यूपी में दूध के जले विपक्षी दल

पुरानी कहावत है कि दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है। उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दलों की हालत इस समय कुछ ऐसी ही है। पिछले दिनों उन्नाव की बलात्कार पीडित लडकी को जलाकर मार डालने की खबर जैसे ही आई, विपक्ष इस कदर सक्रिय हुआ कि योगी सरकार भी हतप्रभ रह गई। उसको अंदाजा नही था कि इतनी त्वरित और प्रभावी प्रतिक्रिया होगी। लेकिन समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के जेहन में सोनभद्र की घटना थी, जहां प्रियंका गांधी ने दोनों पार्टियों को मात दे दी थी। सोनभद्र में जुलाई में जमीन के विवाद में हुए सामूहिक नरसंहार के बाद सपा-बसपा नेतृत्व को यह होश ही नहीं रहा कि वहां पहुंचना भी चाहिए, जबकि प्रियंका को वहां पहुंचने से रोकने के लिए प्रशासन की कोशिश ने उन्हें मीडिया की सुर्खियों में ला दिया था। इस बार जैसे ही उन्नाव की बलात्कार पीडित लडकी की मौत की खबर आई, सपा-बसपा के नेता चौकन्ने हो गए। प्रियंका अकेले किसी तरह का ‘श्रेय’ ले, उससे पहले ही अखिलेश यादव विधानभवन पहुंच कर धरने पर बैठ गए और मायावती ने राजभवन पर दस्तक दे डाली। अब तीनों विपक्षी दल एक-दूसरे पर नजर जमाए हुए हैं कि कोई किसी तरह बढत न ले सके। भले ही राज्य विधानसभा के चुनाव में अभी ढाई साल बाकी हो, लेकिन सियासी गर्मी अभी से बढने लगी है।

दोराहे पर राज ठाकरे

एक वक्त बाल ठाकरे के राजनीतिक वारिस माने जाने वाले उनके भतीजे राज ठाकरे इस समय बोलचाल की भाषा में कहा जाए तो बिल्कुल सडक पर हैं। उद्धव ठाकरे ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में राज को भी बुलाया था और उन्हें विशिष्ट अतिथियों के साथ आगे की कतार में भी बैठाया। तब कहा जाने लगा कि उनकी घर वापसी हो रही है और वे अपनी पार्टी का विलय शिवसेना में कर देंगे। गौरतलब है कि राज ठाकरे की पार्टी पिछले दो चुनावों से विधानसभा की एक-एक सीट जीत रही है। इसीलिए उनके समर्थकों का भी दबाव है कि राज या तो अपनी पार्टी का विलय कर करे या किसी गठबंधन का हिस्सा बने। शरद पवार ने उनको यूपीए का हिस्सा बनाने का प्रयास किया था। अब पवार की पार्टी और कांग्रेस दोनों शिवसेना के साथ है। दूसरी ओर राज ने भाजपा विरोध में नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर इतने हमले किए हैं कि उधर भी उनके लिए मुश्किल हो सकती है। हालांकि महाराष्ट्र में भाजपा के कुछ चाहते हैं कि पुरानी बातों को भूल कर राज ठाकरे को अपने साथ में ले लिया जाए, क्योंकि भाजपा को भी शिवसेना के विकल्प के रूप में मराठी मानुष की राजनीति करने वाली एक पार्टी की जरूरत है। अब फैसला राज को करना है। उनके लिए दोनों तरफ दरवाजे खुले हैं।

संजय राउत की भूमिका

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद संजय राउत शिवसेना और ठाकरे परिवार की जुबान और चेहरा बनकर उभरे हैं। शिवसेना का मुख्यमंत्री बनवाने के लिए उन्होंने ही भाजपा से मुकाबला शुरू किया। अगर शिवसेना सत्ता मे न आ पाती तो उसका सबसे बड़ा गुनहगार संजय राउत को ही माना जाता, लेकिन अंत भला तो सब भला। अब जबकि शिवसेना के हाथ न केवल सत्ता आ गई है बल्कि उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री भी बन गए तो यह सवाल उठ रहा है कि अब संजय राउत की क्या भूमिका होगी। कहा जा रहा है कि शिवसेना उद्धव ठाकरे ने संजय राउत को मुख्य रूप से दो कार्य सौंपे हैं। पहला तो यह कि राज्य स्तर पर सरकार को समर्थन देने वाले सभी दलों के साथ वे समन्वयक की भूमिका में होंगे। इन दलों की शिवसेना से जो भी अपेक्षा या शिकायत होगी, उसका समाधान राउत के जिम्मे होगा। लेकिन उन्हें इससे भी महती जो जिम्मेदारी दी गई है वह भाजपा को चिढ़ाने और उसे परेशान करने की है। गोवा की राजनीति में दखलंदाजी करके उन्होंने इसकी शुरुआत कर भी दी है। चर्चा है कि वह हरियाणा तक आएंगे। चर्चा है कि वे दुष्यंत चौटाला से मुलाकात करेंगे। कहा जा रहा है कि अगर दुष्यंत चौटाला के भीतर किसी तरह मुख्यमंत्री बनने की इच्छा पैदा की जा सके तो वहां कोई बड़ा सियासी उलटफेर हो सकता है। राउत उसी इच्छा को पैदा करने के लिए हरियाणा आना चाहते हैं। उन्हें इसमें कामयाबी मिले न मिले, लेकिन भाजपा को खिझाने का उन्हे जो ‘टार्गेट’ मिला है, उसमे तो वह कामयाब हो ही सकते हैं।

हाय हुसैन शाहनवाज!

मुख्तार अब्बास नकवी के बाद शाहनवाज हुसैन भाजपा के दूसरे पोस्टर ब्वॉय हैं जो अपने समुदाय की खूब गालियां खाने के बाद भी बतौर प्रवक्ता टीवी चैनलों पर अपनी पार्टी और सरकार का हर मोर्चे पर बचाव करते नजर आते हैं। नकवी तो पुरस्कार स्वरूप पिछली सरकार में जहां राज्यमंत्री थे, वहीं इस सरकार में पदोन्नति पाकर कैबिनेट मंत्री हैं। वाजपेयी सरकार में शाहनवाज कैबिनेट मंत्री थे और नकवी राज्यमंत्री। लेकिन मोदी राज में शाहनवाज संसद तक में जाने को तरस रहे हैं। वे 2014 का लोकसभा चुनाव हार गए थे। उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी राज्यसभा में भेज देगी, लेकिन पांच साल इंतजार ही करते रह गए। यहीं नहीं, पार्टी ने 2019 के चुनाव में टिकट तक नहीं दिया। अब फिर वे राज्यसभा में जाने की आस लगाए बैठे हैं। वरिष्ठता क्रम में उनसे कहीं नीचे पार्टी के तमाम छोटे-बडे प्रवक्ता और पदाधिकारी, मसलन श्याम जाजू, अनिल बलूनी, सुधांशु द्विवेदी, मुरलीधर राव, जीवीएल नरसिंहराव, अरुण सिंह आदि एक-एक करके राज्यसभा में भेजे जा चुके हैं। श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थनाथ सिंह भी उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हैं। संबित पात्रा लोकसभा का चुनाव हार गए लेकिन उन्हें भी ओएनजीसी में डायरेक्टर बनाया जा चुका है। पार्टी के मीडिया सह प्रभारी संजय मयूख भी बिहार में विधान परिषद के सदस्य हो गए हैं। कुल मिलाकर शाहनवाज हुसैन ही एकमात्र ऐसे प्रवक्ता हैं जिन पर मोदी और शाह को रहम नहीं आ रहा है।

लोकसभा का उपाध्यक्ष कब बनेगा?

सत्रहवीं लोकसभा का गठन हुए करीब सात महीने हो गए हैं और उसके दो सत्र भी हो चुके हैं। मगर अभी तक लोकसभा का उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं किया जा सका है। पिछली लोकसभा में अन्ना द्रमुक के थंबी दुराई उपाध्यक्ष थे पर इस बार वे चुनाव हार गए हैं। अन्ना द्रमुक को सिर्फ एक सीट मिली है। दक्षिण में भाजपा के पास दूसरी कोई सहयोगी पार्टी नहीं हैं बिहार की सहयोगी पार्टी जनता दल (यू) के हरिवंश नारायण सिंह को भाजपा ने राज्यसभा में उप सभापति बना रखा है। एक अन्य सहयोगी पार्टी अकाली दल के दो जीते हुए सांसदो में से एक हरसिमरत कौर बादल कैबिनेट मंत्री हैं। दूसरे सांसद उनके पति सुखबीर बादल हैं। इसलिए अकाली दल के नेता को भी भाजपा उपाध्यक्ष नहीं बना सकती। परंपरा के मुताबिक तो उपाध्यक्ष का पद विपक्षी पार्टी को दिया जाता है, जैसे यूपीए दो के शासन में भाजपा के करिया मुंडा उपाध्यक्ष थे। पर भाजपा विपक्ष की बजाय अपनी सहयोगी या अपने प्रति नरम रुख रखने वाले दल का उपाध्यक्ष बनाना चाहती है। महाराष्ट्र चुनाव से पहले शिवसेना को इसका प्रस्ताव दिया गया था, पर उसने मना कर दिया था। अब भाजपा की नजर बीजू जनता दल पर है। बीजद का रुख मोटे तौर पर भाजपा के प्रति समर्थन का ही रहा है। सो, माना जा रहा है कि भाजपा बीजद से उपाध्यक्ष बना सकती है। मगर उपाध्यक्ष की नियुक्ति कब होगी यह कोई नहीं बता सकता।

नए संसद भवन में सेंट्रल हॉल नहीं होगा!

अगर सब कुछ तय योजना के मुताबिक चलता रहा तो 2022 में नया संसद भवन बन कर तैयार हो जाएगा और मौजूदा संसद भवन म्यूजियम में बदल जाएगा। नए संसद भवन को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। सांसद इस बात से खुश बताए जा रहे हैं कि नई संसद में हर सांसद के लिए अलग कमरा होगा। मंत्रियों को बडे कमरे मिलेंगे। संसदीय समितियों के लिए भी ज्यादा जगह का प्रावधान होगा। कर्मचारियों को भी लग रहा है कि उनको मौजूदा संसद से बेहतर सुविधा मिलेगी। पर संसद की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार चिंता में हैं। उनको लग रहा है कि उनके लिए स्पेस कम हो सकता है। सरकार जैसे सरकारी दफ्तरों में पत्रकारों की आवाजाही को नियंत्रित कर रही है, उसी तरह संसद में भी होगा। यह भी कहा जा रहा है कि नए संसद भवन में सेंट्रल हॉल का प्रावधान नहीं किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार अपने सांसदों को सेंट्रल हॉल में बैठ कर पत्रकारो से साथ बात करने और टाइम पास करने से मना किया है। तभी कहा जा रहा है कि मौजूदा संसद की तरह सेंट्रल हॉल की व्यवस्था नए संसद भवन में नहीं होगी। उसकी जगह अलग तरह की व्यवस्था होगी और उसमे आवाजाही नियंत्रित होगी।

चलते-चलते

दिल्ली में इस बार विधानसभा चुनाव के लिए एक राजनीतिक दल का स्लोगन यह हो सकता है- ‘अबकी बार तीन पार।’ इसी तरह एक अन्य राजनीतिक दल का स्लोगन हो सकता है- ‘अबकी बार खाता खोल यार।’

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