पिछली शाम मुहम्मद खडस के निधन की खबर आयी।  लगा कि एक दीया बुझ गया।  विचारों की रौशनी जिंदगी को किस तरह प्रकाशमान करती है आप इसका अंदाजा आसानी से नहीं लगा सकते।  मुंबई के समाजवादी मुहम्मद खडस की जिंदगी ऐसी ही थी। बचपन में ही समाजवादी आंदोलन के प्रभाव में आ गए थे और गरीबी ने उन्हें जब  चिपलूण से मुंबई भेज दिया और पढाई छूटी, मजदूरी आदि से गुजारा करना पड़ा तो सोशलिस्ट पार्टी की छ़त्रछाया में उन्होंने न केवल अपने को व्यावहारिक ज्ञान से लैस किया बल्कि स्वाध्याय के जरिये विचारधारा की बारीकियों को भी समझा। मिडल स्कूल की शिक्षा पाए खडस भाई की मुंबई के बौद्धिकों के बीच ऐसी पैठ थी कि उनके करीबी मित्रों में प्रसिद्ध अर्थशास़्त्री डा भालचंद्र मुणगेकर, इतिहासकार वाईडी फड़के, लेखक लक्ष्मण माने, लक्ष्मण गायकवाड़, साजिद रशीद, पत्रकार प्रकाश बाल, प्रताप आसबे, ज्योति पुनवानी आदि थे। वह अपने मित्रों के बौद्धिक विकास की लगातार चिंता भी करते रहते थे और उनकी हर तरक्की से इतना खुश होते थे कि जैसे खुद कुछ मिल गया हो। उन्होंने अपने साथ जुड़े आंदोलनकारियों को परिवार से अलग नहीं जाना। कितने युवाओं को उन्होंने और उनकी पत्नी फातिमा खडस, जो मुस्लिम सत्यशोधक मंडल के संस्थापक हमीद दलवाई और कांग्रेस सांसद हुसेन दलवाई की बहन हैं, ने संरक्षण दिया।
किस्मत से उन्हें एक ऐसे फर्म से जुड़ने का मौका दे दिया जिसने उनकी आर्थिक दशा तो सुधार ही दी, उन्हें समाजवादी संघर्ष  में सक्रिय रहने का पूरा मौका दिया।  उनकी जवानी समाजवादी आंदोलन के उस दौर से गुजरी जब यह आंदोलन अपने उत्कर्ष  पर था।  अशोक मेहता से होकर नाथ पै ,एसएम जोशी,  जॉर्ज फर्नांडीस, मधु दंडवते तक गुजरी इस मूल्यों वाली राजनीति में गहरे शामिल रहने वाले खडस भाई ने कभी भी इसका फायदा उठाने की कोशिश नहीं की।  जब आपातकाल जेल में गुजारने के बाद बाहर आये तो जनता पार्टी से विधान सभा की उम्मीदवारी मिल रही थी और जीतने के पूरे आसार भी थे, लेकिन उन्होंने मना कर दिया और सोशलिस्ट पार्टी के जनता पार्टी में विलय के विरोध में पार्टी छोड़ दी।  कुछ जनूनी समाजवादियों के साथ समता आंदोलन का  काम करने लगे।  मुंबई-ठाणे के सफाई कामगारों को संगठित करने के दौरान उन्होंने उनकी दशा पर अरूण ठाकूर के साथ ‘नरक सफाई की कहानी’ पुस्तक लिखी जो एक अनोखी पुस्तक है।
उत्तर भारत में गंगा-जमुनी संस्कृति की खूब चर्चा होती है। लेकिन मुंबई में समाजवादियों, कम्युनिस्टों और आंबेडकरवादियों ने जिस इंसानी संस्कृति की रचना की, उसकी चर्चा कम ही होती है। खडस भाई चाल और झोपड़पट्टी से लेकर आभिजात्य इलाके तक फैली इस संस्कृति के हिस्सा थे। लेकिन उन्होंने कभी इसे भुनाने की कोशिश नहीं की। परिवार में कई अंतरधार्मिक विवाह हैं, लेकिन खडस भाई को कभी इसे उपलब्धि के रूप में बखान करते नहीं देखा। यह सब इतना सहज था कि रोज के व्यवहार में शामिल था।

खादी का चकाचक सफेद कुर्ता-पाजामा धारण किए खडस भाई की निर्दोष हंसी में धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र की बंदिशों से मुक्त इंसनियत बाहर आती रहती थी और उनके संपर्क में आने वाला कोई इंसान इससे ग्रस्त हुए बगैर नहीं रह सकता था।
ऐसे ही उनके साथी थे जो इंसानियत भरे समाज की रचना में खामोशी से लगे रहे-राम तांबे, गोपाल कदम, गजानन खातू । संजीव साने, संजय मंगो, जगदीश खैरालिया तथा दत्ता इस्वलकर जैसे अपेक्षाकृत युवा साथी।
बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद हुए मुंबई के दंगों ने उन्हें अंदर से हिला दिया था। लेकिन वह डिगे नहीं। उन काली अंधेरी रातों में उनकी उदास आंखों से उम्मीद झांकती रहती थी। कहा करते थे-हिंदुस्तान ने बहुत से ऐसे वक्त देखे हैं। इससे भी निजात मिल जाएगा।  वह मौलाना आजाद की किताब पढते रहते थे और कहते थे कि मौलाना की यह राय एकदम दुरूस्त थी कि बंटवारा भारत के मुसलमानों को भारी नुकसान पहुंचाएगा। वह मानते थे कि नई आर्थिक नीति गरीबों, दलितां तथा मुसलमानों के लिए काफी तकलीफदेह साबित होगी क्योंकि अधिकांश कारीगर इन्हीं वर्गों से आते हैं। वह कहा करते थे कि अस्मिता की राजनीति हमें फासिज्म की ओर ले जाएगी। वक्त ने उन्हें साबित किया।
वह जिंदगी सार्थक तरीके से जीना सिखाने वाली किताब थे। अपने कठिन दिनों की कहानी बड़े आकर्षक ढंग से सुनाते थे।  कहीं कोई शिकायत का स्वर नहीं।  एक यात्री की तरह जीवन जीने का आनंद लिया। मुझे याद है कि दोपहर का भोजन करने के बाद वह कुछ मिनटों के लिए सोते थे। मैं पूछता था कि आप सोने का नाटक करते हैं; इतनी कम देर में कोई नींद को बुला नहीं सकता। वह हंसते थे-यह एकदम आसान है, दिमाग से सब कुछ निकाल दो।
ढाई साल पहले जब मिलने गया था तो खडस भाई अस्पताल से लौटे थे।  स्वास्थ्य के बारे में पूछा तो कहने लगे कि शरीर  है तो बीमारी होगी ही।  पिछले दिनों उनसे बात करने की कोशिश की तो हो नहीं पाई और सिर्फ फाफा ( फातिमा खडस) बात हो पाई। लेकिन खडस भाई से संवाद का सिलसिला क्या उनकी मौत के बाद भी खत्म हो पाएगा? उन्हें मेरा नमन ! फाफा, हुसैन दलवाई, शमा दलवाई, समर, उसकी पत्नी और लड़के के दुख में खुद को शरीक पाता हूं।

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