कितने लोगों को याद है कि इस सरकार ने सत्तासीन होने के साथ ही ‘नई शिक्षा नीति’ पर बातें करनी शुरू कर दी थीं और इस संदर्भ में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री श्रीमती स्मृति जुबिन ईरानी के कुछ विद्वतापूर्ण वक्तव्य हमारी नजरों से गुजरे थे कि…”नए भारत की जरूरतों को देखते हुए शिक्षा नीति को नया रूप दिया जाएगा…कि भारत को महाशक्ति बनाने के लिये शिक्षा तंत्र के संगठनात्मक और अवधारणात्मक आयामों की समीक्षा की जाएगी आदि…आदि।”
यद्यपि, श्रीमती ईरानी को शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग का दायित्व मिलना ही इस तथ्य को रेखांकित करने के लिये पर्याप्त था कि नई सरकार को वैचारिक और संगठनात्मक उठापटक चाहे जो करनी हो, शिक्षा को लेकर इसमें गम्भीरता का अभाव है।
इस उत्तर औद्योगिक दौर में, जब किसी भी दायित्व के निर्वहन में विशेषज्ञता और विजन की खास अपेक्षा की जाती है, मैडम ईरानी को शिक्षा मंत्री बनाया जाना देश के छात्रों, शिक्षकों और बुद्धिजीवियों का मजाक उड़ाना ही था। नई सरकार के गठन के उत्साहपूर्ण माहौल में भी नरेंद्र मोदी के इस निर्णय ने देश में एक आश्चर्य मिश्रित निराशा का भाव पैदा कर दिया था।
यह नई सत्ता के बौद्धिक रूप से रुग्ण होने का जीता-जागता सबूत था। रही-सही कसर नवनियुक्त शिक्षा मंत्री ने अपनी कार्य प्रणाली से पूरी करनी शुरू की…जब उन्होंने प्रतिष्ठित संस्थानों की स्वायत्तता का हनन करने में अपने पद का दुरुपयोग करना शुरू किया। आईआईटी के एक निदेशक, जो देश के प्रख्यात वैज्ञानिकों में शुमार थे, को अपने कार्यालय में बुला कर अपमानित करना ऐसा ही एक बहुनिन्दित कृत्य था।
बहरहाल, जैसे-जैसे सरकार की गाड़ी आगे बढ़ने लगी, यह देखा गया कि शिक्षा ही नहीं, अधिकांश विभागों के मंत्री किसी लायक नहीं। तमाम विभागों पर पीएमओ के सख्त नियंत्रण और वहां के अधिकारियों की दखलंदाजी, नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा और उनसे जुड़ी उम्मीदों के कारण शुरुआती दौर में जिसका स्वागत ही किया गया, ने हालात और बदतर किये।
प्रणालीगत अंतर्विरोध और नीतिगत अपंगता ने देश की शिक्षा व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। बिना वैकल्पिक निदान के, स्मृति ईरानी ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों के शोध फेलोशिप पर रोक लगा दी। तमाम कैम्पस हंगामों के शिकार हो गए और मंत्री को अपना फैसला वापस लेना पड़ा।
बावजूद इस यूटर्न के, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के बजट में भारी कटौती कर दी गई जिसका सबसे नकारात्मक असर प्राध्यापकों के शोध कार्यों और वंचित तबके के छात्रों के कल्याणकारी कार्यक्रमों पर पड़ा। यह कटौती वर्ष दर वर्ष जारी रही।
ऐसे सवालों…कि शोध को हतोत्साहित कर, वंचितों के शैक्षणिक प्रोत्साहन कार्यक्रमों के बजट में कटौती कर कोई देश महाशक्ति बनने की कल्पना भी कैसे कर सकता है… को वामपंथी बौद्धिकों के ‘कुंठित और अनर्गल प्रलाप’ की संज्ञा दी जाने लगी।
शिक्षा मंत्री के रूप में स्मृति ईरानी का अक्सर अहंकारी बर्ताव बर्दाश्त की सीमाओं से परे था और दायित्वों के निर्वहन में उनकी असफलता ने देश के शिक्षा तंत्र को अराजकता की सीमाओं के पार पहुंचा दिया।
बहरहाल, मैडम ईरानी को रुखसत कर प्रकाश जावडेकर को मंत्री बना कर ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोशिश की गई। लेकिन, सरकार की नीतिगत अस्पष्टता और अपंगता ने जावेडकर की सीमाओं को जल्दी ही उजागर कर दिया।
सरकार ने घोषणा की कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को विघटित कर एक नई नियामक संस्था का गठन किया जाएगा। इसमें कोई आपत्ति नहीं होती अगर यह नेहरू की सांस्थानिक विरासतों को मिटाने का एक विचारहीन उपक्रम मात्र न होता।
मंत्री ने घोषणा की कि “हायर एडुकेशन फंडिंग एजेंसी का गठन कर यूजीसी के दायित्व उसे सौंपे जाएंगे। बड़ी चतुराई से इसमें ‘अनुदान’ शब्द को विलोपित करने का प्रयास किया गया।
प्रस्तावित एजेंसी की जो रूपरेखा प्रस्तुत की गई वह यह बताने के लिये काफी था कि सरकार उच्च शिक्षा पर व्यय से अपने पांव अधिकतम सीमाओं तक खींच लेना चाहती है और इसे कारपोरेट के हवाले करने के लिये शब्दजाल का सहारा ले रही है।
‘स्वायत्तता’ भी ऐसा ही एक भ्रामक शब्द था जो उच्च शिक्षा संस्थानों के कारपोरेटीकरण की दिशा में उठाए जा रहे कदमों को परिभाषित करता था।
स्पष्ट था कि सरकार हाशिये के लोगों को ही नहीं, निम्न मध्य वर्ग के युवाओं को भी गुणवत्ता पूर्ण उच्च शिक्षा के दायरे से बाहर करना चाहती है। आईआईटीज में अकल्पनीय फीस वृद्धि और रिसर्च के लिये उन्हें बाजारोन्मुख होने का संदेश देना ऐसे ही उद्देश्यों के पड़ाव थे।
साहित्य अकादमी जैसी संस्थाओं तक को भी कह दिया गया कि अपने खर्चों के आंशिक भरपाई के लिये वे बाजार से संबंध विकसित करें। यह नितांत हास्यास्पद ही नहीं, घोर आपत्तिजनक था लेकिन…वो आजकल कहा जाता है न कि…”मोदी है तो मुमकिन है…।”
नरेंद्र मोदी के पूरे कार्यकाल में शिक्षा क्षेत्र में अफरातफरी मची रही और सरकार किसी स्पष्ट दिशा का निर्धारण नहीं कर सकी।
‘नई शिक्षा नीति’ का कोई मसौदा आधिकारिक रूप से कभी सामने नहीं आया और न ही यूजीसी के स्थान पर वैकल्पिक संस्थान का कोई ढांचा ज़मीन पर उतरा। देखते-देखते पांच साल भी बीत गए और अब इस चुनाव के कोलाहल में किसी को याद भी नहीं कि यह सरकार कोई ‘शिक्षा नीति’ भी लाने वाली थी।
इधर, देश में विवाद और विमर्श के इतने मुद्दे उभरते रहे कि इन कोलाहलों में आमलोगों का ध्यान शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त नीतिगत अपंगता और अराजकता की ओर गया ही नहीं। गाय और गोभक्त, नोटबन्दी, बिना तैयारी के जीएसटी का लाया जाना आदि विवादों के केंद्र में रहे। सरकार चाहती भी नहीं थी कि शिक्षा के मुद्दे जन विमर्शों में शामिल हों।
जन आकाँक्षाओं के धरातल पर विफल नरेंद्र मोदी ने ‘राष्ट्रवाद, पाकिस्तान और धर्म एवं संस्कृति’ के मुद्दों को चुनावी विमर्श के केंद्र में लाने की पुरजोर कोशिश की। पुलवामा की घटना ने उन्हें यह राजनीतिक अवसर भी दिया जिसे लपकने में उन्होंने कोई भी देरी नहीं की।
नतीजा, जिन युवाओं को शिक्षा के सवालों पर सड़कों पर उतरना था उनमें से बहुत सारे युवा ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद, भारत माता की जय, वन्दे मातरम’ आदि का गगनभेदी निनाद करते सड़कों पर उधम मचाते देखे जाने लगे। यहां तक कि… ऐसे समय में, जब सर्वे बता रहे हैं कि रोजगार का संकट खतरे के निशान को पार कर चुका है और सरकार रोजगार सृजन में बुरी तरह असफल साबित हुई है, हमने सड़कों पर ऐसी तख्तियां थामे युवाओं के हुजूम को भी देखा, जिन पर लिखा था…”हमें नौकरी नहीं, बदला चाहिये।”
“नए दौर में नए भारत की नई चुनौतियों” से निबटने के लिये “नई शिक्षा नीति” की जो बातें की गई थीं, वह न धरातल पर कहीं नजर आ रही है, न इसकी कोई चर्चा है।
पता नहीं, वह ‘जियो युनिवर्सिटी’ आजकल किस हाल में है जिसे जन्म लेने के पहले ही विशिष्ट संस्थान का दर्जा दे दिया गया था। नए दौर के भारत का नया प्रतीक…”जियों इंस्टीच्यूट ऑफ हायर स्टडीज।” शायद, अभी तक उसका जन्म नहीं हुआ है, वरना उसकी किलकारियों से भारत का शिक्षा जगत गूंज रहा होता।
पांच वर्ष में स्पष्ट और सुविचारित शिक्षा नीति का कोई दस्तावेज भले ही सामने नहीं आया हो, लेकिन, मोदी सरकार ने अपने कार्य कलापों से इतना तो स्पष्ट कर ही दिया है कि उसकी नजर में गरीब और निम्न मध्यवर्ग के बच्चे तो गुणवत्ता पूर्ण उच्च शिक्षा के पात्र नहीं ही हैं, मध्य वर्ग के बच्चे भी अगर इस दायरे में आने की हसरत रखते हैं तो उन्हें इतना खर्च करना होगा कि उनके मां-बाप की जीवन भर की कमाई दांव पर लग जाएगी।
आर्थिक धरातल पर  उच्च मध्यम और उच्च वर्ग के लोग ही गुणवत्ता पूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त करने के हकदार होंगे क्योंकि उन्हीं की ऐसी आर्थिक हैसियत होगी। तभी तो वे राज कर सकेंगे क्योंकि वे तो पैदा ही इसलिये हुए हैं कि राज करें।
उद्देश्य यही है कि उस राजपथ को भीड़ और प्रतियोगिताओं से अधिकाधिक मुक्त रखा जाए जिस पर चल कर बेहद अमीरों के बच्चों को ऐसे गंतव्य तक पहुंचना है जहां से वे राज…सिर्फ राज करते रहें।

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