वयुद्धों में भारत की भी सीमित हिस्सेदारी रही. 1857 और 1942 में उसने उपनिवेशवादी सत्ता के खिलाफ सीधा युद्ध किया. दूसरे विश्वयुद्ध के बीचों-बीच सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में धुरी (एक्सिस) देशों के साथ सहयोग बना कर आज़ाद हिंद फौज ने भी अपने ढंग का भारत की आजादी का युद्ध लड़ा. 1857 के संघर्ष में लाखों भारतीयों ने अपने प्राणों की बाज़ी लगाई. 1942 में भी, डॉ. लोहिया के अनुसार, 50 हज़ार भारतीयों ने अपने प्राण गवांए. आज़ादी के बाद 1948, 1962, 1965, 1971 और 1999 में भारत ने अपने दो पड़ोसियों पकिस्तान और चीन के साथ युद्ध किए.

यह संक्षिप्त उल्लेख मैंने युद्ध से होने वाली जान और माल की तबाही अथवा मनुष्य पर पड़ने वाले उसके दारुण प्रभावों को दिखाने के लिए नहीं किया है. वे अपनी जगह है. यहां केवल यह कहना है कि युद्धों की सभ्यता में जीते हुए भी भारत के मुख्यधारा नागरिक समाज, जिसमें ज्यादातर बौद्धिक समाज भी समाहित है, की युद्ध के बारे में गंभीर समझ नहीं मिलती. न अपने लिए, न देश के लिए, न दुनिया के लिए. न उसे दुनिया में फैले युद्ध-उद्योग के बारे में जानकारी है, न फिलहाल चलने वाले अथवा संभावित युद्धों में भारत की क्या भूमिका रहेगी, इसकी जानकारी है. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही कहा जाता है कि अगला विश्वयुद्ध, उसका जो भी स्वरूप रहे, एशिया की धरती पर लड़ा जाएगा. उस युद्ध में भारत की भूमिका और उस युद्ध के बाद भारत कैसा होगा, इस बारे में भारत के नागरिक समाज की कोई सोच देखने-सुनने को नहीं मिलती. क्योंकि वह यह तक नहीं जानता है कि उपनिवेशवादियों से पहले के आक्रमणकारियों और उपनिवेशवादियों को भारत की सेनाओं को परास्त करने में कामयाबी क्यों मिलती चली गयी. भारत की आज़ादी के दो बड़े युद्धों – 1857 का सशस्त्र संग्राम और 1942 का जनसंग्राम – के बारे में वह प्राय: निरक्षर है.   

यह हो सकता है कि कोई नागरिक समाज देश की मजबूती और खुशहाली के लिए युद्ध की तरफ से आंख फेर कर अन्य क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित करे. दुनिया में जापान समेत ऐसे कई देश हैं. भारत में तो गांधी का सहारा भी लिया जा सकता है कि हम हिंसक संघर्ष में विश्वास करने वाले समाज नहीं है. लेकिन सैन्य-जगत की स्थिति और गति से अनभिज्ञ भारत के नागरिक समाज का सपना भारत को जल्द से जल्द महाशक्ति के रूप में देखने का है. बल्कि नागरिक समाज का एक हिस्सा भारत के विशाल बाज़ार और उसके साथ जुड़ी अर्थव्यवस्था की चकाचौंध में भारत को महाशक्ति मानता है. भारत का यह नागरिक समाज तरह-तरह से देशभक्ति का प्रदर्शन करता हुआ ‘युद्धं देहि’ की उग्र ललकार से भरा नज़र आता है. इस सिलसिले में अब स्थिति यह हो चली है कि वह गोल बना कर, यहां तक कि कई बार अकेले ही, ‘घर में छिपे गद्दारों’ पर हमला कर बैठता है. ऐसे तत्वों द्वारा खुलेआम गाली-गलौच, महिलाओं के प्रति भी, आम बात हो गयी है.

कहने की जरूरत नहीं कि वास्तविकता में भारत के नागरिक समाज को अपने देश की पहचान नहीं है. न उसका देश के प्रति लगाव है. क़ुरबानी देने की बात वह सोच भी नहीं सकता. इसके बावजूद वह पूरे देश का ठेकेदार बन कर दिन-रात देशभक्ति और युद्ध के उन्माद से ग्रस्त नज़र आता है.  कहने को यह भारत का नागरिक समाज है, लेकिन इसके सदस्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय संविधान की कसौटी पर भारत के अवैध नागरिक ठहरते हैं. किशन पटनायक के शब्दों में इनके दिमाग में गुलामी का ऐसा छेद हो गया है जिसकी मरम्मत आसान काम नहीं है. मैंने अपने पत्रकारी लेखन में भारतीय नागरिक समाज से जुड़ी इस परिघटना पर पिछले 20-25 सालों में कई बार लिखा है. देखने में यही आ रहा है कि इस चिंतनीय परिघटना में कमी आने बजाय तेजी आती जा रही है. लिहाज़ा, दोहराव के बावजूद, यहां संक्षेप में एक बार फिर से इस पर विचार किया गया है.   (जारी )

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