पिछले दिनों जवाहरलाल नेहरू का नाम सोशल मीडिया में बार-बार गूंजता रहा। याद करने वालों ने उनसे जुड़ी तारीखों और घटनाओं का सही ख्याल भी नहीं रखा। कोई उन्हंे 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय जिंदा देखने लगा है तो कोई उन्हें शहीद भगत सिंह को नजरअंदाज करने का अपराधी बताने लगा है। उनके और लेडी माउंटबेटेन के संबंधों की झूठी तस्वीरें भी प्रसारित की जा रही हैं।  हाल ही में, मैं ने मुंबई की लोकल ट्रेन में एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी को यह समझाते पाया कि किस तरह नेहरू खानदान वास्तव में मुसलमान है।
 दो साल पहले एक रेल-यात्रा में इंजीनियरिंग का एक छात्र भी नेहरू को देश का बुरा करने वाले बता रहा था। जब मैं ने उससे उसकी  नाराजगी का कारण पूछा तो कुछ बता नहीं पाया। सवाल उठता है कि नेहरू पर इस हमले को किस तरह लिया जाए ? अगर महात्मा गांधी भारत की आजादी के आंदोलन को निर्णायक मुकाम पर पहुंचाने वाले नायक थे तो नेहरू आजाद भारत की नींव रखने वाले थे। लेकिन आज दोनों ही हमले के शिकार हैं। गांधी पर हमला सीधा नहीं है। शायद इसका कारण है कि हत्यारों से नजदीक होने का दोष लगने के बाद आरएसएस या उनसे जुड़े लोगों के लिए गांधी पर सीधा हमला करना आसान नहीं है क्योंकि लोग उन्हें फिर घेर सकते हैं। यही वजह है कि गांधी को सफाई इंस्पेक्टर बना दिया गया है और समाज के निचले पायदान पर खड़े तबके के साथ सदियों के अन्याय को मिटाने की उनकी कोशिशों को किनारे कर दिया गया है।

नेहरू पर हमला सीधा है क्योंकि इससे हत्या जैसी कोई ऐतिहासिकता नहीं जुड़ी है। अपनी शहादत और अपनी अमूर्तता से गांधी खुद का बचाव कर सकते हैं। नेहरू के नेतृत्व में भारत ब्रिटिश गुलामी के कारण आई कंगाली और बंटवारे के कारण टुकडे़ हुए भूगोल से जूझ रहा था। नेहरू मूर्त हैं। वह आईआईटी, एम्स, बांधों, कारखानों और संवैधानिक संस्थाओं के रूप में मौजूद हैं। वह गांधी जी की तरह अपने को हिंदू नहीं बताते थे और हिंदूवादियों केे लिए जगह नहीं छोड़ते थे।  वह भारतीय सभ्यता को मध्यकालीन नजरिए से नहीं देखते थे। उनका एक ऐसा नजरिया था जो आधुनिक दृष्टिकोण से प्रेरित था। इसमेें अशोक और अकबर  दोनों महान थे। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह प्राचीन भारत में पुष्पक विमान उड़ाने या प्लास्टिक सर्जरी कराने का करतब नहीं दिखाना पड़ता था।

May 1946: Hon. Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar, famous ldr. of the Untouchables who studied at Columia Univ., relaxing on his veranda at home. (Photo by Margaret Bourke-White/The LIFE Picture Collection/Getty Images)
संघ परिवार और नेहरू का टकराव एक ऐतिहासिक सच है। यह आजादी के आंदोलन की दृष्टि और इसके विपरीत की दृष्टि का टकराव है। अगर आप गहराई से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि हिंदुुत्व की दृष्टि में अंग्रेज खलनायक नहीं हैं क्योंकि उन्होंने मुसलमानों के शासन का अंत किया था। इस इतिहास-दृष्टि में मध्यकाल एक स्वाकार नहीं किया जाने वाला कालखंड  है। इसमें बंटवारे के खलनायक भी अंग्रेज नहीं हैं। इसके खलनायक मुसलमान हैं। मजेदार बात यह है कि उन्हें अखंड भारत चाहिए, लेकिन उसमें मुसलमान दूसरे दर्जे का नागरिक हों। हिंदुत्व के विचारक विनायक दामोदर सावरकार मानते थे कि मुसलमान भारत में पूर्ण नागरिक नहीं हो सकते। उनकी राय मेें, मुसलमानों की पितृभूमि तो भारत है, लेकिन पुण्यभूमि देश से बाहर है। इसलिए वे देश के पूरे नागरिक नहीं हो सकते। लेकिन बाहरी पुण्यभूमि वाले पारसी, यहूदी और इसाई धर्म के लोगों को उन्होंने छूट दे रखी थी।
 हिंदुत्व-विरोधियों की यह विफलता रही कि वे लोगों को ठीक से समझा नहीं पाए कि  मुसलमानों को इस राष्ट्र का हिस्सा नहीं मानने के सावरकर के विचार और जिन्ना के दो-राष्ट्र के सिद्धांत में कोई अंतर नहीं है। दोनों मानते हैं कि हिंदू और मुसलमान अलग-अलग राष्ट्र हैं। हिंदुत्व जिन्ना के विचारों से ज्यादा घातक था क्योंकि यह बहुसंख्यक हिंदुओं की ओर से रखा गया था। इससे आजाद हिंदुस्तान में हिंदुओं की गुलामी का डर दिखाने में जिन्ना को आसानी हुई। आजाद हिंदुस्तान में इसे स्थापित करने में कांग्रेस असफल रही कि बंटवारा कराने में हिंदुत्व और जिन्ना के विचारों की भूमिका बराबर की थी। साथ में, कांग्रेस को भी स्वीकार करना था कि उन दोनों से मुकाबला करने में उन्होंने गलती की।
नेहरू हिंदुत्ववादियों और जिन्ना दोनों से लड़ रहे थे। उन्होंने कांग्रेस के उन तत्वों से भी लोहा लिया जो सांप्रदायिक थे। इसलिए इसमें अचरज की क्या बात है कि ये तत्व नेहरू के विचारों को पराजित करने की कोशिश करें।
 कांग्रेस को भी नेहरू-नेहरू की रट लगाने की बजाए इसे भी देखना चाहिए कि भाजपा और आरएसएस वाले बाकी व्यक्तित्वों पर इसी तरह का हमला कर रहे हैं। इसमें बाबा साहेब आंबेडकर भी शामिल हैं। उनके साथ वे वही कर रहे हैं जो उन्होेंने गांधी और नेहरू के साथ किया है। संघ से जुड़े लोग नहीं मानते कि डा आंबेडकर ने संविधान बनाया। वह संविधान बनाने का श्रेय आईसीएस अधिकारी बीएन राव को देते हैं जो संविधान सभा के सलाहकार थे।  संघ से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय तो कह चुके हैं कि यह एक मिथक है कि डा आंबेडकर ने संविधान तैयार किया। उनके अनुसार, उन्होंने सिर्फ राव के मसविदे की भाषा सुधारी थी। असल में, वे आज़ादी के आंदोलन की विचारधारा और बराबरी को सबसे ऊपर रखने वाले बाबा साहेब के संविधान के खिलाफ हैं।
इसलिए यह मानना गलत है कि संघ केे हमले के निशाना अकेले नेहरू हैं। आजादी के आंदोलन में नेहरू गांधी के बाद देश के दूसरे सबसे बड़े नेता थे, इसलिए वह सबसे पहले निशाने पर हैं। असल में, संघ आजादी के आंदोलन की विचारधारा के खिलाफ है और इस विचारधारा से जुड़ी हर शख्सियत का गिराना उसका उद्देश्य है। इसलिए बाबा साहेब आंबेडकर भी सूची में नेहरू के ठीक बाद आते हैं। दलितों की क्रांतिकारिता के कारण आंबेडकर अपना बचाव कर सकते हैं।
लेकिन इस बात को समझना जरूरी है कि नेहरू सिर्फ सेकुलर होने की वजह से निशाने पर नहीं हैं। असलियत यह है कि नेहरू अपने समाजवादी और लोकतांत्रिक विचारों के लिए भी निशाने पर हैं। वे मानवाधिकारों के सबसे बड़े हिमायती थे।
संघ और इसकी राजनीतिक इकाई जनसंघ देश मुख्य उद्योगों को सरकारी क्षेत्र में रखने के खिलाफ थे। वे नेहरू की इस अवधारणा के विरोधी थे। आर्थिक उदारीकरण के बाद तो नेहरू की आर्थिक नीतियोें को समय के विपरीत बताने में कांग्रेसी भी उनसे पीछे नहीं रहे हैं। सच्चाई तो यह है कि पिछले तीन दशकों से कांग्रेस ने नेहरू की नीतियों का बचाव नहीं किया क्योंकि उसे भी उन्हें पलटना था। उदारीकरण की नीतियों ने असमानता तो बढाई ही, भ्रष्टाचार भी बढाया। नेहरू की नीतियों को लाइसेंस राज बताने वाले उदारीकरण के जमाने में हुए भ्रष्टाचार को किस तरह सही ठहराएंगे? नेहरू हिंदुत्व और कारपोरेट, दोनों के हमले के शिकार हैं। लेकिन उनका बचाव नरम हिंदुत्व और कारपोरेट-परस्त आर्थिक विचारों के जरिए नहीं किया जा सकता। उनके बचाव के लिए जरूरी है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांगे्रेस खुद को बदले। एक ओर वह हिंदुत्व का खुला विरोध करे और दूसरी ओर,  वह नेहरूवादी अर्थशास्त्र को सामने लाए।

Comments